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Wednesday 22 Nov 2017

लेखन संपादन से ललित सुरजन अपने छात्र जीवन में ही जुड़ चुके थे, तभी तो उनके लेखन में एक धार है।

 

नवनीत कुमार झा
हरिहरपुर, दरभंगा (बिहार)
लेखन संपादन से ललित सुरजन अपने छात्र जीवन में ही जुड़ चुके थे, तभी तो उनके लेखन में एक धार है। अक्टूबर 14 की प्रस्तावना में उन्होंने पाठकों से निजी संस्मरण साझा किया है। प्रस्तावना से माधवराव सप्रे के व्यक्तित्व से वाकिफ हुआ है। हम जैसे हैं, वैसे ही रहें एक स्तरीय ललित निबंध है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा पर चंद्रकिशोरजी ने बहुत अच्छी कहानी लिखी है। उनके पैर छूने को मन करता है। एक प्यार ऐसा भी कहानी में मासूम प्यार को दिखाया गया है। ये कहानी थोड़ी लंबी होती तो पात्रों को थोड़ा सा खुलने का मौका मिलता। मानवमन की सिलवटों को खोलती सिलवटें कहानी बहुत पसंद आयी। पुन्नी सिंह की कहानियों यथार्थ की प्रतिछवि होती हैं। रोजगार-बेरोजगार भी इसका अपवाद नहींहै। कविताएं सभी पसंद आयीं। सांप्रदायिकता के खिलाफ खुलकर धर्मनिरपेक्षता पर लिखने, बोलने वाले इतिहासकार प्रो.विपन चंद्रा का निधन अपूरणीय क्षति है। उन्हें उपसंहार में उचित ही याद किया गया है।
नवंबर के उत्सव अंक को इस बार लोकसंस्कृति विशेषांक का रूप दे कर एक महान कार्य किया है। आज का दौर सांस्कृतिक संक्रमण का दौर है और हमारी संस्कृति भीतरी और बाहरी खतरों से जूझ रही है। ऐसे में अक्षरपर्व के अंक को लोकसंस्कृति विशेषांक के रूप में प्रस्तुत करना निश्चय ही हमारे सांस्कृतिक चेतना को सबल बनाने का महान प्रयास है।
 उपसंहार के स्थान पर सुप्रसिध्द और प्रतिष्ठित कवयित्री पद्मा सचदेव से लोकगीतों के विभिन्न पक्षों पर की गई बातचीत ने मुझे आनंदित किया। पद्मा सचदेव लोकगीतों को गढऩे और गाने को रोजगार से जोडऩे की बात कर रही हैं तो मैं भी इसका समर्थन करता हूँ क्योंकि इससे लोकगीत, जो दिल से निकलने वाली आवाज है, चिरकाल तक गूँजेगे।
स्व. विष्णु प्रभाकर से महावीर अग्रवाल द्वारा लिया गया साक्षात्कार पढऩे को मिला, इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ। निरंतर गतिमान रहने वाली लोकसंस्कृति पर स्व.विष्णु प्रभाकर के विचार बहुमूल्य हैं। खास कर इन पंक्तियों- लोककला और लोकसंस्कृति से जुड़े हुए ग्रामीण अंचल के लोग हम लोगों की तुलना में अधिक सुखी, अधिक संतुष्ट और अधिक संवेदनशील हैं-से असहमति का प्रश्न ही नहीं उठता है। इस बातचीत से लोकसंस्कृति को गहराई से समझने का सुअवसर मिला ।
मेवाड़ के जनजातीय समाज के उत्सवधर्मी संस्कृति पर केन्द्रित आलेख में गवरी नृत्य का बखान किया गया है। मेवाड़ के इस विश्व प्रसिध्द गवरी नृत्य से प्रथम परिचय करवाने के लिए मैं डॉ.श्रीमती अजित गुप्ता को धन्यवाद देना चाहता हूँ ।
बिदेसिया के अमर रचनाकार भिखारी ठाकुर भोजपुरी भाषा और संस्कृति के एक रत्न थे। बिदेसिया लोकनाट्य परंपरा भोजपुरी लोकसंस्कृति का एक अभिन्न अंग है। इस नाट्य शैली के माध्यम से भिखारी ठाकुर ने समाज में व्याप्त कुरीतियों, कुप्रथाओं को दूर करने का प्रयास किया था। उनके नाटक कल भी प्रासंगिक थे, आज भी प्रसंगिक हैं और कल भी प्रासंगिक रहेंगे।
प्रकृति जहाँ जिद्दी माँ है, एक अद्भुत आलेख है। जिसमें पूर्वोत्तर भारत की प्राकृतिक छटा का मनोरम एवं अलौकिक वर्णन किया है भरत प्रसाद ने। पूर्वोतर भारत के निश्छल सौन्दर्य का ऐसा जादू छा गया कि मैं इस आलेख में डूब गया। भरत प्रसाद की वर्णन क्षमता ने मुझे चमत्कृत किया। स्वप्निल वातावरण और श्रमपूर्ण समाज वाले पूर्वोतर भारत के शब्दातीत सौन्दर्य से लबालब संस्कृति की गोद में जाने को मन ललक उठा !
शान्त पानी या नदी के किनारे रहने वाले शान्त प्रकृति के मिसिंग जनजाति के लोक साहित्य के बारे में पढना एक दुर्लभ अनुभव था। लगता है डॉ. दिनेश कुमार चौबे ने मिसिंग जनजाति के लोक साहित्य और लोक संस्कृति का व्यापक अध्ययन किया है। मणिपुरी लोक गाथाओं में प्रतिरोध के स्वर को पकडऩे का प्रयास किया है ई. विजय लक्ष्मी ने। लोक गाथाओं में प्रतिरोध के विभिन्न रूपों को दर्शाते हुए उन्होंने एक अच्छा आलेख लिखा है।
यह उत्सव अंक संग्रहणीय है। शोधार्थी और भारतीय संस्कृति के अध्येताओं के लिए अत्यंत उपयोगी अंक के संपादन के लिए आपकी सराहना करता हूँ ।