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Sunday 19 Nov 2017

मितऊ

गोविन्द उपाध्याय
एफटी- 211, अरमापुर इस्टेट
कानपुर- 208 009  
मो. 09651670106
मोहिनी भाभी कई दिनों से बीमार थी। उनका चेहरा पीला पड़ गया था और अब सांस लेने में भी तकलीफ़ हो रही थी। दीपक भाई उनके सिरहाने सिर झुकाए बैठे थे। अमिता किसी को धीरे-धीरे फोन पर कुछ बता रही थी। अमिता, मोहिनी भाभी की मंझली बेटी है। बड़ी सोनाली किसी प्राइवेट बैंक में मैनेजऱ है  और छोटी बेटी एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर रही थी। दोनों अपनी नौकरी के कारण इस समय यहां नहीं थी। सुबह देखने से यही लग रहा था कि मोहिनी भाभी अभी कुछ दिन और निकाल लेंगी। मुझसे बात भी की थी और यह याद दिलाया था कि उनके न रहने पर अब इस परिवार को संभालने की जिम्मेदारी मेरी है। मेरे आग्रह पर ही दोनों बच्चियां अपने काम पर चली गयीं थीं। आखिऱ कब तक नौकरी से अनुपस्थित रहा जा सकता था। दोपहर होते-होते एक बार फिर उनकी हालत बिगडऩे लगी थी।
अभी थोड़ी देर पहले डाक्टर आया था। उसने साफ़ जवाब दे दिया था- कोई चांस नहीं है। हद से ज़्यादा चौबीस घंटे। वेंटिलेटर पर डाल दिया जाय तो दो तीन दिन और खींचा जा सकता है। लास्ट स्टेज़ है। दीपक भाई का शरीर कांपा था, तो क्या मोहिनी का बस इतना ही साथ था..और उनकी आंखों से दो बूंद आंसू निकल कर गालों पर लुढ़क गये। उनके हाथ सहारे के लिए लडख़ड़ाए तो मैंने फौरन उन्हें थाम लिया।
दीपक भाई को बहुत दिन बाद मैंने ऐसे पकड़ा था। वे सारी जि़ंदगी यूं ही लडख़ड़ाते रहे। बहुत पीते थे। जब मोहिनी भाभी उनके जीवन में आयीं तो वह जि़ंदगी के तीस साल पार कर चुके थे। मोहिनी भाभी सोलह साल की बहुत मासूम छुई-मुई सी लड़की थीं। पिता की असमय मृत्यु से असुरक्षित हो गए परिवार की सबसे बड़ी बेटी। गरीबी ने उस परिवार को असमय दबोच लिया था। ऐसे में मां ने यही सोचा-सरकारी नौकरी कर रहा है। संपन्न परिवार का लड़का है। बेटी भूखी नहीं मरेगी।
दीपक भाई वास्तव में एक पढ़े-लिखे संपन्न परिवार के दूसरे नंबर के लड़के थे। पिता अपने समय के जाने-माने वकील थे। उनकी मृत्यु के बाद बड़े बेटे ने उस जगह को संभाल लिया था। दीपक भाई से छोटा भाई डाक्टर था। बहनें भी अच्छे परिवारों में ब्याही गयी थीं। दीपक भाई उस परिवार की गरिमा के विपरीत मैट्रिक से आगे नहीं पढ़ पाये। वह बड़े भाई के संबंध थे कि उन्हें कमाने-खाने लायक बना दिया। वे परिवार कल्याण विभाग में क्लर्क की नौकरी पा गये ।
उम्र के इस पड़ाव पर आकर सोचता हूं तो सब कुछ अजीब सा लगता है। कैसे दीपक भाई से मेरी मुलाकात हुई थी, कैसे मैं मोहिनी भाभी को पहली बार देखते ही हतप्रभ रह गया था।
