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Tuesday 21 Nov 2017

आज भी


जाफऱ मेहदी जाफऱी
34 अलीग अपार्टमेंट्स
शमशाद मार्केट
अलीगढ - 202002
मो. 9889053590
आसमान पर सूरज अपनी पूरी आब ओ-ताब से चमक रहा था। लगता था जैसे कुछ ही पल में ज़मीन पर उतर कर पूरी धरती को अपना जैसा बना देगा।
    वह बूढ़ा पसीने में सराबोर, लाठी टेकता, आहिस्ता-आहिस्ता क़दम बढ़ाता, गाँव की तरफ जा रहा था। जो अब कुछ ही फासले पर था। लेकिन लगता था जैसे उस के क़दम छोटे हो गए हैं और उस दूरी को कम ही नहीं कर पा रहे हैं।  जितना चलता, उसे फ़ासला उतना ही दिखाई देता। उसने आसमान की तरफ देखा और रुक गया। अपने कन्धे पर लटकी छागल को उतारा। डन्डे को अपने पेट से टिकाया। छागल का मुँह खोला और कई घूँट ठन्डे पानी के हलक़ से नीचे उतार लिए ..हलक तर हुआ तो बदन में ताजग़ी आ गई। उसने छागल का मँुह बंद किया और फिर कन्धे पर टाँग  कर, डन्डे के सहारे आगे बढऩे लगा...अब क़दम पहले से बड़े हो गए थे।
     65  साल के बाद अपने गांव वापस लौट रहा था। नहीं चाहता था यहां आना लेकिन दिल के हाथों मजबूर हो गया। सोचा अब जि़न्दगी बची ही कितनी है? इन आखऱी दिनों में एक बार गांव तो ज़रूर देख ले। यह हसरत लेकर इस दुनिया से न जाय कि वह कभी गांव वापस लौटा ही नहीं।
वह गांव के अंदर था। जैसे ही गांव की मिट्टी की खुशबू, उसने सूँघी, उसके मुरझाए बदन में ताजग़ी आ गई। एक नई ताक़त का संचार हुआ। सारी थकन काफ़ूर हो गई। अब वह तरोताज़ा था। घन्टों गांव में घूम सकता था।
   वही गांव था। वही रास्ते थे। वही गलियां थी मगर सब कुछ बदला हुआ था। नया-नया था। अब न कुछ पुराना था। न कोई पुराना था। गांव का हर घर पक्का था। हर तीसरे-चौथे घर के सामने ट्रेक्टर, मोटर-साइकल, थ्रेशर, चारा मशीनें थीं। घर पर एंटीना थे। घरों के बाहर जगह -जगह नल लगे हुए थे। आते-जाते लोगों के हाथों में मोबाइल थे। जिनकी घंटियाँ बज रही थीं। बातें हो रही थीं। लेकिन अगर कुछ नहीं बदला था तो वो उन घरों का मुक़द्दर था जो आज भी टूटी-फूटी झोंपडिय़ों की शक्ल में दूर से ही दिखाई दे रहा था। जो गांव से कुछ दूर हट कर थीं। जहाँ उसका बचपन गुजऱा था। जहां वह खेल-कूद कर बड़ा हुआ था। जहाँ उसके चाहने वाले रहते थे। लेकिन क्या अब भी वहां कोई उसे पहचानने वाला होगा?
  वह गांव में टहलता रहा। लोग उस पर एक निगाह डालते और आगे बढ़ जाते। वह लोगों को पहचानने की कोशिश करता। फिर मायूस हो जाता। उसने सड़क और गलियों के कई चक्कर लगाए लेकिन न वह किसी को पहचान सका और न किसी ने उसे पहचाना। लेकिन उसे बार-बार रास्ते पर चलते हुए देख कर लोगों को आश्चर्य ज़रूर हुआ। एक घर के सामने बैठे एक आदमी ने उससे पूछ ही लिया।
बाबा क्या कुछ ढूंढ रहे हो ?
हाँ, उसने एक छोटा सा जवाब दिया।
 क्या ?
वो जो था...मगर अब नहीं है और न वापस आएगा..
क्या बाबा ?
 वह कुछ न बोला। चुपचाप खड़ा, ख़ाली-ख़ाली आँखों से चारों तरफ देखता रहा। सामने वाले ने फिर पूछा।
 परदेसी हो ?
 हाँ...अब परदेसी ही जानो..
कोन जाति के हो?
क्या रखा है इन जातियों में ?...मनुष्य हूँ। ...क्या यह काफ़ी नहीं है ?
नहीं...यह काफी नहीं है। सवाल करने वाला उसे घूरता हुआ बोला... अगर हमारी जाति के हो तो आओ...पास बैठो...कुछ जल-पान कर लो....
बूढ़ा मुस्कुराया। तुम्हारी जाति क्या है ?....कुछ नहीं...हमारी जाति क्या है...कुछ नहीं...उस पर हमारा अधिकार नहीं है। क्योंकि हमारा जन्म हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करता।...जिस के घर पैदा हुए। वही बना दिए गए...वही बन गए।...वैसे एक मनुष्य का बच्चा..केवल मनुष्य ही होता है....बाक़ी बातें तो?...छोड़ो भी...हां तुम्हारे पूछने का धन्यवाद....चलता हूँ....
 यह कह कर, वह आगे बढ़ गया। सवाल करने वाला उसे जाता देखता रहा। अब उस का रुख़ उस जानिब था, जिधर झोंपडिय़ां थीं। वह गलियों और पक्के रास्तों से गुजऱता हुआ उस जगह निकल आया, जहां एक पुराना, ऊंचा, बड़ा सा कुआं था। जिस पर चढऩे के लिए सीढिय़ां बनी हुई थीं। उसके क़दम रुक गए, उसने देखा, एक रस्सी से बंधी हुई, एक बाल्टी, उसकी मुंडेर पर रखी हुई है। कहीं से एक बच्चा भागता हुआ आया और सीढिय़ां चढ़ कर बाल्टी के पास पहँुच गया, झुक कर बाल्टी उठाना ही चाहता था कि बूढ़ा ज़ोर से चिल्लाया।
उसे न छूना....
बच्चे ने घूम कर उसे देखा और उसकी परवाह किए बग़ैर बाल्टी उठाई और रस्सी के सहारे कुएं में डाल दी ।
बूढ़े का सारा बदन काँपने लगा। वह जहाँ था। वहीं बैठ गया उसने अपने दोनों हाथ फैलाए और उसकी निगाह उन निशानों पर ठहर गई जो उसकी हथेलियों पर अब भी मौजूद थे। धूप पड़ी तो सफ़ेदी चमकने लगी। कुछ मन्जऱ उभरने लगे....
     एक मासूम चेहरा। उम्र 8 -10 साल...बेफि़क्री, बेखौफ  जि़न्दगी, खेल-कूद की उम्र...गाँव की कच्ची-धूल भरी सड़कों पर भागते हुए।...गलियों में घूमते हुए....न गर्मी की फि़कर...न जाड़े की चिन्त्ता। नंगे पैर, नंगे बदन, हवाओं से बात करता हुआ, धूप को मँुह चिढ़ाता हुआ। बादलों के सँग...बारिश में नहाता हुआ। कभी यहाँ....कभी वहां....कभी खेतों में....कभी बागों में। बस अगर कमज़ोर पड़ा तो सिर्फ पेट के आगे।...भूख लगी...प्यास ने आवाज़ दी। वह एक बाग़ में घुस गया। रखवाले से नजऱ बचाई। पेड से अमरुद तोड़े और भाग कर कुएं की ,ऊँची दीवार की आड़ में छिप कर बैठ गया। और जल्दी- जल्दी उन्हें खाने लगा। बीच बीच में इधर -उधर देख भी लेता। अमरुद मीठे थे। खाने में मज़ा आया। जब पेट भर गया। तो प्यास ने फिर आवाज़ दी। वह खड़ा हो गया सीढिय़ों के पास आया। ऊपर निगाह की। पानी से भरी बाल्टी मुंडेर पर रखी ,उसे अपने पास बुला रही थी। उसने एक बार फिर चारों तरफ देखा। दूर-दूर तक कोई नजऱ न आया। वह दौड़ता हुआ सीढिय़ाँ चढ़ गया। बाल्टी के पास पहुंचा और उकुड़ूं बैठ गया। बाल्टी को थोड़ा अपनी तरफ झुकाया...चाहता था कि चुल्लू में पानी लेकर पिए। तभी एक तेज़ आवाज़ ने उसे चौंका दिया।
अबे...साले...क्या कर रहा है ?
