Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

कूड़ा

बलदेव कृष्ण कपूर
491, कृष्णापुरी, मुजफ्फरनगर-251002 मो. 08126425570
महानगर की दूरदराज की एक कॉलोनी- उत्तम विहार। जून मास की आग उगलती दोपहरी। चौड़ी सड़क पर लिचलिची तारकोल को दहलाती कभी कोई बस निकल जाती है तो कभी कोई कार और वह भी देर-देर बाद। सड़क के दोनों ओर चार-चार मंजिलें भवन, परन्तु इस कड़कती धूप में बाहर निकलने का साहस किसी का नहीं।
कूलर की टंकी में पानी की मात्रा को चेक करने के लिए कमरे से निकलते एक अधेड़ व्यक्ति ने तीसरी मंजिल के एक फ्लैट की बाल्कनी से देखा- सड़क के पार सरसराती हुई हरे रंग की एक कार तेजी से आई, बिजली के खंभे के निकट फुटपाथ के किनारे सहसा रुकी। बड़े से काले चश्मे वाला एक युवक अगली सीट से उतरा। उसने लपककर कार की पिछली सीट का दरवाजा खोला। काली चप्पल, सफेद कुर्ता-सलवार-दुपट्टा पहने एवं कमजोर दृष्टि वाला चश्मा आंखों पर लगाए एक बूढ़ी काया धीरे-धीरे कार में से उतरी। युवक पुन: कार में ड्राइवर-सीट पर जा बैठा। पलक झपकते ही कार फर्र से आगे निकल गई और बूढ़ी औरत बिजली के खम्भे के पास, झुलसी हुई झाड़ी को पकड़ कर खड़ी हो गई।
ऐसी प्रचण्ड धूप में यह यहां पर खड़ी क्यों हो गई?- अधेड़ व्यक्ति ने सोचा- छोड़ो। यह तो दुनिया है, होगा उसे कोई काम। वह अधेड़ व्यक्ति कमरे में चला गया। पर्याप्त समय व्यतीत होने पर अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए वह फिर कमरे से बाहर निकला। वह वृद्धा झाड़ी पर एक पांव रखे, कमर झुकाए अभी तक वहीं खड़ी थी और जिधर वह हरी कार सरसराती हुई आगे निकल गई थी, उधर ही टकटकी लगाए चश्मे से देख रही थी। अंधियाते प्रकाश के अथाह सागर की चकाचौंध में वह शायद भली प्रकार देख नहीं पा रही है इसलिए अपने दुपट्टे का छाता माथे पर तानकर वह देखने का प्रयास कर रही है।
होगा किसी बस या थ्री-व्हीलर का इंतजार उसे। सोचता हुआ अधेड़ व्यक्ति झुलसाती लू का थपेड़ा लगते ही कूलर की हवा में फिर कमरे में चला गया और अपने काम में लग गया। घंटा भर व्यतीत हो गया। उसका ध्यान फिर आग्नेय धूप में खड़ी उस वृद्धा की ओर गया। उसे विश्वास था, चली गई होगी वह अब तक। उसने बाल्कनी में जाकर फिर देखा- यह माजरा क्या है? बेचारी बुढिय़ा कितनी बेहाल हो चुकी है और अब भी उधर ही देख रही है। कुछ न कुछ बात जरूर है इसके साथ। इतनी कड़ी धूप में तो अच्छा भला आदमी पिघल जाए, यह तो वृद्धा है। और देर तक यह ऐसे ही खड़ी रही तो यह अवश्य बेहोश हो जाएगी या लू से मर जाएगी।
इतने में अधेड़ व्यक्ति का बेटा और बेटी अपना-अपना बस्ता लादे स्कूल से लौट आए। अपने बेटे को अधेड़ व्यक्ति ने वृद्धा के पास भेजा। छतरी लगाए हुए जब वह वहां पहुंचा तो वृद्धा बुरी तरह सूख चुके अपने गले और अपने होंठों पर बार-बार जीभ फेर रही थी।
''मां जी। वहां सामने मेरे पापा जी ने आपको बुलाया है।ÓÓ
बारह-तेरह वर्ष के एक बालक को छतरी लिए हुए अपने सामने पाकर वृद्धा की आंखों में सुखद आश्चर्य से एक हल्की सी चमक उभरी।
''तुम कौन हो, बेटा? मुझे तो यहां कोई नहीं जानता, फिर किसने बुलाया है?ÓÓ
''मेरे पापा देर से आपको ऊपर बाल्कनी से देख रहे थे। क्या आपको थ्री-व्हीलर का इंतजार है?ÓÓ
''नहीं, मेरा बेटा कार में पेट्रोल डलवाने पेट्रोल पम्प तक गया है, अभी आता होगा। मैं उसी के इंतजार में खड़ी हूं।ÓÓ
''तो मां जी, वहां चलकर बैठ जाइए।ÓÓ
''नहीं, मैं उधर जाऊंगी तो वह मुझे कहां ढूंढता फिरेगा। बस, वह आने ही वाला है।ÓÓ
''तो आपको प्यास लगी होगी। पानी लाऊं?ÓÓ
''हां गला तो बहुत देर से सूख रहा है, पर तुम यहां कैसे लाओगे?ÓÓ
लड़का तत्काल उछलता हुआ चला गया और वृद्धा फिर उत्सुकतापूर्वक अपनी सामथ्र्यानुसार दूर तक सड़क को निहारने लगी। थोड़ी देर में वही लड़का पानी-भरा एक जग और एक गिलास लेकर आ गया। बूढ़ी गटागट कई गिलास पानी पी गई। जग में शेष बचे पानी से उसने अपने दुपट्टे का एक किनारा भिगो लिया, जिसे वह बार-बार अपने माथे और पोपले गालों पर फेरने लगी।
''मां जी, अब मैं जाऊं?ÓÓ लड़का बोला।
''हां बेटा, जाओ। भगवान तुम्हारा भला करे।ÓÓ
लड़का भागता हुआ वापस चला गया। वृद्धा फिर कमर झुकाए सड़क की ओर देखने लगी। प्रत्येक वाहन की ध्वनि उसे अपने बेटे की कार की ध्वनि लगती थी। निकट आने पर वह निराश हो जाती और वाहन आगे निकल जाता था। आहिस्ता-आहिस्ता दीवारों की परछाई लम्बी होने लगी तथा आने-जाने वाहनों की संख्या बढऩे लगी। धीरे-धीरे फुदकती हुई धूप सामने के भवन की चौथी मंजिल पर जा सिमटी।
वृद्धा ने देखा सड़क पर लोग आने जाने लगे हैं। उसी लड़के के साथ एक अधेड़ व्यक्ति को अपनी ओर आते देखकर उसने अपनी झुकी हुई दुखती कमर को तनिक सीधा किया और झाड़ी पर रखा हुआ पैर पुन: फुटपाथ पर रख दिया।
''मां जी, नमस्ते।ÓÓ
बूढ़ी आश्चर्य से देखने लगी... सफेद धोती, सफेद कुर्ता, आंखों पर चश्मा, लम्बा सा आदमी।
''मैं हूं प्रोफेसर गांगुली। इधर सामने तीसरी मंजिल पर फ्लैट नम्बर चौंसठ में रहता हूं। दोपहर से मैं देख रहा हूं आप यहीं पर खड़ी हैं। आपको इस कॉलोनी में किसके यहां जाना है?ÓÓ
''जाना नहीं, मैं तो अपने बेटे के आने का इंतजार कर रही हूं।ÓÓ
''कहां गया है आपका बेटा?ÓÓ
''वह पेट्रोल पम्प से कार में पेट्रोल डलवाने गया है।ÓÓ
