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Saturday 18 Nov 2017

सहजता और आत्मीयता के मनीषी : अशोक सेकसरिया

जवाहर लाल गोयल
बी-6/11 अभ्युदय सोसायटी आनंदपुर कोलकाता-700107
मो. 9831460917
अशोक सेकसरिया का कोलकाता में 29 नवंबर को निधन हो गया। वे अस्सी बरस के थे। दो सप्ताह पूर्व तक स्वस्थ और सक्रिय थे। घर में गिर जाने से उनके कूल्हे की हड्डी टूट गयी थी, जिसके ऑपरेशन के दो दिनों के भीतर हृदय गति रुकने से चल बसे। उनके निधन का समाचार अधिकांश राष्ट्रीय व क्षेत्रीय हिंदी अख़बारों ने अपने मुखपृष्ठ पर छापा। उन पर लिखे स्मृति लेखों का सिलसिला अभी  जारी है। अनेक नगरों जैसे कोलकाता, पटना, रांची, भोपाल, बनारस, दिल्ली आदि में हुई स्मृति सभाओं में काफी संख्या में लेखक, साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, समाजसेवी और सामान्यजनों ने उन्हें स्मरण किया। इनमे अनेक अशासकीय संगठनों के लोग तथा अपनी दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे लोग भी शामिल थे। जिनके लिए उन्होंने अगुवाई की थी, दुखों में हाथ बंटाया था, लिखा पढ़ी  की थी, जुलूसों  में शामिल हुए और धरना दिया था।
अविवाहित अशोक जी ने न तो ढेरों किताबें लिखी थीं ,न बड़े साहित्यकार के रूप में जाने जाते थे, न उन्हें कभी कोई पुरस्कार मिला, न ही कोई  उपाधि ही। न वे कभी किसी संगठन के नेता रहे, न ही किसी अख़बार में पहले कभी उनकी कोई तस्वीर छपी होगी। इन सब के बावजूद वे देश के साहित्यिकों, पत्रकारों, समाजसेवियों आदि में अत्यंत ख्यात थे और उनकी उपस्थिति को अनूठे सम्मान व आत्मीयता के साथ दर्ज किया जाता रहा था। इसके प्रमाण स्वरूप यह देखा जा सकता है कि रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा, नन्द किशोर आचार्य, गिरधर राठी, प्रयाग शुक्ल सरीखे कई वरिष्ठ कवि, कहानीकारों के अलावा कई युवा लेखकों ने भी उन्हें अपनी लिखी किताबें समर्पित की थीं। छोटे बड़े अधिकांश लेखक उन्हें अपनी पुस्तकें भेजा करते थे। कोलकाता आने पर उनसे मिलते भी अवश्य थे।  साहित्य के आपस में विपरीत खेमों के लोग भी इनमें होते, जिन सबसे वे समान सहजता से जुड़ पाते। उन्हें साहित्य की राजनीति से क्षोभ था। जो कोई एक बार उनके सम्पर्क में आता उनसे जुड़ जाता, और जल्दी ही अभिन्न हो जाता। उनके व्यक्तित्व में वह सूक्ष्म संवेदनशीलता थी कि अपनी आत्मीयता और स्नेह के साथ दूसरों की छोटी -बड़ी कठिनाइयों  को सहजता और अपनेपन से छू  लेते थे। दूसरे की पीड़ा से न केवल मर्माहत होते बल्कि उसमें हिस्सेदारी कर निजी सार्थकता पा लेते। किसी को उनसे मदद मांगने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अविवाहित थे पर अनेक परिवारों में उनका स्थान बड़े भाई या पिता की तरह था। अपने निस्वार्थ, निश्छल और करुणामय मानवीय सरोकारों में सहज सबका हो जाना उनकी विशिष्टता थी। इसकी शक्ति भी उन्हें अपने भीतर से मिलती थी। स्वयं को न्यूनतम संज्ञा देते हुए, वे सदैव अपनी क्षुद्रता तलाशने और उसके परिष्कार के लिए व्याकुल रहते। अपने क्षुद्रतम अस्तित्व बोध से पूरी तरह निरंतर वाकिफ रहते। गांधीजी सदा उनके प्रेरणा स्त्रोत रहे। उनमें वे सदा नए-नए अर्थ पाते रहे। उनका लिबास, रहन-सहन, व्यवहारिक सरलता, तत्परता और खुलापन आज के चतुर-सुजान लोगों को अटपटा और चौंकाने वाला लग सकता था। यह समझ पाना कठिन होता कि वैसे  सारे आकर्षण जो सामान्यत: सभी को मोहते हैं और जिनके बिना दूसरे अभावों और कष्टों में दुखी रहते हैं, उनके बगैर अशोक जी राहत और सुकून से कैसे रहते थे। अपने लिए कुछ भी पाने की लालसाओं से वे पूरी तरह मुक्त थे। उनका अपना कुछ भी नहीं था। पर वे निष्क्रिय कभी नहीं रहे। अपनी आस्था और सरोकारों के लिए सदा अदम्य ऊर्जा के साथ सक्रिय रहे। अस्सी वर्ष के होते हुए भी, इसी वर्ष अपैल में समाजवादी जन परिषद के सुनील जी के असामयिक निधन के बाद 'सामयिक वार्ताÓ के सम्पादन का जिम्मा लगभग उन्होंने अपने कन्धों पर उठा लिया था। हाल  के तीन चार अंकों को भी उन्हीं ने ही निकाला। आखिरी दिनों में उसके लिए 16 - 18 घंटे प्रतिदिन काम भी किया।
साठ के दशक में जब वे दैनिक हिंदुस्तान में वे साढ़े सात सौ रुपए महीने पर काम कर रहे थे , तब  लोहिया जी ने उन्हें ढाई सौ रुपए महीने पर आकर जन में काम करने को कहा तो ख़ुशी- ख़ुशी हिंदुस्तान की नौकरी छोड़ 'जनÓ  में काम करने लगे। बाद में जब 'जनÓ बंद हो गया तो कोलकाता आकर पिता के घर में रहने लगे। वे 'जनÓ, 'चौरंगी वार्ताÓ, सामायिक वार्ता आदि के  संपादक मंडल में थे तथा साप्ताहिक दिनमान, रविवार, और परिवर्तन आदि से  संलग्न रहे।
अपने समाज सुधारक और गाँधीवादी पिता सीताराम सेक्सरिया की वृहत सामाजिक भूमिका को देखते हुए बड़े हुए थे। आजादी के पहले के वर्षों में सीतारामजी ने स्त्री शिक्षा के प्रसार, सामाजिक कुरीतियों को दूर करना और हमारी अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के उत्थान में अपना जीवन  बिताया। उन्होंने कोलकाता में भारतीय भाषा परिषद और श्री शिक्षायतन सरीखी संस्थाओं की  स्थापना भी जन सहयोग से की थी। बंगाल में वे कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष भी रहे थे। घर में कृपलानी जी, पुरुषोत्तम दस टंडन, बाबू राजेंद्र प्रसाद सरीखे नेताओं का आना जाना था। राय कृष्ण दास, मैथलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा आदि वरिष्ठ साहित्यकार उनके साथ रुकते थे। अशोकजी बचपन में पिता के साथ गांधीजी के वर्धा आश्रम में रह चुके थे। जमनालाल बजाज और दादा धर्माधिकारी से पिता के अच्छे सम्बन्ध थे। इस सब का स्वाभाविक असर उनके मन पर था। किन्तु जीवन भर वे किसी भी तरह के वाद शामिल होकर नहीं रहे। बाद में जब लोहिया जी से प्रभावित हुए तो उनके संगठन में भी काम किया, पर वे उनके आदर्श नहीं बने। अपने पिता के प्रति अत्यंत आदर भाव होते हुए भी बरसों उनसे वैचारिक मतभेद रहा। जिसका बाद के वर्षों में खेद भी किया  कि उन्होंने अपने पिता के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं किया।
अपने मन की कोर में उन्हें आंतरिक सार्थकता का भाव व्याकुल करता रहा। संगठात्मक ढांचों और वाद की निहित सीमाएं व स्वार्थ उन्हें परेशान करते। जबकि जीवन प्रवाह में आदमी की स्थिति और नियति दोनों ही उन्हें तत्काल छूती  और विचलित करती। यह न केवल तात्कालिक होती बल्कि मानवीय स्तर पर अधिक वास्तविक और सार्थक भी होती। साहित्य, कला, आदि विधाओं में उनके सरोकारों के मध्य भी जीवन के इसी सूत्र की प्रधानता थी। उनके ध्यान में अंतिम पंक्ति में खड़ा आखरी आदमी हमेशा मौजूद रहता।