      बाल्टी उसके हाथ से छूट गई। घबरा कर खड़ा हुआ तो ठोकर लगी और पूरी बाल्टी कुएं के अंदर चली गई। उसने भागना चाहा लेकिन तब तक पानी का दावेदार उसके सर पर पहुंच चुका था। एक ज़ोर की लात उसके पड़ी। वह लुढ़क गया। वह सम्हलता, तब तक आने वाले ने उसे अपनी लातों पर रख लिया।...वह प्यासा था...वह रो रहा था...वह चीख रहा था...माफ़ी मांग रहा था। लेकिन मारने वाला उसे मारे जा रहा था।
.....तेरी हिम्मत कैसे हुई बाल्टी छूने की ?...इस कुएं से पानी पीने की?...तेरे अम्मा-बाबा ने तुझे बताया नहीं था कि इस कुएं से तुझ जैसे अछूतों का पानी पीना मना है ?...अब तेरी अम्मा के जब डन्डा होगा, तब सब याद रहेगा...
  ख़बर हवा के पँखों पर सवार पूरे गांव में घूम गई कि एक नीच जाति ने कुएं का पानी अपवित्र कर दिया है। जऱा सी ही देर में पूरा गाँव इक_ा हो गया।
     नफरत में भी कितनी ताक़त होती है? इन्सानियत उसके सामने बेबस नजऱ आती है। यहाँ का मंजऱ अपनी पूरी शैतानियत के साथ, हर एक के दिल को ठन्डक पहुंचा रहा था। वे गालियाँ बक रहे थे- क़हक़हे लगा रहे थे। और उनके बीच घिरा एक मासूम बच्चा थर-थर कांप रहा था। कुछ लोग आगे बढ़े और उसे पकड़ कर ज़मीन पर लेटा दिया। चार खूँटे गाड़े गए और उसके हाथ-पाँव, उनसे बांध दिए गए। सूरज उसके चेहरे पर था। लेकिन अब उसे प्यास नहीं लग रही थी। क्योंकि भीड़ जिस तरह से उसका गला तर करने के लिए बजि़द थी उसके लिए वह तैयार नहीं था। वह इन्कार में अपना सर हिला रहा था...होंठ भींचे था और कुछ लोग अपना कच्छा उतारे उसे घेरे थे।
...ले...पी.....बहुत प्यासा है न ?....ले....अब पी ले....
   तभी उसे अपने अम्मा-बाबा की आवाज़ सुनाई दी। उसने गर्दन घुमा कर देखा। वे ज़मीन पर लोटते, धूल सर पर डालते, दोहाइयां देते, माफ़ी मांगते नजऱ आए।
सरक़ार...मालिक...अन्नदाता...छमा कर दें...बहुत बड़ी ग़लती हो गई। बच्चा है...नादान है...माफ़ी दे दें...
लेकिन किसी ने भी उनकी न सुनी। बल्कि वो धुनाई की, कि कोई धुनियाँ भी रुई की ऐसी धुनाई न करता होगा। वे लहू लुहान ज़मीन पर पड़े, गिड़गिड़ा रहे थे और चौधरी तेज़ आवाज़ में चीख़ रहा था।
 तुम लोगों के कारण, हमारे पुरखों का कुआं, अपवित्र हो गया है..अब इसे पवित्र करने के लिए गंगा जल डालना होगा...हवन करना होगा...और जिसने इसे गन्दा किया है उसे गांव की परम्परा के अनुसार दंड मिलेगा...