''मां जी, यहां से केवल एक किलोमीटर आगे पेट्रोल पम्प है। कार से केवल पांच मिनट का रास्ता है। आपका बेटा अवश्य कहीं और चला गया है। कई घंटों से आप यहां पर खड़ी हैं। आपकी दशा मैं देख रहा हूं। और देर तक खड़ी रहीं तो आप गिर जाएंगी। चलिए मेरे साथ।ÓÓ
''नहीं, मेरा हरीश आएगा तो मुझे यहां न पाकर परेशान हो जाएगा।ÓÓ
''मां जी, मैं आपके लिए उधर नीचे ही कुर्सी बिछवाए देता हूं, आप उस पर बैठ जाइए।ÓÓ
''नहीं पुत्तर। हरीश कह रहा था, मां थोड़ी सी देर यहां रूको, मैं कार में पेट्रोल डलवाकर अभी आया। उसे कहीं देर जरूर हो गई है, पर अब तो वह आता ही होगा।ÓÓ
''मां जी, शाम हो गई है। उसे आना होता तो अब तक आ जाता। अब आप क्या सारी रात यहीं खड़ी रहेंगी? क्या वह आपको पेट्रोल-पम्प पर नहीं ले जा सकता था?ÓÓ
वृद्धा को ध्यान आया कि उसने इस प्रकार तो सोचा ही नहीं था। शायद यह आदमी कुछ-कुछ ठीक ही कह रहा है। हरीश मुझे भी तो पेट्रोल-पम्प पर ले जा सकता था। कहीं वह जानबूझकर तो..., नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। हरीश ऐसा नहीं कर सकता।
''मां जी, क्या सोच रही हैं? मैं भी आपके बेटे की उम्र का हूं। चलिए मेरे साथ।ÓÓ
''पुत्तर, तेरी लम्बी उम्र हो। तुमने मेरा ख्याल किया। पर कहीं ऐसा न हो मैं उधर जाऊं और हरीश आ जाए।ÓÓ
''ठीक है, मां जी। तो आप सड़़क के उस पार कुर्सी पर बैठ कर भी तो हरीश का इंतजार कर सकती है। उसकी कार रुकेगी तो आप उसे आवाज दे देना या हमें बता देना, हम उसे आवाज देकर बता देंगे कि आप इधर हैं।ÓÓ
वृद्धा बुरी तरह थक चुकी थी। उसका शरीर अब उससे संभाला नहीं जा रहा था। वास्तव में वह लेटना चाहती थी। कुर्सी पर बैठकर प्रतीक्षा करने का यह प्रस्ताव उसने स्वीकार कर लिया और प्रोफेसर गांगुली के साथ सड़क पार करके दूसरे किनारे पर फुटपाथ पर बिछा दी गई फोल्डिंग कुर्सी पर वह ऐसे जाकर पड़ी जैसे अपनी निढाल काया को उसने कुर्सी पर फेंक दिया।
आकाश में बहुत ऊपर उड़ती चीलें धीरे-धीरे नीचे मंडराने लगीं। अपने कांटे समेटकर ऊपर जा चुकी धूप धीरे-धीरे विलुप्त हो गई। पश्चिम की लाली धीरे-धीरे गहरी हो चली और फिर उस बूढ़ी औरत ने देखा अन्य खंभों तथा उसके चिरपरिचित खंभे के ऊपर हेलोजिन लाइट जगमगा उठी। परन्तु कोई कार वहां नहीं रूकी।
अब उसके मन में भिन्न-भिन्न प्रकार की आशंकाएं व्याप्त होने लगी- कहीं प्रोफेसर गांगुली की ही बात तो सत्य नहीं है। हरीश इस प्रकार मुझे क्यों छोड़ गया? पेट्रोल पम्प पर यदि वह मुझे अपने साथ ले जाता तो क्या हर्ज था? तो क्या पेट्रोल-पम्प से पेट्रोल लेने का बहाना ही था। हाय री मेरी अकल। मैंने यह क्यों नहीं कहा कि मुझे यहां क्यों छोड़ रहे हो, पेट्रोल लेना है तो ले लो, मैं कार में बैठी रहूंगी। पता नहीं, मुझे