मोहन भाई, यह दीपक बाबू हैं। स्टोर में बड़े बाबू हैं। इन्हें थोड़े पैसे की ज़रूरत है। सौ रुपये। ये अपनी साइकिल छोड़ रहे हैं। किसनू पकड़ कर लाया था दीपक भाई को।
मैं ब्याज पर पैसे देने का धंधा नहीं करता था। मैं मेडिकल असिस्टेंट की मामूली सी नौकरी में था। किसनू मेरे यहां ही वार्ड ब्वाय था। पक्का दारूबाज़। वह मुझसे दस परसेंट पर पैसा ले जाता और तनख्वाह मिलते ही लौटा देता था। पैसा भला किसे काटता है। उसी के चक्कर में दो-तीन और लोगों को भी पैसे देने लगा था।
मैंने किसनू के साथ आये हुए व्यक्ति की तरफ  देखा। वह बौना नहीं था, पर उसकी लंबाई पांच फीट से कम ही थी। गर्दन कंधों में धंसी हुई लगती। बड़ा सा सिर तिस पर फैली हुई नाक। दांत टेढ़े-मेढ़े से जिन पर निकोटिन की मोटी सी परत जमी हुई थी। छोटी-छोटी मिचमिची आंखों के कोरों पर कीचड़ चिपका हुआ। हां ! रंग खूब गोरा था और उस पर एक अजीब सी मासूमियत चिपकी हुई थी। वह मुझे देखकर मुस्कराया । मैंने बिना मुस्कराये उसके हाथ में पकड़ी साइकिल को देखा। साइकिल नई थी। शायद कुछ हफ्ते पुरानी।
मैंने सौ का एक नोट उसके सुपर्द कर दिया और एक कागज़ पर उससे रुक्का लिखवा लिया। उसने मोतियों जैसे अक्षरों में लिखा कि वह यह साइकिल उसकी है और वह स्वेच्छा से मुझे रेहन पर रखने के लिये दे रहा है। नीचे उसका नाम लिखा था दीपक दयाल।
उसने वादा किया कि वह जल्द ही अपनी साइकिल ले जायेगा। महीने के अंत पर आया और दस रुपये बतौर ब्याज उसने मेरे हाथ पर रख दिये मोहन बाबू अभी कड़की है, जल्द ही मैं पैसे वापस कर दूंगा। फिर अपने खैनी वाले दांतों को निपोर कर हंसने का प्रयास किया। मुझे उस समय दीपक भाई बेहद काइयां और लतिहड़ टाइप के दिखे। उनकी आंखें लाल थी और मुंह से देशी शराब की गंध आ रही थी। मैं कुछ नहीं बोला और वो लुढ़कते हुए अपने विभाग की तरफ  चले गये ।
उसके बाद तीन महीने तक उनका चेहरा नहीं दिखाई दिया। आफि़स से घर जाने के बाद उपेक्षित साइकिल उनकी याद दिला देती।  मैं उनके आफि़स जाता तो वह सीट पर नहीं मिलते। आखिऱ एक दिन उनके घर पर धावा बोलने का प्रोग्राम बनाया। किसनू से उनका पता पूछा और एक शाम उनके घर जा पहुंचा। वो मेरे घर से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर थे। वह घर पर ही मिल गये। पहले तो मुझे देखकर हिचकिचाए फिर जबरदस्ती चेहरे पर मुस्कराहट लाते हुए बोले अरे मोहन बाबू आइए.. मैं तो आपके पास आने ही वाला था। फिर हाथ पकड़ कर घर के भीतर ले आये। घर छोटा ही था, पर साफ-सुथरा था। दीपक भाई की जो छवि थी, उसे देख कर ऐसे घर की कल्पना नहीं थी मुझे। कमरे में लोहे के पाइप पर प्लास्टिक के तांत से बुनी चार कुर्सियों और मेज का एक सेट था । मेज पर आसमानी रंग का हाथ की कढ़ाई वाला मेज़पोश बिछा था। वैसे ही कपड़ों की कढ़ाई वाली शेर और बतख की मढ़ी