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Saturday 18 Nov 2017

लोक संस्कृति पर केन्द्रित अक्षर पर्व का उत्सव अंक पढ़ा।

विश्वजीत मजूमदार
शिवानंद नगर, फेज-4
रायपुर (छत्तीसगढ़)

लोक संस्कृति पर केन्द्रित अक्षर पर्व का उत्सव अंक पढ़ा। आज जब लोक संस्कृति के सारे अव्यय धीरे-धीरे सुसुप्तावस्था में जाने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं तब उसे प्राणवायु देने जैसी इस कोशिश की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। भाषिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक  विविधता से भरी इस धरती की चतुर्दिक संपन्नता को आपने जिस संपादकीय कौशल से गागर में सागर भरते हुए समेटने की कोशिश की है उसकी भी तारीफ करनी ही पड़ेगी।
आलोच्य अंक में सुश्री ई. विजय लक्ष्मी का आलेख- मणिपुरी लोकगाथाओं में प्रतिरोध और श्री हरिहर वैष्णव का शोधपरक लेख- बस्तर के लोक साहित्य में पानी, के अलावा श्री सुभाष रंजन की रचना- ढाक की विरासत ने विशेष रूप से प्रभावित किया।
श्री सुभाष रंजन जी ने विलुप्त होती ढाक की विरासत को बचाने की आवश्यकता को मानवीय पीड़ा के साथ बड़ी मार्मिकता से उभरा है । उन्होंने ढाकी शिबूदास के मार्फत मानो हाशिये पर चले गए समस्त लोक कलाकारों की व्यथा को एक आकार दिया है – आज जो ढाक के बोल में बदलाव देख रहे हैं न, यह उसकी आत्मा पर किया जा रहा प्रहार है। अब ढाक नहीं शोर बजता है । ....... हमारे बच्चे तो ढाक बजाना ही नहीं चाहते पर हमसे तो बगैर ढाक बजाए रहा भी नहीं जाता। माँ दुर्गा ने हमें सेवा का सुनहरा मौका दिया है, हम कैसे छोड़ सकते हैं ढाक बजाना।  कमोबेश हर लोक कलाकार की यही पीड़ा है । अर्थ प्रधान समाज में आत्म संतुष्टि और आत्मानंद के लिए कला को अपनाना एक बड़ी चुनौती है। शायद कलाकार अर्थोपार्जन के लिए कोई दूसरा संसाधन जुटा भी ले पर अगर उसकी कला का सुध लेना वाला कोई न हो, सरकारी विभाग भी आँख फेर ले तो वह बेचारा क्या करे? सुभाष जी ने ठीक ही कहा है –उत्साह पाकर ही कलाकार कला के प्रति समर्पित होता है। शिल्पी को पैसों से ज़्यादा प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है। एक छोटा सा मानपत्र, दशकों की तालियाँ और सम्मान की भूख एक कलाकार को बचाए रखती है। डॉ. शंकर मुनि राय का तुलनापरक आलेख-भोजपुरी कहावतें और छत्तीसगढ़ी हाना भी दिलचस्प लगा। कुल मिलाकर यह एक गवेषनापूर्ण,ज्ञानवद्र्धक और सहेज कर रखने योग्य अंक बन पड़ा है। साधुवाद ।