यह बात उस समय सूझी क्यों नहीं? वाह रे हरीश! ... बेटा, मैंने क्या नहीं किया तुम्हारे लिए? और आज तुमने।.... मैं तो तुम्हें ऐसा नहीं समझती थी। क्या सोनू और मोनिका भी मुझे याद नहीं करेंगे? शायद यह सब की मिलीभगत हो। पर उन्होंने ऐसा क्यों किया? ऐसा तो कोई करता नहीं। नहीं, नहीं, वह मुझे ले जाना भूल गया होगा। घर जाकर फिर लौटकर आएगा मुझे लेने के लिए।
''मां जी, अब तो रात हो गई। आप ऊपर चलकर कुछ खाइये और विश्राम कीजिए। अब आपका बेटा नहीं आएगा। मुझे एड्रेस बताइए, मैं उसे फोन कर दूं।ÓÓ
वृद्धा सोच नहीं पा रही थी क्या उत्तर दे। आशा की नदी के सारे तट बंध अभी नहीं टूटे थे। डूबती सी आवाज में वह रुक-रुक कर बोली- ''बेटा, फोन तो घर में है परन्तु मुझे नम्बर याद नहीं है। मुझे लगता है हरीश मुझे ले जाना भूल गया। वह घर से लौटकर आएगा। अभी मुझे यहीं बैठी रहने दो। मेरे खाने की चिन्ता मत करो, मुझे भूख-प्यास बिल्कुल नहीं है।ÓÓ
प्रोफेसर गांगुली चले गए। बच्चे वहीं खेलते रहे। कुछ देर बाद बच्चे भी ऊपर चले गए। वृद्धा वहीं रही। रात के दस बजे जब सारी चहल-पहल समाप्त हो गई तो उसे लगा कि अब तो कहीं न कहीं रात काटनी ही पड़ेगी। अब हरीश नहीं आएगा।
इस बार प्रोफेसर ने जब नीचे आकर उसे ऊपर चलने के लिए कहा तो वह मान गई। ऊपर जाकर बेमन से उसने भोजन के दो चार कौर मुंह में डाले और कटी हुई टहनी सी बिस्तर पर धम्म जा गिरी।
रात भर तरह-तरह के विचार उसे डसते रहे। करवटें बदल-बदलकर उसने रात काटी। सुबह प्रोफेसर ने जब उससे उसके घर का पता-ठिकाना पूछा, परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में पूछा, घर की स्थिति के बारे में पूछा तो उसने सा$फ-सा$फ बता दिया- हरीश के पिता को गु•ारे अभी तीन वर्ष भी पूरे नहीं हुए तथा उसके नाम कोई सम्पत्ति नहीं है। वह अपने तीन बेटों के पास चार-चार महीने रहती है। तीनों बेटों का व्यवसाय अलग-अलग है और सबके पास अपनी-अपनी कार, बंगला और टेलीफोन है। सभी बाल-बच्चेदार हैं।
''मां जी, अपने बेटों के नाम और एड्रेस बताइए, मैं उनसे सम्पर्क कर सकूं। यदि उनमें से किसी का फोन नम्बर याद हो तो वह भी बताइए।ÓÓ
''फोन तो तीनों के घर में हैं पर मुझे नम्बर याद नहीं। सबसे बड़ा राजेश शक्ति नगर में रहता है, उससे छोटा मनीष नारायणा में और सबसे छोटा हरीश रहता है महारानी बाग में।ÓÓ
मां जी, मकान का नम्बर, सेक्टर नम्बर, फे•ा नम्बर या रोड नम्बर कुछ तो बताइये। पूरे महारानी बाग में कोई एक ही  हरीश तो होगा नहीं। शक्तिनगर में अनेक राजेश होंगे और नारायणा में अनेक मनीष।
''बेटा, इससे अधिक मुझे कुछ मालूम नहीं। नम्बरों की न मुझे कभी जरूरत पड़ी और न मुझे लिखना आता है।ÓÓ
