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Thursday 23 Nov 2017

\'समय की आंख नम हैÓ गीत संग्रह का लोकार्पण

समाज से गीत का गहरा रिश्ता है और विनय मिश्र के गीत अपने समय के यथार्थ को गहराई से व्यंजित करते हैं एवं बदलते परिवेश में मानव मन की स्थितियों का बखूबी बयान करते हैं। मुख्य अतिथि एवं जनधर्मी विचारक रामकुमार कृषक ने विनय मिश्र के समकालीन गीत संग्रह 'समय की आँख नम हैÓ के लोकार्पण के अवसर पर वक्तव्य देते हुए यह भी कहा कि समय के साथ गीत का स्वरूप भी बदला है और आज के गीत, भाव संवेदना के साथ विचार और जनसाधारण की आकांक्षाओं और वेदनाओं को भी सलीके से प्रकट करते हैं। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए गीतकार डॉ. माहेश्वर तिवारी ने कहा कि विनय मिश्र के गीतों में कई ऐसे देशज शब्द आते हैं जो हमारी बातचीत और रचनाकर्म के दायरे से बाहर हो गये हैं लेकिन उन लोकधर्मी शब्दों और संवेदनाओं की रक्षा के प्रति भी विनय मिश्र सचेत दिखाई पड़ते हैं। मुख्य वक्ता, वरिष्ठ आलोचक डॉ. जीवन सिंह ने कहा कि विनय मिश्र के गीतों में पुराने गीतों का रूमानी स्वर नहीं बल्कि सर्वत्र एक तनाव, एक क्षोभ, एक प्रतिरोध का स्वर है। गीत और कविता में कोई लड़ाई नहीं है और इसीलिए गीत विधा को अपने समय-संदर्भों के आलोक में कविता के बहुवचन में समझने की जरूरत है। वरिष्ठ कवि जुगमन्दिर तायल ने कहा कि कविता के साथ गीत की यात्रा भी साथ-साथ रही है और समय सापेक्ष हर बदलाव को सभी विधाएँ अपने-अपने तरीके से व्यक्त करती रही हैं।  वरिष्ठ कवि बलबीर सिंह करुण ने गीत को योजनापूर्वक कविता के विमर्श से अलगाने पर चिन्ता प्रकट करते हुए कहा कि गीतकार तो अपना कत्र्तव्य निभा रहे हैं किन्तु समीक्षकों को भी लयधर्मी विधाओं के प्रति उदार होने की जरूरत है। विनय मिश्र ने सभी अतिथियों और वरिष्ठ साहित्यकारों का स्वागत करते हुए इस आयोजन को पिछले महीने दिवंगत हुए लेखक और समाजकर्मी सुरेश पंडित की स्मृति में समर्पित किया।