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Tuesday 21 Nov 2017

लोक संवेदना की रचनात्मक अभिव्यक्ति \'सहमा हुआ घर\'

शिवकुमार अर्चन
10 प्रिदर्शिनी ऋषि वैली, ई-8
गुलमोहन एक्सटेंशन
भोपाल-462039 (म.प्र.)
मो.- 09425371874

वर्तमान काव्य परिदृश्य पर गीत के प्रति जो उपेक्षा भाव निर्मित किया जा रहा है, जिसे वैमनस्यता और योजनाबद्ध ढंग से हाशिए पर ढकेला जा रहा है, जो आलोचना निकष से निष्कासित है, जिसकी मृत्यु की घोषणाएं तक हो चुकी हैं, ऐसे समय में मयंक श्रीवास्तव का गीत संग्रह 'सहमा हुआ घरÓ एक माकूल जवाब की तरह अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराता है। गीत अनुभूति का छंद, आत्मा का संगीत और एक आदिम काव्य विधा है जिसने सदैव एकांत में, समूह में, त्योहार पर्व में, मांगलिक उत्सव, श्रम करते समय और जीवन से मरण तक मनुष्य के सहभागी सहचर की भूमिका अदा की है। गीत ने सदैव हमारी रागात्मकता और सांस्कृतिकता का संरक्षण और संवद्र्धन किया है। जब हम मयंक श्रीवास्तव के गीतों पर उतरते हैं, उनसे साक्षात्कार करते हैं, संवाद करते हैं तो पाते हैं कि उनके गीतों में शब्दों की एक लय है,अर्थ की लय है और एक मनोलय विद्यमान है जो गीत का वास्तविक प्राण तत्व है। लोक जीवन की संवेदना से परिपूर्ण अन्तर्धारा उनके गीतों में प्रवाहमान है। लोक जीवन की संवेदना को अर्जित कर उसकी ही, सटीक, रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए मयंक श्रीवास्तव के गीत जाने जाते हैं। प्रकृति और मनुष्य की सनातन पारस्परिकता का विह्वल और विरल स्वर उनके गीतों में सुनाई पड़ता है। खासतौर से नदी के प्रति जो उनके मन में आत्मीय भाव है, वेदना, अनुराग है, उसे वे बिम्ब प्रतीक और रूपकों के माध्यम से पूरी ईमानदारी के साथ प्रकट करते हैं।
'आह भरती है नदी/टेर उठती है नदी/और मौसम है कि उसके दर्द को सुनता नहीं (पृष्ठ-11) इसकी चर्चा नहीं तुम्हारी नई कहानी में/यहां हजारों बार लुटी है नदी जवानी में (पृष्ठ 15) उठ नदी अब और मत रो उठ नदी (पृष्ठ 54) एक नदी नाले में खोई (पृष्ठ 31)Ó इन गीतों में केवल नदी ही नहीं समूची प्रकृति के निर्मम दोहन की व्यथा कथा है, साथ ही कवि के प्रतिरोध का स्वर सार्थक हस्तक्षेप है। घर, आंगन, गांव, चौपाल, खेत, खलिहान,अमराई, मेले पगडण्डी, कुआ, नदी, पनघट की जातीय स्मृतियां मयंक श्रीवास्तव के अवचेतन में गहरी पैठी हुई हैं फलस्वरूप इनकी अभिव्यक्ति के रूपाकार हुए तीसरे चौथे गीत में सहज रूप से विन्यस्त है। यह कवि के अपनी जमीन के गहरे जुड़े होने के कारण संभव हुआ है। यह लोक चेतना का सैद्धांतिक नहीं व्यवहारिक पक्ष है।
कोई भी कविता सांस्कृतिक चेतना, राजनैतिक चेतना और अभिन्न सामाजिकता के बिना बड़ी नहीं हो सकती। गीतों के अभ्यांतर में इस अन्तर्धारा की निष्कलुष कल कल ध्वनियां सुनी जा सकती हैं। मयंक श्रीवास्तव के गीत गांव से शहर और महानगर की यात्रा के गीत हैं। निरंतर उजड़़ते गांव की व्यथा कथा दृष्टव्य है। ''गांव नंगा कर दिया है कारखानों ने/झोपड़ों को खा लिया पक्के मकानों ने (पृ. 23) दर्द की पगडण्डियों से खेत घायल है (पृ. 52), महानगर में खोए गांव/धूप हंसे और रोए छांव (पृ. 31)ÓÓ यह पीड़ा भी कवि मन को सालती है- ''क्या पता है कब मिलेंगे/गांव की चौपाल वाले दिनÓÓ (पृ. 33)