''ठीक है, उनमें से किसी का पता निकालने का मैं प्रयत्न करता हूं। आप अपनी पुत्र-वधुओं के नाम और पोते-पोतियों के नाम बताइये।ÓÓ
हरीश की पत्नी का नाम है लीना, बेटा सुनील और बेटी मोनिका। मनीष की घरवाली ज्योति और दो बेटे सौरभ और गौरव। राजेश की दो बेटियां हैं अलका और स्वीटी और एक बेटा है दीपक, बहू का नाम है रंजना।
अब प्रोफेसर गांगुली ने महानगर की टेलीफोन डायरेक्ट्री उठाई। संबंधित क्षेत्र में जितने भी हरीश मिले, उनको फोन करना प्रारंभ कर दिया। उनका पहला वाक्या था... ''हैलो। सुनील और मोनिका घर पर हैं या स्कूल चले गए?ÓÓ
उधर से उत्तर आता ''रांग नम्बर।ÓÓ और वह फिर अगले हरीश का नम्बर घुमा देता था। सहसा उधर से उत्तर मिला.... ''अभी तो घर पर ही हैं, आप कौन बोल रहे हैं?ÓÓ
''जरा सुनील को फोन दीजिए, मैं उसके स्कूल से बोल रहा हूं।ÓÓ
क्षण भर बाद- ''हैलो, मैं सुनील बोल रहा हूं।ÓÓ
''सुनील, माई सन। आपकी ग्रैंड मदर कहां है?ÓÓ
''अंकल। गं्रैड मां तो कल बड़े अंकल के पास शक्तिनगर चली गर्इं।ÓÓ
''वहां का फोन नम्बर बता सकते हो?ÓÓ
''हां अंकल। वह तो मुझे जबानी याद है,फोर, नाइन, टू, फाइव, जीरो, डबल फाइव।ÓÓ
''और दूसरे ताऊजी का फोन नम्बर?ÓÓ
''नारायणा वालों का?ÓÓ
''हां।ÓÓ
सुनील ने वह भी बोल दिया और प्रोफेसर ने नोट कर लिया। तब प्रोफेसर ने कहा- ''सुनील, पापा को फोन देना।ÓÓ
''जी अंकल।ÓÓ
पल भर बाद एक भर्राई हुई आवाज उधर से आई- ''हैलो, हरीश स्पीकिंग।ÓÓ
प्रोफेसर गांगुली ने बड़े संयत स्वर में कहा, ''मिस्टर हरीश। आप अपनी ओल्ड मदर को कल जहां पर छोड़ गए थे, मैं वहीं से बोल रहा हूं। आपकी मदर मेरे घर पर हैं। मेरा एड्रेस नोट कर लीजिए और आकर उन्हें ले जाइये। वह बहुत परेशान हैं।ÓÓ
डपटते स्वर में उधर से उत्तर मिला- ''मिस्टर। आपको कोई गलतफहमी हो गई है। मेरी मदर तो यहां मेरे घर में हैं। आप रांग नम्बर पर बात कर रहे हैं।ÓÓ और उधर से फोन रख दिया गया।
प्रोफेसर ने हरीश को बार-बार फोन किया, कभी वृद्धा की दारुण दशा बताते हुए, कभी नैतिकता की दुहाई देते हुए और अंत में पुलिस में रिपोर्ट लिखाने का डर दिखाते हुए। परन्तु सब व्यर्थ। हरीश ने अंतिम बार कह डाला- ''ए मिस्टर। क्यों पराई आग में कूद रहे हो? बुढिय़ा पर इतना तरस आ रहा है तो उसे रख क्यों नहीं लेते। पुलिस का डर किसी और को दिखाना। इस विषय में अब मुझे फोन मत करना।ÓÓ
उसके बाद प्रोफेसर वृद्धा को साथ लेकर निकटवर्ती थाने में पुलिस की सहायता लेने पहुंचे। पूरी घटना उन्होंने वहां पर सुनाई। तीनों बेटों के फोन नम्बर भी लिखवा दिए। दरोगा और सिपाहियों ने वृद्धा की ओर देखा। वह कुछ भी बोल नहीं पा रही थी। नि:शब्द झर रहे आंसू ही उसके मन की व्यथा को बता रहे थे। इस दृश्य को देखकर सिपाहियों और दरोगा के फौलादी चेहरे क्षणभर को करुणा से आद्र्र दिखाई पड़े।