  जख्मी मां-बाप चीख उठे। दया मालिक...दया...बच्चा है सरकार....उसके बदले हमे दंड दे दें...उसे छोड़ दिया जाय...सरकार...
   चौधरी गरजा....
नहीं...कदापि नहीं...जो पापी है....जिसने पाप किया है। दंड भी उसी को ही  मिलेगा....
      चौधरी ने इशारा किया। दो आदमियों ने उस बच्चे की कलाइयों को पैरों से दबाया, कमल की तरह दो नन्ही-नन्ही हथेलियाँ खुल गईं। एक आदमी बढ़ा और उसकी पंखुडिय़ों पर अँगारे रख दिए। एक चीख़ थी जो आसमान तक जा रही थी। लेकिन वहां भी....सुनने वाला...नहीं सुन रहा था।
   बूढ़े ने एक झुरझुरी ली। और घबरा कर खड़ा हो गया।
अब वह उस पगडन्डी से गुजऱ रहा था। जो उसे उन झोपडिय़ों तक पहुंचा सकती थी। जहाँ वह पहली बार रोया था। इसी रास्ते के बीच वो बाग़ था जहां से वह अक्सर अमरुद चुरा कर खाता था। जब वह उस बाग़ के कऱीब पहुंचा तो रुक गया। बहुत सी खट्टी-मीठी यादें ताज़ा हो गईं, वह मुस्कुरा उठा। उसे वो पेड़ नजऱ आया, जो कभी उसका मददगार बना था। वह उसके कऱीब पहुंचा। ऊपर से नीचे तक उसे देखा। पहले से अब वो काफी मोटा व मज़बूत हो गया था। उसने हाथ बढ़ा कर, बड़े प्यार से उसे छुआ। और सर उठा कर ऊपर देखने लगा। उसने उस शाख़ को पहचाना। जहाँ वह छिप कर बैठा था। अब उस शाख़ से कई शाख़ें निकल आईं थीं। वह एकटक उसे देखता रहा। और मुस्कुराता रहा। उसे लगा जैसे डाल उस से मुख़ातिब है-
कैसे हो ?...बड़े दिनों के बाद आए ?...उस दिन तो बड़ा मज़ा आया था....मैं तो झूम-झूम उठी थी...
   बूढ़ा हँसता हुआ बोला -
 हाँ....मुझे भी बड़ा मज़ा आया था....
 वह उसी पेड़ से टेक लगा कर बैठ गया और उस दिन का दृश्य, उसकी आँखों में जि़ंदा हो गया।
वह डाल पर पत्तों की आड़ लिए छिपा बैठा था। उसके एक हाथ में गुलेल थी। दूसरे हाथ में नोकीले पत्थर। उसकी नजऱ सड़क पर थी। उसे इन्तिज़ार था अपने शिकार का। अधिक समय नहीं गुजऱा। उसे अपना शिकार आता नजऱ आया। उसने अपनी हथेलियों के ज़ख्म पर, जो पक कर अब सूख गए थे, एक निगाह डाली। गुलेल में पत्थर लगाया। और जैसे ही उसका शिकार, उसके निशाने की ज़द में आया। उसने गुलेल चला दी। निशाना ठीक लगा। पत्थर उसके पंजे में घुस गया वो चीखा। अपना दूसरा हाथ, पहले हाथ पर रख लिया। लेकिन तब तक दूसरा पत्थर निकला और उसका दूसरा पंजा भी तोड़ गया। वह आदमी दर्द से चीखता हुआ ज़मीन पर लोटने लगा...वह पेड़ से कूदा। और उसके कऱीब पहुंच गया। उसके सिरहाने खड़े होकर, अपना कच्छा उतरता हुआ बोला...