मुक्तिबोध ने अपने एक निबंध में कहा है कि 'समाज भयानक रूप से विषमताग्रस्त हो गया है। चारों ओर नैतिक हृास के दृश्य हैं। शोषण, उत्पीडऩ, नोंच खसोट, अवसरवाद भ्रष्टाचार का बाजार गर्म है।Ó आर्थिक उदारीकरण और घर में  घुस आए बाजार के वर्तमान युग का एक शब्द चित्र देखें- ''बडी़ दबंगी से आंगन में हल्ला बोला गया/घर आकर बाजार हमारी जेब टटोल गया।ÓÓ
जो रचनाकार आम आदमी की अनुभूति की संस्कृति और अभिव्यक्ति के रूप प्रकारों से जितनी गहराई से जुड़ा होगा उसकी रचना उतनी ही स्वाभाविक जीवन्त और सम्प्रेषणीय होगी। गहन संवेदना, सघन अनुभूति और अनुभव की गहराई से उद्भूत संकलन के गीत वस्तुत: अपने समय में झांकने की खिड़की की तरह हैं। इन गीतों के माध्यम से हम अपने समय को पहचान सकते हैं, जान सकते हैं कि हम कैसे क्रूर और कठिन समय में रह रहे हैं। सामाजिक जीवन के विरोधाभासों, विसंगतियों, प्रकृति से अनुराग और सामाजिक प्रतिबद्धता के बीच मयंक श्रीवास्तव का रचना संसार निर्मित होता है। प्रतिबद्धता की कुछ
पंक्तियां-
''अभी तो दर्द माटी का लिखूंगा और गाऊंगा/मिला जो वक्त लिख दूंगा कभी मैं गीत मौसम का (पृ. 79)।ÓÓ उनकी यह प्रतिबद्धता जो मनुष्य और मनुष्यता के पक्ष में खड़ी है, संकट में साहस देती है, बल देती है और आश्वस्त भी कराती है।
मयंक श्रीवास्तव के गीत अनेक बेचैनियों, तड़पऔर तेवर से भरे हैं ये हमें उद्वेलित भी करते हैं और हमारे संघर्ष को एक नई भाषा की ताकत देते हैं। अपने समय के विद्रूप पाखंड और विसंगतियों पर चोट करते ये उदाहरण दृष्टव्य हैं-  ''आग लगती जा रही है अन्न पानी में/और जलसे हो रहे हैं राजधानी में। (पृ. 35) शब्द की सामथ्र्य बौनी हो गई/अर्थ खुद ही कुर्सियों से जोड़ते रिश्ते (पृ. 38), सन्नाटों की रात हो गई/अफवाहों के दिन (पृ. 45) खुली हवा में भी अब जीना मुश्किल लगता है। (पृ. 87)ÓÓ
'सहमा हुआ घरÓ के बहुत सारे गीतों में यह प्रतिबद्धता, वैचारिकता, सामाजिकता, मनुष्यता और प्रतिरोध की आवाज विन्यस्त है। अभिधा में लिखे गए ये गीत व्यष्टि से समिष्ट में रूपांतरित होते हैं। अनुभूति और अभिव्यक्ति दोनों ही दृष्टि से रचनाओं का दायरा अन्य से भिन्न और विशिष्ट है। इन गीतों में भाषा का जंजाल नहीं हैा। खालिस जीवनानुभवों में पकी सीधी सच्ची भाषा इनका वैशिष्ट्य है। इन गीतों में नारे या कोई सिद्धांत नहीं है, बल्कि इनमें से समस्याओं से लडऩे और मुठभेड़ करने के औजार तलाश किए जा सकते हैं। गीतों में अभिग्रहण प्रक्रिया और रचनात्मक प्रभाव की क्षमता और विशेषता है। हमारी जातीय संस्कृति की जमीन को बचाए रखने की एक सार्थक कोशिश इन गीतों में दिखाई देती है जो शुभ है।