हुई तस्वीरें दीवार पर लगी थी। दायीं तरफ़  की दीवार पर दीपक भाई की पत्नी के साथ खिंची हुई तस्वीर टंगी थी। तस्वीर में उनकी पत्नी बहुत सुंदर दिख रही थी। तभी हाथ में ट्रे लिये उनकी पत्नी यानि मोहिनी भाभी दाखि़ल हुई थी। सचमुच वह बहुत सुंदर थी। दूध की तरह सफ़ेद। नीले रंग की सूती साड़ी पहनी हुई थी, उसपर लाल रंग के फूल बने हुए थे। दीपक भाई ने परिचय कराया, यह मेरी पत्नी है मोहिनी और ये मोहन बाबू हैं मेरे विभाग में काम करते हैं। मेरे लिए छोटे भाई जैसे हैं। मैं दीपक भाई से तीसरी बार मिल रहा था। इसके बावज़ूद उन्होंने जिस तरह की आत्मीयता दिखायी, वह मेरे गले के नीचे नहीं उतर रही थी। पर उस समय तो मैं सामने खड़ी स्त्री के सम्मोहन में उलझा हुआ था ।
मैंने बड़े ही शालीनता से हाथ जोड़ लिये- नमस्ते भाभी जी।
वह मुस्कुरा कर सिर हिलाई । मेरी चारों तरफ  हज़ारों रंग बिरंगे फूल खिल गये। उन्होंने ट्रे मेज़ पर रख दी। बेसन के लड्डू और पानी का गिलास था। पास की कुर्सी पर बेझिझक बैठ गई- लीजिए पानी पीजिए। आप तो मेरे नामराशि हैं।
उनकी आवाज़ में भी एक अजीब मिठास थी। मुझे सामने बैठे उबड़-खाबड़ आदमी से ईष्र्या हुई। इस लंगूर की किस्मत में यह हूर कहां से लग गयी ।
मेरी उम्र सत्ताईस साल थी। दो साल पहले मेरी शादी हुई थी। पत्नी मेरी भी सुंदर थी। लेकिन मोहिनी भाभी से उसकी तुलना करना सौन्दर्य का अपमान होता। मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि पहली नजऱ में ही मैं मोहिनी भाभी पर फिदा हो गया था। मैं उस दिन एक घंटे वहां बैठा रहा। उनके हाथों के बने बेसन के लड्डू खाये। चाय पी और एक नया नाम लेकर वापस लौट आया।
हां ! मोहिनी भाभी ने कहा था- हमारी तरफ जब एक जैसे नाम वाले दो लोग मिलते हैं तो एक दूसरे को मितऊ कहकर बुलाते हैं। अपने ही नाम को पुकारना थोड़े ही अच्छा लगता है।
बस मैं मोहिनी भाभी का मितऊ हो गया। इसके बाद  वह मुझे इसी नाम से बुलाने लगी थी। यहां तक कि उनके बच्चे भी मुझे मितऊ चाचा कहते।
मैंने उस दिन पैसे की बात नहीं की। चलते समय दीपक भाई से ज़रूर कहा- बड़े भाई साइकिल तो उठा लेते। उसके बिना आपको परेशानी हो रही होगी। उन्होंने स्वीकृति में तेजी से सिर घुमाया और मैं अपने घर लौट आया।
कई दिन तक मोहिनी भाभी का चेहरा मुझे बेचैन करता रहा। फिर मैंने स्वयं को धिक्कारा- यह कैसी आसक्ति है मोहन? वह औरत किसी की पत्नी है। उसका अपना घर परिवार है । तुम्हें कोई हक नहीं बनता कि तुम उनके जीवन में हस्तक्षेप करो। मन में एक अपराधबोध जागृत हुआ, जिसे मैंने बहुत बेदर्दी से कुचल दिया।
