Monthly Magzine
Saturday 25 Nov 2017

पीढिय़ों की टकराहट इदन्नमम के सन्दर्भ में


  शिल्पी गुप्ता
महिला छात्रावास
कमरा न.112
 हैदराबाद केन्द्रीय विवि
हैदराबाद-500046
मो.9703270740
मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास इदन्नमम में तीन पीढिय़ों की कहानी है तथा इन तीनों पीढिय़ों की विचारधारा में अन्तर है। एक पीढ़ी जो बऊ (दादी) की है, जो प्रौढ़ और अनुभवी है। दूसरी पीढ़ी प्रेम (बऊ की पुत्र-वधू) की है, जो पुत्र महेन्द्र की बेवा है, वह ठीक-ठाक उम्र की मध्यम अनुभवी है, तीसरी पीढ़ी बऊ की पोती (मंदा) की है। पहली पीढ़ी बऊ जहां परम्परागत रूढिय़ों और कुरीतियों को निष्ठापूर्वक निभाते हुए उसे अपने जीवन में स्वीकार करती है। वही दूसरी पीढ़ी प्रेम; मंदा की माँं में अस्वीकार का भाव है। वह समाज में व्याप्त कुरीतियों और परम्पराओं को चुनौती देते हुए पति की मृत्यु के बाद कुछ ऐसे साहसिक कदम उठा लेती है जिसके कारण उसे आजीवन कष्ट सहन करना पड़ता है। वह तिल-तिलकर उन अपराधों को अपने जीवन में आत्मसाध्य कर लेती है। तीसरी पीढ़ी मंदा आज के जमाने की औसत पढ़ी लिखी, समझदार और कम अनुभवी है। कम अनुभवी होने के बावजूद उसने जिंदगी के तमाम कष्टों से लड़कर जीवन जीना सीख लिया है। उसने जीवन के कटु सत्य को सहर्ष स्वीकार करते हुए रूढ़ सामाजिक कुरीतियों एवं परम्पराओं का बहिष्कार किया है। उपन्यास में तीनों पीढिय़ों की सोच में अंतर है और यही अन्तर उनके टकराव का कारण है। इसमें कुछ और पात्र है जिनकी विचारधारा में काफी अन्तर है ऐसी ही एक अन्य पात्र कुसुमा है, जो पति यशपाल की परित्यक्ता है।
    उपन्यास में जहाँ एक ओर अपनी जमीन से बेदखल किए गए मंदा और उसकी बऊ की कथा है, तो दूसरी ओर आधुनिकीकरण की मार झेल रहे कृषक-मजदूर वर्ग की भी कथा है, जिनकी जमीन आधुनिकीकरण और तकनीकीकरण की भेंट चढ़ गयी। सोनपुरा की जमीन जो कभी हरी-भरी उर्वरा शक्ति सम्पन थी, आज वही आधुनिक युग की तकनीकी की भेंट चढऩे के लिए तैयार खड़ी है। चारों तरफ  क्रेशर मशीन ही मशीन दिख रही है। तकनीकीकरण ने बेगार को जन्म दिया है और लोग किसान-महाजन से मजदूर बनते चले जा रहे है। उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों के कुछ पात्र जहां साहूकार-महाजन के कर्ज की मार से किसान से मजदूर बनने के लिए मजबूर हैं, वही आज का किसान वर्ग आधुनिकीकरण और तकनीकीकरण के फलस्वरूप अपनी जमीन से बेदखल होकर मजदूर बनने के लिए विवश है। गांव की माली हालत ने तमाम महामारी को भी बड़ी आसानी से गांव में ला खड़ा किया है। सोनपुरा बहुत ही पिछड़ा इलाका है जहां बिजली के खम्भे तो लगे हैं लेकिन बिजली अभी तक नहीं पहुँच पाई है, अस्पताल के नाम पर सिर्फ खड़ी दीवार है, जिसमें डाक्टर और कम्पाउंडर तक झांकने की हिम्मत नहीं करते। ये सभी परिस्थितियां रेणु के उपन्यास मैला आंचल की बरबस याद दिलाते है। इसमें फूल भी हैं, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी है, कीचड़ भी है, चंदन भी, सुन्दरता भी है, कुरुपता भी। मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया, जातिवाद, पाखंड-विड़म्बना, अंधविश्वास जैसे व्यापक फलक को समेटते हुए राजनीतिक समस्याओं को 1954 में फणीश्वरनाथ रेणु ने अभिव्यक्त किया था। उसके 40 वर्ष के बाद मैत्रेयी पुष्पा ने भी इदन्नमम उपन्यास में राजनीतिक समस्याओं के बरक्स चलती कई समस्याओं को कई सन्दर्भों में अभिव्यंजित किया है, जहाँ आजादी के इतने वर्षों के बाद भी विकास के नाम पर सिर्फ छल ही छल है,अर्थात कुछ भी नहीं है। चुनावों के माध्यम से बड़े-बड़े ढोंग को निभाने के उपक्रम किये जाते हैं। चुनावी गहमागहमी में नए आश्वासन, मीठे सपने, बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं। वोटों की खरीद-फरोख्त कभी नोट से तो कभी आतंक से तय किये जाते हैं।
    उपन्यास में एक ओर जहां भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था की कथा चलती है तो दूसरी ओर पीढिय़ों की विचारधारा में टकराहट दिखाई देती है। प्रेम; मंदा की माँं अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर रतन यादव के साथ चली तो जाती है लेकिन उसे पता चलता है कि उसकी सम्पत्ति हथियाने के लिए रतन यादव ने उसके साथ छल किया है। रतन यादव पहले भी तीन विधवाओं के साथ ऐसा कर चुका है, बाद में प्रेम को अपने किये का पछतावा होता है। पश्चाताप से विह्वल होकर वह अपनी बेटी से क्षमा मांगना चाहती है और अपने घर वापस आना चाहती है। माँ के ममत्व में सब कलुषता धुल जाती है। ममत्व की आद्र्रता ने माँ और बेटी को एक कर दिया। प्रेम अपनी बेटी से मिलने के लिए सोनपुरा आती है। मंदा मां को घर में वापस लाना चाहती है लेकिन बऊ के क्रोध ने प्रेम को द्वार की चौखट का एक कदम भी लांघने नहींदिया। उसके द्वारा उठाये गये कदम से बऊ प्रेम पर बहुत क्रोधित है। मंदा समझ नहीं पाती कि यह क्रोध है या ईष्र्या या और कुछ। तब बऊ मंदा से कहती है रांड-विधवा तो हम भी हुए थे बेटा! और चढ़ती उमर में हुए थे। जनी के लाने आसनाई करनेवालों की कमी नहीं होती ! पर हम जानते थे ऊँच-नीच! बात को परखने की शक्ति नहीं खोई थी हमने। जाहिर थी यह बात कि उन दुष्टों की आँख हमारी देह और जायदाद पर थी। एक विधवा का एकाकी जीवन व्यतीत करना बहुत ही कठिन है। बऊ ने तमाम कष्ट को सहते हुए अपने जीवन को एकाकी ही व्यतीत किया। दबंगों की निगाह उसकी देह और उसकी जमीन दोनों पर थी, लेकिन मजाल क्या है कि कोई उसके चरित्र पर उँगली उठा सकता और एक उसकी अम्मा है जिसने अपनी इच्छा के आगे घर की मर्यादा को ही तार-तार कर दिया। आगे बऊ अपने सतचरित्र वैधव्य का उदाहरण देते हुए कहती हैं- बिटिया वह उमर तो सतियों की थी। कायदा से तो सती हो जाना चाहिए था हमें पर हमारी राह में महेन्द्र की कच्ची किल्कारी आ गई। वेदपुरान में भी यही बताया है कि बाल-बच्चा की माता सती पाछे है, माता पहले। सो बिटिया, गद्दर उमर की हिंसा, देह के तकाजे जरा डारे जई देहरी के होमकुंड में और ऐसे ही जिंदगी काटकर पाल दिया अपने महेन्द्र को।
बऊ परम्पराग्रस्त, रुढि़वादी विचारों वाली महिला थी। जिसने वेद, पुराण, नीति अनीति में ही अपने जीवन का उद्देश्य देखा था। वह कभी चाहकर भी प्रेम की भांति ऐसे दुस्साहसिक कदम उठा नहीं सकती थी, क्योंकि रुढिग़्रस्त, कट्टरपंथी समाज की बेडिय़ों ने उसकी इच्छाओं को जकड़ें हुए था। जिसे तोडऩा बऊ के बस का नहीं था। ऐसी परिस्थितियां स्वतंत्रता के पहले के दृश्य को उजागर करती है जिस समय विधवा को पति संग सती हो जाने का प्रावधान था। इन सबके पीछे समाज की एक गंदी मंशा छिपी थी कि उसके जमीन-जायदाद को बड़ी आसानी से बिना किसी रोक-टोक के हड़प लिया जाय। राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, दयानन्द सरस्वती, केशव चन्द्र सेन जैसे समाजसुधारकों ने सतीप्रथा के उन्मूलन का न सिर्फ  प्रयास किया बल्कि उसे कानूनन समाप्त करने की लड़ाइयां भी लड़ीं जिसके परिणामस्वरूप 1824 में लार्ड विलियम बैंटिक ने सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया जिससे इस प्रथा पर रोक लगी।