बरसों पहले खादी भंडार के एक कर्मचारी लालू से वे मिले। वह केवल तीसरी कक्षा तक ही पढ़ा  था। उसे पढ़ाने का   जिम्मा उन्होंने अपने पर ले लिया। जब वह शाम में काम से लौटता, प्रतिदिन उसके घर जाकर उसे पढ़ाते। कई बार बारिश में भीगते उसके पहुंचने के पहले उसके यहां पहुंचकर इंतजार करते। हर साल उसे दो-दो कक्षा का इम्तहान दिलाकर, दसवीं में उत्तीर्ण कराया। बीच में जब पिता सीताराम जी की मृत्यु हो गयी तो केवल दो दिन उसकी पढ़ाई में नागा किया, और अपने साथी योगेन्द्रपाल को उसे पढ़ाने  भेजा। स्मरण सभा में बिलखते लालू ने अपनी कथा सुनाई।
लगभग निष्काम भाव से अपना कर्म करते हुए, अपने को आगे बढ़ाने या परोक्ष रूप से भी कोई लाभ पाने के लिए वे कभी कुछ नहीं करते थे। अपने साथियों में इस तरह से वे अक्सर अपवाद ही रहे। शिवानंद तिवारी से हाल में सुना एक किस्सा इसे अच्छी तरह जाहिर करता है। सन सत्तर में हुए एक समाजवादी जुलूस पर पुलिस ने बड़ी बेरहमी से डंडे बरसाए थे। इसी में राजनारायण के पैर की हड्डी टूटी थी। उस रात लौटकर शिवानंद घायल साथियों के साथ अशोक जी के उस कमरे में सोये जो मधु लिमये के ऑउटहाउस का हिस्सा था। रात में सभी बढ़बढ़कर अपने घावों को तमगों की तरह दिखने में लगे थे, अशोकजी चुपचाप सबकी सेवा चिकित्सा करते रहे। सुबह उठने पर नहाते समय शिवानंद ने उनकी उघारी पीठ पर लाठियों के तीन लम्बे घाव देख चकित रह गए।
दो वर्ष पहले एक दिन मुझसे बोले कि कुछ पैतृक स्रोतों से उन्हें लगभग पंद्रह हजार रुपए मासिक आते हैं, जिनमें से लगभग दो तिहाई उन्हीं के किये प्रबंध के अनुसार, उनसे अधिक जरूरतमंद लोगों को चले जाते हैं। बढ़ती हुई महंगाई में एक तिहाई पैसों में गुजर बसर न हो पाने की कठनाई का वे हल खोज रहे थे। यह जानते हुए कि वे कभी किसी से अपने लिए कुछ नहीं लेंगे, अवाक् सुनता हुआ मैं केवल यही कह सका कि -'आप अपना सिगरेट पीना कम कर दीजिये, और कोई उपाय नहीं है। Ó
उनके पिता के घर का वह बड़ा सा कमरा जिसमें उनका निवास था, एकदम खाली  रहता था, सिवाय बीच में पड़ी एक खाट के। उसके इर्द गिर्द , ऊपर नीचे ढेरों किताबें बिखरी होती थीं। अतिथि को वे उस खाट पर बैठाते और सुलाते, स्वयं नीचे  फर्श पर सोते। वह कमरा बड़ी संख्या में लोगों के लिए सुलभ सरायखाना  था, जहां आने - जाने वालों का ताँता लगा रहता था। अतिथि की जरूरतों का उन्हें अपनी जरूरतों से अधिक ख्याल रहता। इसी सबके बीच उनका पढऩा, लिखना, अनुवाद करना, संपादन करना चलता रहता। साहित्य, कला, समाज सेवा से जुड़े लोगों को उस कमरे पहुंचकर में किसी तीर्थ की पवित्रता मिलती थी।
उन्होंने अपने को लचीली गीली मिटटी से अलग नहीं समझा, किन्तु दूसरों की दृष्टि में वे एक कुम्हार की तरह थे।  न जाने कितने लेखक, कवि, चिंतकों की किताबों के वे  अज्ञात संपादक थे। न जाने कितने लोगों में उन्होंने लिखने के संस्कार डाले और उनकी किताब छपवाने में मदद की। उन्हें अग्रिम  पंक्ति का लेखक बनाया। अधिकांश नए पुराने लेखक  अक्सर उन्हें अपनी किताबें भेजते, जो  एक पुस्तकालय की तरह लोगों में घूमने लगती। उनका अपना निजी कुछ भी नहीं था। सर्वथा विपरीत खेमों के लेखक उनके यहाँ आते जाते थे । उनसे समान रूप से जुड़ पाते थे। उनका आग्रह  हमेशा मूल साहित्यिक कर्म ही होता, साहित्य की राजनीति कभी नहीं। जिन्हें नापसंद भी करते, उनके सकारात्मक पक्ष को पहिचानने और स्वीकारने में  भी हिचकते नहीं। कई बार दूर दराज से आये कलाकार उनके यहाँ अपना सामान या चित्र , मूर्ति आदि इसलिए रख जाते कि उन्हें तुरंत ले जाने की उनके पास कोई व्यवस्था नहीं होती।