दूसरे ही दिन दीपक भाई मेरा घर ख़ोजते-ख़ोजते आ गये। मैंने उनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। उनकी साइकिल पर जमी धूल को झाड़ा। पास ही की साइकिल की दूकान से पहियों में हवा भरवायी। मैं उनपर सौ-सौ जान से न्यौछावर था। वह गदगद हो गये-मोहन बाबू आप बहुत दयावान व्यक्ति हैं। मैं जल्द ही आपका पैसा चुका दूंगा। क्या बताऊं यह साली शराब की लत ने ऐसे हालात पैदा कर दिये। नहीं तो आप तो जानते ही हैं मैं एक खानदानी  आदमी हूं ।
मैंने उनके कंधे को थपथपाया- क्या दीपक भाई। काहे शर्मिंदा करते हैं। छोटा भाई माना है आपने। अब आप का सुख-दुख मेरा है। कभी पैसों की ज़रूरत हो तो आप निसंकोच कहें। आपस में ब्याज का कोई चक्कर नहीं।
दीपक भाई ने मेरी तरफ  अपनी आंखें घुमाईं। उनकी आंखों में संदेह की धुंधली सी छाया  रेंग रही थी। मैं उनसे नजऱें नहीं मिला पाया। शुरू में मैंने अपने आप को बहुत रोका। मैं नहीं चाहता था कि मेरी किसी बेवकूफी की वजह से उनका  घर-परिवार तबाह हो । दीपक भाई अब कभी भी आ जाते। घर में या फिर आफि़स में, पैसा उधार ले जाते। मैंने उनके लेन देन का हिसाब लिखना ही छोड़ दिया था  वापस करते तो रख लेता। कभी उनसे पैसे के लिए तगादा नहीं करत।  मेरी कोई संतान नहीं थी। पत्नी का भी ज़्यादा समय पूजा-पाठ में कटता। डेढ़-दो हफ़्ते में एक बार दीपक भाई के घर ज़रूर चला जाता। चाहें इसे आप टाइम पास समझें या मोहनी भाभी के प्रति आसक्ति। शुरू में मोहिनी भाभी मुझसे बात करने में ज़रूर हिचकिचाती थी। पर जल्द ही यह संकोच की दीवार गिर गई। वह गज़ब की स्वाभिमानी महिला थी। घर में चाहे जितना अभाव हो। मैंने उन्हें कभी दयनीय नहीं देखा। दीपक भाई चाहे जैसे हों, भाभी ने कभी उनकी बुराई मुझसे नहीं की। घर में दूध नहीं है तो साफ बोलेंगी- मितऊ आज काली चाय पीनी पड़ेगी। पी लेंगे न।
उनकी सदाबहार मुस्कुराहट के आगे मैं हमेशा नत मस्तक होता।
जनवरी का महीना था। ठंड ने पिछले कई सालों का रिकार्ड तोड़ दिया था। एक अजीब सी उदासी चारों तरफ़  पसरी हुई थी। काफ़ी दिन हो गये थे। दीपक भाई का भी हाल-चाल नहीं मिला था। मैं दीपक भाई के घर की तरफ़  चल पड़ा। सात बजे का समय था। चारों तरफ़  घना कोहरा  फैला हुआ था। उनके घर पहुंचा तो मोहिनी भाभी किसी प्रेत छाया सी दरवाज़े पर खड़ी मिली ।
क्या हुआ भाभी, का मेरा सवाल पूछना था कि मोहिनी भाभी का सब्र का बांध टूट गया। वह फफक पड़ी, क्या बताऊं मितऊ अमिता को दोपहर से ही बहुत तेज़ बुखार है और तुम्हारे भाई साहब का कुछ अता-पता ही नहीं चल रहा है।
अमिता कहां है? भाभी दरवाज़े से हट गई। मैं घर में घुसा। चारपाई पर रजाई से ढकी अमिता बुखार से तप रही थी। तब वह मात्र ढाई वर्ष की थी। पास ही बड़ी बेटी सोनाली किताब पकड़े-पकड़े उसके बगल में सो गई थी। मैंने अमिता को भाभी की शाल में लपेटा और गोद में उठा लिया। आप बैठें। घबराने की कोई बात नहीं है, मैं डाक्टर सेठिया से दिखाकर लाता हूं।
