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Monday 20 Nov 2017

गीता को राष्ट्रीय दर्जा

सर्वमित्रा सुरजन
गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करवाने की मानसिकता को इसी पृष्ठभूमि में समझने की जरूरत है। दरअसल भारत में सरकारी ठप्पों की अहमियत आवश्यकता से अधिक हो गयी है। कोई देशसेवा का महान कार्य करे, फिर भी उस पर पद्मपुरस्कार का ठप्पा लगाना जरूरी माना जाता है। भारत रत्न हासिल करने से पहले भी सचिन तेंदुलकर खेलप्रेमियों के लिए भगवान थे, अब ठप्पे के साथ वंदनीय हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी संस्था ग्लोबल इंस्पीरेशन एंड एनलाइटमेंट आर्गनाइजेशन आफ इंडिया की ओर से गीता की 5151 वींवर्षगांठ का आयोजन किया गया, जिसमें केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज की ओर से सुझाव आया कि गीता को भारत का राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित कर देना चाहिए। देश को इस समय दक्षिणापंथी शक्तियां निर्देशित, प्रेरित और संचालित कर रही हैं, इसलिए इस तरह की बातों, विचारों और सुझावों का सामने आना स्वाभाविक है। कहींताजमहल की ऐतिहासिकता को मनगढ़ंत कहानी में बदला जा रहा है, तो कहींलालच देकर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। हिंदुत्व की कुछ ऐसी तान छेड़ दी गई है, मानो अब तक यह हाशिए पर था और अब उसके असली रक्षकों ने मोर्चा संभाल लिया है। गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करवाने की मानसिकता को इसी पृष्ठभूमि में समझने की जरूरत है। दरअसल भारत में सरकारी ठप्पों की अहमियत आवश्यकता से अधिक हो गयी है। कोई देशसेवा का महान कार्य करे, फिर भी उस पर पद्मपुरस्कार का ठप्पा लगाना जरूरी माना जाता है। भारत रत्न हासिल करने से पहले भी सचिन तेंदुलकर खेलप्रेमियों के लिए भगवान थे, अब ठप्पे के साथ वंदनीय हैं। लेखक बड़े पुरस्कार पाकर महान बनता है। सरकारी अफसर का रूतबा उसकी लालबत्ती की गाड़ी से जाहिर होता है। और किसी सरकारी, राजनैतिक ओहदे पर न रहते हुए भी व्यक्ति का वीवीआईपी होना जेड श्रेणी की सुरक्षा से जाहिर हो जाता है। इसलिए शायद मोदी सरकार में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को गीता का महत्व बतलाने के लिए उसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करवाना जरूरी लगा। श्रीमती स्वराज प्रखर वक्ता हैं, अपनी बात को पुरजोर तर्क के साथ रखना उन्हें आता है। गीता की महत्ता साबित करने के लिए भी उनके पास कई तर्क होंगे। मुश्किल यह है कि भारत की अधिसंख्य जनता गीता को पहले से ही महान ग्रंथ का दर्जा देती आई है, उसके लिए न किसी को तर्क देने की आïवश्यकता है, न सरकारी आवरण ओढ़ाने की। गीता भारत की मात्र धार्मिक धरोहर नहींहै, बल्कि उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक आयाम कहींज्यादा विस्तृत हैं। यही कारण है कि प्राचीन काल में आदि शंकराचार्य से लेकर संत ज्ञानेश्वर ने इसकी व्याख्या  की। बाल गंगाधर तिलक, श्री अरविंद, विनोबा भावे, महात्मा गांधी सभी ने अपने-अपने ढंग से इस ग्रंथ को पढ़ा, समझा, अपने कार्यों में, जीवनशैली में उतारा और जनता को इसका अनुकरण करने की सलाह दी। अगर गीता का अस्तित्व 5 हजार साल पुराना मान लें, तो भी इन पांच हजार सालों में पहली बार गीता को लेकर ऐसा आग्रह देखने मिल रहा है। जबकि गीता की महानता इसमें ही है कि हर व्यक्ति उसे अपने ढंग से पढ़ता है, अपनी सोच निर्धारित करता है। किसी विशेष सोच को थोप कर गीता का सार ग्रहण नहींकिया जा सकता। और गीता ही क्यों, यह बात हर धर्मग्रंथ के साथ जुड़ी है। भारत की सुंदर विविधता को कायम करने में गीता समेत तमाम धर्मग्रंथों का योगदान है। फिर अकेले गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग जाहिर तौर पर अन्य ग्रंथों को दोयम दर्जे पर रखने की सोच दर्शाती है। हमारे लिए संविधान ही राष्ट्रीय ग्रंथ है, यह बात और है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर धार्मिक पुस्तक के रूप में गीता को संविधान से भी ऊपर मानते हैं। वे संघ के कार्यकर्ता रहे हैं, तो उनकी सोच ऐसी ही होगी। किंतु भारत के अधिसंख्यक लोग ऐसा नहींसोचते हैं। उनके लिए संविधान ही सबसे ऊपर है। संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्ष शब्द भी इस बात की इजाज़त नहींदेता कि किसी एक धर्म के ग्रंथ को राष्ट्रीय ग्रंथ का दर्जा मिले। गीता की लोकप्रियता, प्रासंगिकता, उपयोगिता, उपादेयता स्थान और समय की सीमाओं से परे बनी हुई है। उसे अकारण किसी विवाद का कारण न बनाया जाए, तो बेहतर है।