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Thursday 20 Sep 2018

\'अक्षर पर्वÓ का अक्टूबर अंक मेरे लिए कई मायने में महत्वपूर्ण है।

 

-मार्टिन जॉन, अपर बेनियासोल, पो. आद्रा
जिला- पुरुलिया (पश्चिम बंगाल), मो. 09800940477

'अक्षर पर्वÓ का अक्टूबर अंक मेरे लिए कई मायने में महत्वपूर्ण है। माधवराव सप्रे के बारे में अब तक की मेरी जानकारी सतही थी। ललित सुरजन की प्रस्तावना से इस मनीषी से जुड़ी मेरी जानकारियों में इजाफा हुआ। एक समय 'हंसÓ पत्रिका के संपादक स्व. राजेन्द्र यादव की सम्पादकीय 'तेरी मेरी उसकी बातÓ का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता था। उसी तरह हर माह प्रस्तावना की प्रतीक्षा बड़ी बेताबी और व्याकुलता के साथ करता आ रहा हूं।
इस अंक में अपने पसंदीदा कथाकार पुन्नीसिंह को पढ़कर आत्मिक तुष्टि की अनुभूति हुई। दरअसल पुन्नीसिंह जैसे लेखकों को पढऩा पाठकों के लिए वक्त का सही इस्तेमाल है- 'रोजगार-बेरोजगारÓ कथा रचना में बेरोजगार राजकिशोर की मनोव्यथा और उसकी बेरोजगारी से उत्पन्न पारिवारिक कड़वाहट का बड़ा सजीव और मार्मिक चित्रण किया है कथाकार ने।
'कटैयाÓ, 'सिलवटेंÓ और 'एक प्यार ऐसा भीÓ भी अक्षर पर्व के स्तरानुकूल, रुचिकर और पठनीय कथा रचनाएं हैं। 'कटैयाÓ (चन्द्रकिशोर जायसवाल) की बाढ़ की विभीषिका से उत्पन्न त्रासदी और उससे निबटने की कोशिश/जद्दोजहद को बड़ी संजीदगी के साथ बयां किया गया है। 'सिलवटेंÓ (विकेश निझावन) एक स्त्री की हैरतअंगेज क्रूर मिजाज और भयावह बदसलूकी की कहानी है। 'एक प्यार ऐसा भीÓ (संगीता झा) बचपन की मुहब्बत की दास्तां है। ऐसी पुरसुकून और खुशनुमा दास्तां जिंदगी की आखिरी सांस तक जिंदा रहती है। छलछलाती संवेदना, तरंगित जज़्बात, वैचारिक ताप से लबालब इस अंक की समस्त काव्य रचनाएं पाठकों से स्वयं को पढ़वा लेने का दम$खम रखती हैं। परन्तु जो काव्य रचनाएं मन-मिजाज को बेहद संवेदित, विगलित, विचलित और प्रभावित करती हैं, वो हैं- 'एक लड़कीÓ (अनिता मिश्र), 'भुखमरी का गीतÓ (रमेश रंजक) और 'अखबार- दो नवगीतÓ (अनिरुद्ध नीरव)।
शेष रचनाएं निश्चित रूप से ज्ञानवद्र्धक,जानकारीपूर्ण और उपयोगी है।