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Tuesday 21 Nov 2017

अक्षर पर्व ने अपने नये कलेवर के साथ समयबद्ध निरन्तरता बनाने के साथ ही एक विचार प्रधान पत्रिका के रचनात्मक आस्वाद को भी साकार किया है।

विवेक कुमार मिश्र
ठ-3, 603-604, महालक्ष्मीपुरम् बाराँ रोड़, कोटा, (राज.)-324001

अक्षर पर्व ने अपने नये कलेवर के साथ समयबद्ध निरन्तरता बनाने के साथ ही एक विचार प्रधान पत्रिका के रचनात्मक आस्वाद को भी साकार किया है।
यह कहा जाना जरूरी है कि अब अक्षर पर्व पूरी तरह से आधुनिक साज सज्जा व तकनीकी से न केवल सँवर गई है बल्कि वैचारिकता की धार को भी तेज कर रही है। साहित्य, संस्कृति व राजनीति के संतुलन व संबंध से लोकतंत्र को रचने में अक्षर पर्व की भूमिका सराहनीय है। हमारी संस्कृति की रक्षा लोकतांत्रिक मूल्यों व विचार सरणियों के सम्मान से ही सम्भव है।
राजेन्द्र उपाध्याय द्वारा दफ्तर बनाकर लिखने की प्रकृति या दफ्तर बनाकर लिखने के बहाने से मानव स्वभाव की अच्छी चुटकी ली गई है। जो स्वाभाविक होता है उसके लिए किसी प्रदर्शन की जरूरत नहीं होती। लेखन भी जीवन की तरह ही एक लेखक के लिए स्वाभाविक प्रक्रिया होती है। और जो लेखक नहीं है वह चाहे जितने जतन कर ले, अभ्यास कर वह लेखक नहीं हो सकता। भले लिख-लिख कर कई टन संदूक भर ले-पर वह लेखक कहाँ से होगा- जब तक वह स्वाभाविक नहीं होगा। यह व्यंग्य/टिप्पणी स्वाभाविक रूप से लेखक बनने की प्रक्रिया में लगे भाई लोगों को कुछ तो समझायेगी।
पत्रिका अच्छे रूप और कथन के साथ आ रही है।