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Friday 24 Nov 2017

तृतीय मुक्तिबोध स्मृति व्याख्यान

   जनसंस्कृति मंच दुर्ग-भिलाई इकाई ने 23 नवम्बर को भिलाई के सभागार में तृतीय मुक्तिबोध स्मृति व्याख्यान के अंतर्गत युग कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कालजयी एवं सर्वाधिक चर्चित लंबी कविता 'अंधेरे मेंÓ के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 'शक्ति जो विकसित हुई थी देखने की अंधेरे मेंÓ विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया। मुख्य वक्ता प्रसिद्ध आलोचक श्री राजेन्द्र कुमार (इलाहाबाद) थे, तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता विचारक और लेखक श्री कनक तिवारी ने की। कार्यक्रम के आरंभ में युवा कवि घनष्याम त्रिपाठी के पहले कविता संग्रह 'समुद्र को बांधना अभी शेष हैÓ का विमोचन अतिथियों के द्वारा किया गया। रचनाकार ने संग्रह से अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया। कटक से आये चर्चित युवा कवि मृत्युंजय ने समसामयिक घटनाओं पर अपनी महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ किया। व्याख्यान के पूर्व प्रो. सियाराम शर्मा ने कविता 'अंधेरे मेंÓ पर संक्षिप्त परिचयात्मक टिप्पणी देते हुए कविता के चुने हुए अंशों का पाठ किया। उन्होंने कहा कि पचास वर्ष पूर्व लिखी इस कविता को समझना अपने दौर को समझने जैसा है। यह कविता हम जो हैं और जो होना चाहते हैं के बीच के अलगाव की कविता है। यह दुविधाग्रस्त मध्यवर्ग के क्रांतिकारी रूपांतरण की कविता है।
व्याख्यान का आरंभ करते हुए श्री राजेन्द्र कुमार ने कहा कि कविता 'अंधेरे मेंÓ के बाद का पिछला 50 वर्ष देश में नेहरू युग से भूमंडल युग की यात्रा है, औद्योगिक युग से तथाकथित स्वच्छ भारत तक यह देश परिवर्तित हुआ है। इसके साथ ही साथ मुक्तिबोध की इस लंबी कविता की प्रासंगिकता भी बढ़ती गई है। यह कविता लोकतंत्र के नाम पर छिपे फासीवाद की छानबीन करती है। इस कविता में कवि ने मध्य वर्ग को सम्बोधित किया है क्योंकि क्रांति का असल संकट मध्यवर्गीय संस्कार हैं, जिनसे लडऩे के लिए जिनमें परिवर्तन करने के लिए यह कविता रची गई है। सामाजिक परिवर्तन के लिए मध्यवर्ग का परिवर्तन होना आवश्यक है। आजादी के बाद सत्ता ने लगातार मध्यवर्ग को सम्मोहित करने का काम किया है, शासन मध्यवर्ग को मस्तवर्ग में तब्दील करने पर आमादा रहता है। यह कविता इस मोहग्रस्त दुविधाग्रस्त मध्यवर्ग से मुखातिब होती है।