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Tuesday 20 Feb 2018

\'उत्सव-अंक\' नाम से प्रकाशित नवम्बर माह का \'अक्षर-पर्व\'कतिपय कारणों से प्रशंसनीय है।

भरत शर्मा, रोड न.- 12, मगध कालोनी, गया, बिहार

'उत्सव-अंक' नाम से प्रकाशित नवम्बर माह का 'अक्षर-पर्व'कतिपय कारणों से प्रशंसनीय है। श्री ललित सुरजन जी की प्रस्तावना, लोकशब्द के साथ सौतेला व्यवहार तथा ढाक की विरासत लेखों में लेखक ने मौलिक चिन्तन, समाज और संस्कृति तथा लोक परम्परा के साथ आत्मीयता को मुखरित करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। 'ढाक की विरासतÓ में लेखक ने पारम्परिक लोकवाद्य की विशेषता व व्यापकता की चर्चा तो की ही है , उन्होंने इस परम्परा के पुरोधा समाज की दयनीयता की ओर भी ध्यान खींचने का प्रयास किया है। 'हमारे परिवार की पूजा तो यहाँ से लौटने के बाद ही हो पाती है..Ó आदि पंक्तियां मन को छू जाती हैं। 'पैसा नहीं प्रोत्साहनÓ इन तीन शब्दों में कलाकार की साधना, समर्पण और परम्परा की सुरक्षा का मन्त्र सा दे दिया गया है। यदि द्रविड़ संस्कृति से सम्बन्धित भी एक-दो लेख होते तो इस अंक को भारत के सांस्कृतिक इतिहास की लघु पुस्तिका कहा जा सकता था और यह संग्रहणीय अंक और अधिक स्पृहणीय हो जाता तथापि यह प्रशंसनीय और बधाई का पूरा-पूरा हकदार है। मैं इसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं।