Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

फ्रेंड-फिलॉसफर और गाइड मेरे नितांत अपने अशोक जी

सुरेश शॉ
8, पॉटरी रोड,
कोलकाता-700015
मो. 09163707510
sureshshawzv@gmail.com
कलकत्ता महानगर में किसी अनपढ़ व्यक्ति को यदि कुछ पढऩा, लिखना और सीखना हो या हम जैसे लोगों को कुछ और अधिक जानना-समझना हो तो हमारे लिये अशोक सेकसरिया के घर के दरवाजे हमेशा खुले होते। हम वहाँ बेधड़क चले जाते। वहां सबका स्वागत होता, सबको सत्कार मिलता। इस प्रकार कई लेखक, पत्रकार, कहानीकार, उपन्यासकार, चित्रकार, आलोचक, समाज-सुधारक वहाँ से अब तक गढ़े जा चुके हैं। दूसरों के घरों में काम करनेवाले कई निरक्षर नौजवानों को भी यहां साक्षर बनने का मौका मिला है। यह वही दो कमरोंवाला घर था, जहां कई गृहस्थों और राह भटके लोगों को नये सिरे से जीवन जीने की और सामाजिक-पारिवारिक तथा शादी-शुदा जोड़ों को व्यावहारिक जीवन जीने की प्रेरणा मिलती रही है। अशोकजी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह अपने संपर्क में आनेवाले हर शख्स की समस्याओं का समाधान सामाजिक सरोकार के आईने में करते थे।
देश-दुनिया में बहुतेरे लोग गौतम बुद्ध को कोई 'संतÓ नहीं, एक 'विद्रोहीÓ मानते हैं। इसके पीछे तर्क यह है कि बुद्ध ने पिता, पत्नी, संतान व राजसत्ता से विद्रोह किया था। 'विद्रोहÓ में भी कल्याण की भावना छिपी रहती है- समाज की यह भी एक धारण है। ज्ञान की धाराएं वहां से भी प्रस्फुटित होती हैं। अशोक सेकसरिया उसी कल्याण के पर्याय रहे हैं। इसलिए उन्हें संत नहीं, बौद्ध परंपरा का एक ज्ञानी, सज्जन और मददगार इनसान मानना चाहिए। वह इसलिए भी कि अशोकजी हमारे शहर के एक व्यक्ति से ज्यादा, एक 'इंस्टीट्य़ूशनÓ थे जो असंख्य जिज्ञासुओं की अथाह जिज्ञासाओं को चुटकी में शांत कर देते थे।
खेलकूद (विशेषकर क्रिकेट), सिनेमा, साहित्य, चित्रकला, नाटक और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर अपनी गहरी पकड़ रखने वाले अशोक जी जैसा बोलते, वैसा ही लिखते भी थे। उनकी कहानियों का संग्रह 'लेखकीÓ उनके मित्रों के प्रयास से उन्हें बिना बताये प्रकाशित किया गया। 'रामफज़लÓ और 'गुणेंद्र सिंह कंपानीÓ के छद्म नाम से लिखनेवाले अशोक जी एक ऐसे जौहरी थे, जिन्होंने अपने निकट आये हर पत्थर को तराश कर एक नगीना बना दिया। उनका सान्निध्य जिसने भी पाया, वह बौद्धिक रूप से समृद्ध जरूर हुआ।
एक बार कुमार भारत पत्रकारिता की नौकरी करने गुवाहाटी चले गये। एक दिन उनका भेजा एक लिफाफा मिला। उसमें एक पत्र मेरे नाम का और दूसरा अशोक जी का था। उनके किसी आत्मीय ने उसे इसी लिफाफे में भिजवाया था। उस पत्र को लिये मैं अशोक जी के घर गया। नीचे मंडल जी मिले। उन्होंने पहली मंजिल पर ले जाकर अशोक जी से मुझे मिलवा दिया। पत्र पढऩे के बाद अशोक जी खुश हुए कि उनके पास एमए (हिंदी) का एक विद्यार्थी बैठा है। पढ़ाई-लिखाई की ढेरों बातें हुईं। कुछ सवाल-जवाब भी। वह बहुत हद तक संतुष्ट दिखे। तत्काल उनके प्रति मेरे मन में गुरुभाव और पितृभाव साथ-साथ उपज आये।
फिर तो अशोक जी से मिलने-जुलने का सिलसिला चल पड़ा। उनके घर के दरवाजे मेरे लिये भी चौबीस घंटों के लिये खुल गये, वैसे अशोक जी का घर सबके लिए हमेशा खुला रहा है। वैसे भी उन दिनों मैंने उनके घर पर कभी ताला लटकता नहीं दिखा। आते-जाते उनके छोटे भाई दिलीप अंकल और विद्या आंटी से भी मेरी जान-पहचान हो गयी। अब उनके घर बैठ कर दिन-दिन भर पढ़ाई करता, कभी उनसे बातें करता, खाता-पीता और सोता।
उसी क्रम में अशोकजी के घर पर कभी हरिवंश जी से मुलाकात हो गयी, कभी किशन पटनायक, कृष्ण बिहारी मिश्र, प्रयाग शुक्ल और कभी दिनेश दासगुप्ता व विद्यासागर गुप्ता से। वहीं पहली बार योगेंद्र पाल सिंह, राजकिशोर, रामदेव शुक्ल, परमानंद श्रीवास्तव, अक्षय उपाध्याय, सच्चिदानंद सिन्हा, जवाहर गोयल, गंगा प्रसाद, भोला प्रसाद सिंह, संजय भारती, अलका सरावगी, नंदलाल शाह, महेश चौधरी, डॉ संपत जैन, बालेश्वर राय, शर्मिला बोहरा और रत्नेश जी से भी मिलने का संयोग बना।
अशोक जी के घर आला से एक अदना आदमी भी जाता रहा है और एक असाधारण व्यक्तित्व भी। वह कभी लालू मंडल, हरि या विकास महतो जैसे अति साधारण युवकों को पढ़ाते-लिखाते मिल जाते। कभी फोन पर सुरेंद्र प्रताप सिंह, प्रभाकर श्रोत्रिय, लिंगराज, चंचल मुखर्जी, सुनील, शिवानंद तिवारी, वाणी पटनायक, ज्योत्स्ना मिलन, मानिक बच्छावत, डॉ शंभुनाथ और मृत्युंजय से बातें करते हुए। अशोकजी से मिलनेवालों में, चाहे कोई खास हो या आम या उनके, रमेशचंद्र शाह, रमेशचंद्र सिंह, रमेश गोस्वामी, प्रबोध कुमार व पुष्पेश पंत जैसे जिगरी दोस्त, उनसे मैं भी मेल-जोल बढ़ा सकता था, कुछ बातचीत कर सकता था।
एक बार भारतीय भाषा परिषद के किसी कार्यक्रम से निकलते समय उपन्यासकार कृष्णा सोबती मिल गईं। उन्होंने मुझसे कहा, 'अशोक के घर ले चलोÓ। हम दोनों उनके घर पैदल गये। सोबतीजी को देखते ही अशोक जी ने उन्हें अपनी बांहों में भर लिया, और मुझे हजारों बार 'शुक्रियाÓ कहा। उसी तरह एक दफा श्रीशिक्षायतन के हॉल से किसी कार्यक्रम के बाद मैं निकल रहा था कि भीष्म साहनी मिल गये। कहने लगे- 'अशोक जी से मिलना है, क्या आप उनका घर जानते हैं?Ó मैंने जब उनको अशोकजी के घर तक पहुंचाया तब वह बहुत खुश हुए और उन्होंने मेरा धन्यवाद किया।
अशोक जी एकाधिक बार मुझे कई जगह साथ ले जाते, पर बस का किराया तक नहीं देने देते। सिनेमा का टिकट खुद कटाते थे। कहीं नाटक दिखाने ले जाते, कहीं चित्र-प्रदर्शनी। कभी उनके घर पहुंचा, तो उन्होंने कहा - कला समीक्षक जवाहर गोयल गाड़ी लिये आ रहे हैं, हम लोग कस्बा वाले 'समसामयिक कला सोसायटीÓ की चित्र-प्रदर्शनी देखने जा रहे हैं। तुम भी चलो। पनेसर जी ने हम सबको बुलाया है।
 इसी तरह, एक बार अशोकजी के कहने पर उनके साथ 'इंडियन एक्सप्रेसÓ के गेस्ट हाउस, न्यू अलीपुर