राइफल लिए खड़ा एक सिपाही बोला, ''या अल्लाह। हमने तो मां के पैरों तले जन्नत सुनी थी।ÓÓ
बराबर में खड़े दूसरे सिपाही ने उत्तर दिया, ''मियां, वो सब तो पुरानी बातें हो गई। अब तो इंसान हर रिश्ते की कैद से आजाद होना चाहता है।ÓÓ
दरोगा ने जोर से पुकार कर कहा, ''सोहन लाल। इन तीनों पुलिस स्टेशन के स्टेशन ऑफिसर से फोन पर मेरी बात कराओ।ÓÓ और फिर प्रोफेसर गांगुली को संबोधित कर बोला, ''इनका रोना देखा नहीं जाता। अब आप इन्हें ले जाइये। हम संबंधित थानों के माध्यम से अभी इनके बेगैरत बेटों से संपर्क करते हैं। आप फिक्र न करें, कुछ न कुछ इंतजाम तो हम करेंगे ही। तब तक आप इन्हें अपने घर ले जाइये और आराम कराइये।ÓÓ
आश्वासन पाकर प्रोफेसर वृद्धा के साथ घर लौट आया। दोपहर के भोजन का समय हो रहा था। पति-पत्नी ने वृद्धा को सांत्वना दी, आंसू पोंछे और आग्रह करके कुछ न कुछ खिलाया। तत्पश्चात प्रोफेसर भोजन कर पुन: पुलिस स्टेशन चला गया।
उसका बेटा कार्तिक और बेटी मिनी एक ही स्कूल में पढ़ते थे। अपरान्ह दो बजे वे दोनों घर लौट आते थे। नित्य की भांति स्कूल से लौटकर दोनों हाथ-मुंह धोकर खाना खाने बैठे। मिनी जल्दी उठ गई। कार्तिक ने पुकारा- ''मम्मी। मछली और दे दो।ÓÓ
''अरे,तुम्हें पता नहीं, मम्मी बता रही थी, आज पापा को मार्किट जाने का समय ही नहीं मिला, इसलिए फिश आई ही नहीं। जो थोड़ी सी फ्रिज में रखी थी, यही तो बनी है आज। तुम्हारे हिस्से की तुम्हें मिल चुकी, अब तो मम्मी के हिस्से की रखी है।ÓÓ यह उत्तर था मिनी का।
मिनी के अनाधिकार उत्तर पर मिसे•ा गांगुली का स्वर रसोई से गूंजा- ''अरे तू क्यों बोल रही है?... लाई। बेटा, मैं अभी आई।ÓÓ
मिनी ने फिर कहा, ''तो मम्मी, तुम भात किससे खाओगी?ÓÓ
''कोई बात नहीं, मैं अचार से खा लूंगी।ÓÓ
थोड़ी देर बाद प्रोफेसर गांगुली आ गए। घर में घुसते ही अपनी पत्नी को पुकारते हुए बोले, ''सुनन्दनी, ओ सुनन्दनी। एक दिन हम भी इस संतान की दृष्टि में कूड़ा हो जाएंगे, जैसे इन मां जी को इनके तीनों बेटों ने समझ लिया है। वे इस विषय में न पुलिस का दबाव मानने को तैयार हैं और न कोई नैतिक अपील। कानूनी लम्बी, अनिश्चित लड़ाई उनसे कौन लड़े?ÓÓ
''और समाज का डर?ÓÓ ... सुनन्दनी बोली।
''समाज है ही कहां?ÓÓ
''तो फिर अब?ÓÓ
प्रोफेसर ने बताया, ''अंत में पुलिस की सहायता से एक वृद्धाश्रम में इनका प्रबंध हो गया है।ÓÓ
सुनन्दनी ने मछली के बचे हुए कांटे कूड़ादान में फेंकते हुए कार्तिक को सिर से पांव तक देखा और वह सिहर उठी।