डाक्टर सेठिया इस क्षेत्र के बच्चों के जाने माने डाक्टर थे। थोड़ी दूर चलते ही रिक्शा मिल गया। अमिता कराह रही था। मेरा मन बच्ची के कष्ट से भींग गया। डाक्टर का क्लिनिक लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर था। लौटते समय नौ बज गये थे। बाज़ार से ही खाना पैक कराया। बच्ची का बुखार उतर चुका था। वह शाल में लिपटी मेरे गोद में बैठी सड़क के दोनों तरफ धुंध में डूबे रोशनी के बल्बों और नियान साइन बोर्डों को देख रही थी। रिक्शावाला अधेड़ था। रिक्शे की रफ़्तार कोहरे के कारण काफ़ी धीमी थी। मैं अब तनाव मुक्त था। बच्ची की ओढ़ी हुई शाल में भाभी की देह गंध बसी थी। जो अब मुझे विचलित कर रही थी। घर पहुंचा तो दीपक भाई आ चुके थे। और नशे में धुत्त पलंग पर खर्राटे भर रहे थे। मेरी मोटरसाइकिल शीत में नहाई दरवाजे पर उपेक्षित खड़ी थी। भाभी की निग़ाहें दरवाज़े की तरफ़  थी। वह बुरादे की अंगीठी के सामने बैठी मेरा ही इंतज़ार कर रही थी।
मेरी आहट सुनते ही दरवाज़े पर आ गयी। तब तक मैं रिक्शे वाले को विदा कर चुका था। मैं घर में घुसा। उन्होंने लपक कर बच्ची को गोद में ले लिया।
हम अंगीठी के पास आ गये थे। खाने का सामान मैंने रख दिया। अमिता फिर सोने लगी थी। भाभी उसे लेकर कमरे में चली गयी। मैं अंगीठी के पास ही बैठ गया। पांच-सात मिनट बाद वह वापस लौटी। अब उनका चेहरा शांत था। माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी उनके गोरे चेहरे पर दमक रही थी। उन्होंने अब अमिता वाली शाल दुबारा ओढ़ ली थी। मुझे शाल से निकलने वाली देह गंध की याद आयी। मन में आते विचारों को झटका- भाभी, अब उसे बुखार नहीं है। कंपाउडर ने एक खुराक दवा वहीं दे दी थी। अब आप सुबह दवा दीजियेगा। मैं आप और दीपक भाई के लिये खाना ले आया हूं। उन्हें  जगा कर खिला दीजिए।  
भाभी के चेहरे की चमक एक झटके में धूमिल पड़ गई, कहां मितऊ, वह इस लायक हैं ही कहां कि कुछ खा पी सकें। मेरा मन भी कुछ खाने को नहीं कर रहा है। अरे मैं भी कितनी स्वार्थी हूं। आप भी तो भूखे होंगे।
भाभी थाली लेने चली गयी। मेरे आग्रह पर उन्होंने भी खा लिया।
ग्यारह बजे रात को मैं अपने घर के लिए निकला तो भाभी दरवाज़े पर मेरा हाथ पकड़ते हुए बोली-मितऊ, अपने भाई साहब को समझाओ। बाकी के शब्दों को सुनने से पहले मैं हवा में उडऩे लगा था।
कहते हैं कि औरत के अंदर पुरुष की नियति जानने के लिए छठी इंद्री होती है। वह देखते ही पहचान जाती है। तो क्या मोहिनी भाभी नहीं पहचानती हैं मेरी भावनाएं। या फिर जानबूझ कर अनजान बनती थी। कैसी हैं मेरी भावनाएं उनके लिए? क्या मैं ही जान पाया हूं? क्या वह सिफऱ्  मेरे लिए एक मादा देह है? क्या उस देह के उपयोग की नियति से मैं उनसे इतने सालों से जुड़ा हूं?