मेरा जाना हुआ। वहां बाबा नागार्जुन ठहरे थे। प्रभाष जोशी ने उनके सम्मान में एक पार्टी दी थी। मुझे आज भी याद है कि उन्होंने प्रभाष जोशी से मेरा परिचय एक 'नवोदितÓ पत्रकार-रचनाकार कह कर कराया था और जोशीजी ने हम दोनों को बाबा से मिलवाया था। न जाने कितनी बार अशोकजी ने मेरे लिखे लेखों को सुधारा, पत्रकारिता के गुर बताए, रपट लिखना सिखाया, कला-समीक्षा के तत्वों से रू-ब-रू कराया। अशोकजी से ही पेंटिंग्स की दुनिया के बेताज बादशाह पिकासो के बारे में और कविगुरु के सहोदर अवनींद्रनाथ ठाकुर के बारे में भी जाना। साहित्य की ओर झुका तो उसके मर्म को अशोक जी ने ही बताया और मुंशी प्रेमचंद तथा निर्मल वर्मा की कहानियों के फर्क को भी मैंने उन्हीं से समझा।
16, लॉर्ड सिन्हा रोड स्थित अशोकजी के घर पर इष्ट-मित्र वैसे तो मिलते ही थे। पर कभी हम अचानक कोई आयोजन भी कर डालते थे। उनके मित्र रमेश गोस्वामी की नयी पुस्तक (उनकी अनुपस्थिति में ही) पर चर्चा करने बैठ गये, कभी दिवंगत बलदेव राज पनेसर (देश के मशहूर कोलाज आर्टिस्ट) की श्रद्धांजलि-सभा बुला ली, कभी सुनील को याद करने बैठ गये। पर हमने जब भी कुछ किया, बड़ी सादगी और मीडिया को बिना बताये किया।
मेरे जैसे न जाने कितनों ने दिवंगत अशोक सेकसरिया को अपना शिक्षक माना, पिता समझा। लेकिन वह ज्यादातर आगंतुकों-मुलाकातियों को अपना मित्र ही कहते थे। वह कइयों के प्रेरणास्रोत तो थे ही किन्तु मेरे लिए मेरे नितांत अपने 'फ्रेंड-फिलॉसफर और गाइडÓ थे। उन्होंने मुझे तीन बातें सिखाईं - कभी झूठ न बोलूं, अन्याय का हमेशा विरोध करूं और अपनी ओर से गलती होने पर बेहिचक तत्काल क्षमा मांग लूं। मेरे लिए जीवन के ये ही तत्वोपदेश हैं। कोशिश करूंगा कि आजीवन इनका पालन करूं। यदि ऐसा कर पाया तो यही दिवंगत अशोकजी के प्रति मेरी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।