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Tuesday 21 Nov 2017

अच्छे दिनों में जरूरी है कविता

अरविन्द कुमार मुकुल
एल.एफ.27, श्रीकृष्णापुरी
पटना - 800001
मो. 09931918578
कविता मनुष्य की सहयात्री है। कविता में मनुष्य का सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद समाज के परिवर्तन के साथ-साथ आत्मा की गूँज भी समाई रहती है।     आज की कवयित्रियों में निर्मला गर्ग एक जाना-पहचाना नाम है और 'दिसम्बर का महीना मुझे आखिरी नहीं लगताÓ निर्मला जी की चौथी किताब है। इससे पूर्व 'यह हरा गलीचाÓ 'कबाड़ी का तराजूÓ और 'सफर के लिए रसदÓ छप चुकी है और पाठकों के बीच लोकप्रिय भी हुई। 'कबाड़ी का तराजूÓ को हिन्दी अकादमी दिल्ली का कृति पुरस्कार भी मिल चुका है।
निर्मला जी ने पहली कविता तब लिखी जब वे आठ वर्ष की थी और तबसे लिखने का सिलसिला जारी है। निर्मला जी मानती है कि कविता से रिश्ता हर रिश्ते से बड़ा और आत्मीय है। कविता ने विषम परिस्थितियों में कवयित्री का साथ दिया है। निर्मला जी कहती है- कविता से ही मैंने जाना-घर समाज में मेरी स्थिति दोयम दर्जे की नहीं है।ÓÓ प्रसिद्ध आलोचक जीवन सिंह के अनुसार, समकालीन हिंदी कविता का मुख्य प्रयोजन अपने समय के बहुआयामी जटिल यथार्थ से निष्पन्न सौन्दर्य भावना को वैश्विक दृष्टि से मानवीय अर्थ में परिभाषित करना रहा है। दूसरी तरफ  मुक्तिबोध मानते हैं कि कविता, विशेषकर आत्मपरक कविता ने हिन्दी साहित्य चिन्तन-धारा को अत्यधिक प्रभावित किया है। मुक्तिबोध ने अपनी एक कविता में लिखा है- 'तुम्हारी कविताएँ/जैसे सूरज के तपते हुए पठार पर गिरता हुआ झरना/भाप बनता है।ÓÓ कवि और आलोचक चंचल चौहान मानते हैं कि निर्मला जी की कविताएं उत्तर-आधुनिकतावादी 'अन्तवादÓ के खिलाफ  एक प्रतिरोध की तरह है इसी तरह मुक्तिबोध ने भी कहा था- 'नहीं होती, कहीं भी खत्म कविता कभी नहीं होती/कि वह आवेग-त्वरित काल यात्री है। ... परम स्वाधीन है यह विश्व-शास्त्री है। निर्मला गर्ग की कविताओं में विचार है जो पाठक को सोचने को मजबूर करता है। 'अच्छे दिनों में जरूरी है कविता, बुरे दिनों में और जरूरी है कविता, बुरे दिन अभी समाप्त नहीं होंगे, अभी और जरूरी होगी कविता सबके लिए। (पृष्ठ - 19) कवयित्री मानती हैं कि-''कविता चिर पुरातन है मादरे साहित्य हैÓÓ वे आगे कहती हैं कि- कविते ! तुम्हारी उदात्तता के क्या कहने, हाथ पकड़कर हमारा तुम बीहड़ में घुस जाती हो, वह बीहड़ फिर पूंजीवाद का हो या रिश्तों का, खोलती हो पोल पट्टी सत्ता के शतरंज की, आंखें यदि खुली हैं तो देख सकते हैं लोग, तुम उनके बीच ही लगे हो जो अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद में हैं, जुबान हो उनकी जिन्हें मुंह बंद रखना सिखाया गया, गर्भ से ही उनका सम्मान हो और संघर्ष भी- पददलित हुए जो सदियों से। (पृष्ठ - 22)
निर्मलाजी की कविताओं में विविधता है। साथ ही समय की पहचान है। मुकेश मिश्र के अनुसार: निर्मला गर्ग उन कवियों में है जो कविता में वैचारिकता के घोर पक्षधर हैं ओर अपने आग्रहों व सरोकारों को कविता में दो-टूक तरीके से अभिव्यक्त करती हंै। निर्मला गर्ग की कविता का बहुत स्पष्ट और लगभग केंद्रीय सरोकार अपने समय का समाज ही है। उसमें व्याप्त शोषण, हिंसा, गैरबराबरी और परतंत्रता की, उसमें समाहित ताकत और सत्ता के आतंक की निर्मला गर्ग ने अपनी कविता में लगातार गहरी संवेदनशीलता और समझ के साथ, बयान और पड़ताल की है। डा. राजकुमार शर्मा के अनुसार आलोच्य संकलन में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के असंख्य प्रकृति चित्रों से पाठक परिचित होता है। प्रकृति के रमणीय दृश्यों के बीच भी कवयित्री समाज के बुनियादी अंतर्विरोधों को आंखों से ओझल नहीं होने देती। अन्याय, शोषण और गैरबराबरी पर टिकी पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के मूल अंतर्विरोधों की समझ यहां भी सक्रिय रहती है। अच्युतानंद मिश्र के अनुसार निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि निर्मला जी की कविताएं भले ही प्रचलित अर्थों में स्त्री विमर्श की कविताएं न प्रतीत होती हों लेकिन है ये एक ऐसे कवि की कविताएं हैं जो यह मानता है दुनिया को अंतत: और हर हाल में बदलना चाहिए।