मेरे पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। हम दोनों अपनी-अपनी सीमा रेखाओं में कैद थे। जिसे कभी लांघने की कोशिश नहीं की। नहीं शायद मैं गलत कह गया। एक बार मैंने इस सीमा को लांघने का प्रयास किया था।
दोपहर का समय था। छुट्टी का दिन था। मन किया कि मोहिनी भाभी से मिला जाय। दीपक भाई उस दिन भी घर पर नहीं थे। भाभी नहा कर निकली थीं। बाल उनके गीले थे। उन्होंने उनको खुला छोड़ दिया था। वह मेरे लिए चाय बनाने चली गयी। मैं कुर्सी पर बैठा था। बच्चे बाहर खेल रहे थे। भाभी मुझे चाय का प्याला पकड़ा कर कनस्तर में चावल पलटने लगी। वह झुकी हुई थी। उनका ध्यान चावल और कनस्तर की तरफ था। उनकी भरी हुई छातियां ब्लाउज़ से बाहर झांक रही थी। और मेरी निगाह उसी पर टिकी थी। मन के अंदर का समंदर किनारों को छूने के लिए बेताब हो गया। सांसें बेकाबू होने लगी थीं। मैं अपनी जगह से उठा और उनके बिल्कुल पास आ गया। अचानक उनकी निग़ाह मुझसे टकराई और थैला उनके हाथ से छूट गया। वह लगभग खाली हो चुका था। मैं बाज़ की तरह उन्हें अपने पंजो में जकड़ लेना चाहता था। भाभी स्थिर खड़ी थी-यह क्या मितऊ? तुम्हें तो मैं अपनी सबसे कीमती चीज दे चुकी हूं। फिर इस गंदे शरीर की लालसा क्यों?
मैं जड़वत रह गया था। भाभी के शब्द बर्फ की तरह सर्द थे। मेरे पैरों में जान ही नहीं थी। मैं धम्म से वहीं फर्श पर ढह गया और बच्चों की तरफ बिलख-बिलख कर रोने लगा। भाभी मेरे पास बैठ गयीं। वह मेरे बालों में हाथ फेरने लगी। मैं हिचकियां ले रहा था।
मितऊ, नहीं मितऊ, यह क्या बच्चे जैसे रो रहे हो। इस दुनिया में मुझे सिफऱ् तुम्हारे पर तो विश्वास है। जब मैं लडख़ड़ाऊंगी तो तुम मुझे थाम लोगे। मैं तो कभी का मर गई होती। गरीब की बेटी थी। घर की मज़बूरी थी कि एक निर्मोही के पल्लू से बांध दी गई। जब भी टूटने की स्थिति आती, तुम देवदूत से आ जाते। तुम ही बिखर जाओगे तो मुझे कौन समेटेगा? मोहिनी भाभी की आवाज़ भारी हो गयी थी ।
मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं था। किसी तरह अपने आपको संभाला और वहां से निकला। कई दिन लग गये मुझे सामान्य होने में। मेरे पास इतना साहस नहीं था कि मैं उनका सामना कर सकूं। आठ-नौ वर्ष से जिस पिशाच को मैंने मन के भीतर दबा कर रखा था, वह उस दिन उनके सामने प्रगट हो गया था। कहते हैं इस नश्वर संसार में हर चीज की उम्र होती है। संबंधों की भी। मैंने निश्चय कर लिया कि अब मोहिनी भाभी से नहीं मिलना। दो-तीन महीने निकल गये। इस बीच दीपक भाई से मुलाकात होती और वह मुझे बताते भी थे, अरे भाई मोहन बाबू तुम्हारी भाभी और बच्चे याद कर रहे थे।
मैं भला उन्हें क्या जवाब देता। बस एक फीकी मुस्कराहट के साथ इतना ही बोल पाता, क्या बताऊं दीपक भाई, समय नहीं मिल पाता है।