जो दोगे...वही वापस लोगे...झुके सर.... कभी तो उठेंगे।
फिर हँसता हुआ ऐसा भागा कि शहर जा कर ही दम लिया।
बूढ़े ने अपनी छागल कन्धे से उतारी। कुछ घूँट पानी के पिए और उसका मँुह बंद करते हुए उस रास्ते की तरफ देखने लगा जो नदी की तरफ जाता था। यह नदी गांव से 5-6 किमी की दूरी पर थी। जहाँ से अछूत औरतें पानी ले कर आती थीं। जब वह छोटा था तो उसकी माँ भी बड़े सवेरे घर का सारा काम निपटा कर नदी से पानी लेने चली जाती थी और दोपहर में जब वह लौटती तो उसे वह बहुत अच्छी लगती। क्योंकि वह नहा-धो कर, साफ़ कपड़ों में, अपने सर पर 5 -5 गगरियाँ रख, जब धीमी-धीमी चाल से आती नजऱ आती तो उसे ऐसा लगता जैसे उसकी माँ का क़द बहुत ऊँचा हो गया है। वह बादलों को छू रही है और बादल अपने हिस्से का सारा पानी उसकी गगरियों में उँडेल रहे हैं।
उसने नजऱ घुमा कर झोंपडिय़ों की तरफ देखा जो कुछ ही फासले पर थीं। बाहर बच्चे खेल रहे थे। मर्द...कुछ बैठे चिलम से धुआं उड़ा रहे थे कुछ काम कर रहे थे। उसने उठने की सोची। तभी उसकी निगाह फिर नदी के रास्ते की तरफ़ घूम गई।...उसे हैरत हुई। उसकी आँखें फैल गईं। वह एकटक उधर देखता रहा। उसकी माँ जैसी औरतें लाइन से चली आ रही थीं। उसने एक निगाह गांव के पक्के मकानों की तरफ डाली और फिर उन औरतों की तरफ देखने लगा। धीरे -धीरे वे सब उसके कऱीब पहुंच गईं। उसने चाहा कि वह उनसे बात करे लेकिन फिर कुछ सोच कर अपने होंठ सी लिए। वे औरतें उसे देखती हुर्इं उसके कऱीब से गुजऱ गईं। अभी उन्होंने आधा रास्ता ही तय किया था कि गांव की तरफ से शोर उठा। औरतों के क़दम तेज़ हो गए...उधर शोर तेज़ हो गया। वे भागी...बैलेंस बिगड़ा। गगरियाँ छलकी और फिर एक के बाद एक नीचे गिर कर टूट गईं और वे सब झोंपडिय़ों की तरफ दौड पड़ीं। बूढ़ा घबरा कर खड़ा हो गया। झोंपडिय़ों से मर्द निकले...बाहर बैठे खड़े हो गए। सब ने आपस में कुछ बात की।...शोर बढ़ता रहा। फिर वे सब दौड़ते हुए उसके कऱीब से निकल गए। बस एक बूढ़ा, उनके पीछे, कमर पकड़े, धीमे-धीमे क़दमों से आता नजऱ आया। जब वह उसके कऱीब पहुंचा तो रुक गया। दोनों ने एक दूसरे को ग़ौर से देखा और आने वाला चीख पड़ा -
अरे....मधईया....तू...?
 मितवा ?...तुम?....
 हाँ...हाँ...मैं मितवा हूँ। तुम्हारा बचपन का दोस्त...फिर दोनों एक दूसरे से लिपट गए। मगर फ़ौरन ही अलग हो गए क्योंकि गांव का शोर बहुत तेज़ हो गया था। मधईया ने पूछा यह कैसा शोर है?...कुछ देर पहले तक तो सब कुछ शान्त था
   मितवा की धुन्धली आँखें कुछ ज़्यादा धुन्धला गईं। वह मधईया के चेहरे की तरफ देखता हुआ बोला...
 लगता है...आज फिर कोई प्यासा मधईया...चौधरियों के कुएं पर चढ़ गया है....
   बूढ़े ने घबरा कर अपनी दोनों हथेलियाँ बग़लों में दबा ली।
   वह सोच रहा था.... इतने समय के बाद...आज भी, उस जैसी हथेलियों के लिए अँगारे मौजूद हैं ।