विश्व साहित्य और सामाजिक चिंतन के क्षेत्र में उनका अध्ययन सूक्ष्म, गहरा, और विशाल था, लेकिन हमेशा उनका आग्रह  पूरी उत्सुकता के साथ दूसरे की बात सुनने और दूसरे को जानने-समझने का ही रहता। लिखने के लिए वे  अधिकतर ऐसे कागजों का उपयोग करते, जिन्हें एक तरफ से पहले ही काम में लाया जा चुका होता। भाषा के उपयोग में उनका ध्येय उसे सरल, सटीक और अंतिम व्यक्ति को समझ में आने तक पूरा पहुँचाना होता। इसीलिए आसानी  से संतोष नहीं करते। लिखे को बार - बार  व्याकुलता से सुधारते रहते। उनके गद्य की कोमलता और पारदर्शिता अद्वितीय थी । लेख साहित्यिक हों, सामाजिक या राजनैतिक, बात कहने के मापदंड सभी में समान रूप से कड़े थे। शब्द, विन्यास या अभिव्यक्ति में वे सजावट, दिखावट अथवा व्यर्थ रुपवादिता को नापसंद करते। बरसों पहले लिखी उनकी कहानियों में विरला अवसाद , आंतरिक उदासीनता और विनीत भाव से किया,  सामाजिक विद्रूपता का  विश्लेषण हुआ करता था। उसमें भी वे भाव हिंसा से बचने की चेष्टा करते दिखते। अपने काम को जितनी कड़ाई से देखते, दूसरों के काम को उतनी ही उदारता के साथ। दूसरों के काम में जब तक कोई अच्छाई नहीं खोज लेते, उसे अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते थे। प्रयास कर रहे लोगों के उत्साह को दोगुना करके उन्हें संतोष मिलता था । फिर वह अगर स्त्री, बच्चा, अपढ़ या युवा हुवा होता तो और भी अच्छा लगता।
खेलों के केंद्रीय क्रीड़ा भाव के प्रति उनमें बच्चों सी उत्सुकता थी।  'रामफजलÓ छद्म नाम से खेलों पर लिखते रहे। सन बयासी में हुए दिल्ली के एशियाई खेलों पर उनके लेख बहुत चर्चित हुए  थे। क्रिकेट पर हिंदी में किताब लिखने वाले संभवत: वे पहले लेखक थे।
सन चौरासी में  ' हिन्दू होने की पीड़ाÓ सरीखे उनके लेखों ने सबको चौंकाया था। उनमें अभिलाषा नहीं थी, पर पिता के सहयोगी जमनालाल जी बजाज पर वे काम करना चाहते थे। उनके मन में कहीं एक उपन्यास का इकहरा खाका भी अटका हुआ था,  जिसमें दो अपरिचित एक पुस्तकालय में बरसों एक दूसरे को देखते हैं, पर मिलते कभी नहीं। केवल एक दूसरे के जीवन के बारे में अनुमान करते चलते हैं। जब तक कि अंत में एक दुर्घटना में मारा नहीं जाता, वह भी अख़बार में पढ़ी एक खबर से लगाया गया उनमें से एक का अनुमान होता है। काश, यह उन्हीं के द्वारा लिखा गया होता, क्योंकि इस इकहरे से कथानक में असीमित मूक संभावनाएं हैं जीवन के अचीन्हे पक्षों को खोलती हुई।
हाल के वर्षों में कई बार उन्होंने कहा कि -  'मेरे जीवन  का कोई अर्थ नहीं है, सिवाय इसके कि कई लोग मुझे अपने दु:ख बता जाते हैं, और इसी से मुझे सार्थक कर जाते हैं।Ó
ऐसा कोई मनीषी ही कह सकता था जिसके पास पहुँच कर लोग स्वयं अपने दोषों से ऊपर उठ पाते थे। ठ्ठ