उस शाम जब आफिस से छूटकर घर लौटा तो मोहिनी भाभी मेरे घर ही मौज़ूद थी । तीनों बेटियां भी साथ ही थीं। छोटी लपक कर मेरी गोद में आ गयी। मैं उसे चूमने लगा। पत्नी उनके सत्कार में व्यस्त थी। मोहिनी भाभी मुझे देखते ही मुस्कराई, क्या बात है मितऊ? ऐसा भी क्या, जो हमें बिलकुल ही बिसरा दिया?  मैं भी न आती। जब तुम्हें हम लोगों की चिंता नहीं तो फिर भला मुझे क्यों हो? वो तो छोटी आफत मचाई थी कि मितऊ चाचा के पास चलो। कल उसका जन्मदिन है। छोटी भी अपनी तोतली जुबान से शायद यही बताने की कोशिश कर रही थी।
फिर से सब कुछ सामान्य हो गया। हम दोनों ने उस प्रकरण पर कभी दुबारा चर्चा नहीं की।  
समय तेज़ी से भाग रहा था। दीपक भाई की दारू की लत छूट गई थी। सच तो यह था कि गिरते स्वास्थ्य और जीने की चाह ने उन्हें मज़बूर कर दिया कि वह शराब से तौबा कर लें। हमारी पीढ़ी अब बूढ़ी होने लगी थी। जो बच्चे कभी हमारे गोद में खेले थे वह अब खुद पिता बन चुके थे।
मोहिनी भाभी की बच्चियां भी बड़ी हो गयी थीं। बड़ी बेटी ने एमबीए किया था। छोटी ने बीटेक, मझली पीएचडी कर रही थी। लड़कियां सुंदर और स्वावलंबी थी। बड़ी के रिश्ते की बात भी चल रही थी। तब भला किसे मालूम था कि बाहर से स्वस्थ और प्रसन्न दिखने वाली भाभी अंदर ही अंदर गल रही हैं। पता तब चला जब उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया।
सोनाली का फोन आया था- चाचा  जल्दी  आइए। मम्मी की हालत खराब है। जब मैं घर पहुंचा तो वह खून में सनी हुई थीं। हम उन्हें लेकर अस्पताल पहुंचे। पता चला कि भाभी को कैंसर था। उन्हें मालूम था। जिसे उन्होंने किसी को नहीं बताया। अब तो आखिऱी चरण था। बिल्कुल लाइलाज़।
जानते हो मितऊ, यदि बता देती तो मेरी बच्चियों का भविष्य चौपट हो जाता। मरना तो है एक दिन। इस बात का सकून है कि मेरी बच्चियां इस समाज में स्वाभिमान से सिर उठा कर जी सकेंगी। बस मितऊ, अब उनके हाथ पीले होने तक तुम्हीं को संभालना है। अपने भाई साहब का ख्याल रखना, भाभी के होंठ कांपे। आंखों को बंद करके हांफने लगी थी।
पन्द्रह दिन से ऊपर हो चुके थे। कभी लगता स्वस्थ हो रही हैं तो दूसरे पल एक गहरी निराशा हमारे चारोंतरफ  तन जाती। इस समय भी भाभी की सांसें टूट रही थी। मुझसे यह सब देखा नहीं जा रहा था। दीपक भाई को स्टूल पर बैठा कर मैं खुली खिड़की से बाहर देखने लगा। ओपीडी का बाहरी बरामदा दिखाई दे रहा था। एक मां अपने बच्चे को आंचल में समेटे दूध पिला रही थी। व्हील चेयर पर बैठा नौजवान अपनी युवा पत्नी को कुछ समझा रहा था। एक छोटी बच्ची सामने लगे पोस्टर को निहार रही थी। मैंने एक गहरी सांस लेकर  खिड़की से सिर घुमा लिया। दीपक भाई सिसक रहे थे। मोहिनी भाभी की आंखें बंद थी। मुझे लगा अभी वह आंखें खोलेंगी और अपने कांपते होठों से मुझे आवाज़ देंगी- मितऊ।