मंदा को बऊ के द्वारा विधवापन के विधि विधानों का पालन करने में उनका त्याग कम विकल्पहीन विवशता अधिक दिखायी देती है जिसके कारण उसकी माँ का यह आचरण उन्हें भीतर तक डाह से सराबोर कर देता है। मंदा बार-बार सोचती है कि ऐसी कौन सी स्त्री है जिसमें देह की भूख नहीं होती? क्या मात्र विधवा होने पर सूख जाते है स्रोत? आदिम इच्छाओं के होने को कोई नकार नहीं सकता जिस प्रकार नींद है, भूख है, भय है उसी प्रकार इच्छा, कामना है। इस सन्दर्भ में बऊ मंदा के समक्ष अपने तर्क रखती है कि चौखट की मरजाद तरवार की धार से तीखी और पैनी होती है, अपनी मरजाद त्यागना, अपनी देहरी छोडऩा क्या आसान और मामूली बात है। बऊ के ये सारे तर्क बुद्धि, विवेक और चिन्तन से उपजे हुए नहीं है बल्कि पौराणिक कथाओं, धार्मिक उपदेशों और परम्परा के जरिये उपजे हुए हैं। बऊ के हिसाब से रामायण और महाभारत की बताई गयी नीतियां ही उचित है और उसी का अनुकरण कर के जीवन को संवारा जा सकता है। जिस पर मंदा उसकी बातों को काटते हुए कहती है बऊ पुरानी परम्पराओं की जो थोथी और दु:खदायिनी नीति है उसका अंधानुकरण करना सही नहीं है। वे सभी पुरूष-प्रधान समाज के अवसरवादी प्रसंग है जो पुरुष वर्चस्व को बनाए रखने के लिए और औरत की निजता को रौंदने के लिए हथियार के रूप में तैयार किए गए हैं। मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम का सीता की अग्निपरीक्षा लेना कहाँ का न्याय है? पति धर्म का पालन करने वाली राम के साथ वन जाने वाली सीता ने क्यों नहीं माँगा कोई सबूत कि हे भगवान कहे जाने वाले राम, तुम भी तो उस अवधि में मुझसे अलग रहे हो, तो अपने पवित्र रहने के साक्ष्य हमें दो। महाभारत में अर्जुन द्वारा स्वयंवर करके लाई गई द्रोपदी को अपने पांचो पुत्रों में बाँट देने का माता कुंती का आदेश तुम्हें अच्छा लगा होगा बऊ! हमें तो एक औरत के प्रति दूसरी औरत का घोरतम अन्याय और कुकर्म लगा। और उस समय द्रोपदी किसी निरीह और बेचारी स्त्री से भी ज्यादा दया की पात्र लगी हमें। दुर्योधन के एक अभ्रद वाक्य पर उसने जो-जो प्रण ले डाले, वे नाटक के बनावटी संवाद लगे। यदि ऐसा ही था तो उस दिन क्यों नहीं सास का विरोध किया? क्यों नहीं कहा कि पांच पतियों में मुझे बांट देने का अमानुषिक निर्णय आपने क्यों लिया? वापिस लो अपने वचन को। रामायण, महाभारत पुराणों में कौन सही था कौन गलत, क्या ग्रहण करने योग्य है क्या नहीं यह तो अपने विवेक से देखो बऊ, परखो अपनी बुद्धि से। पुरूष पूजा को मात्र मर्यादा का नाम मत दो ये सभी स्वशोषण के साधन हैं। वास्तव में यह बऊ की विडम्बना ही है कि वह उन पुरातनपंथी परम्पराओं और नीतियों को ढोती आ रही है और लोगों को ढोने के लिए विवश करती आ रही है, जो स्त्री को गुलाम बनाते हैं और अधिकारों से च्युत। उसका पालन करना कहां तक सही है और उसके सन्दर्भ में दिए गए ये सभी तर्क, तर्क नहीं दुराग्रह हैं, पुरुष वर्चस्व को बनाए रखने के लिए, औरत की निजता को रौंदने वाले हथियार। वह पुरुषवादी समाज में यह नहीं समझ पा रही है कि सारे के सारे विधान स्त्री जाति को अंकुश में किये जाने के लिए हैं। मंदा नयी पीढ़ी की युवती है वह सब कुछ समझते हुए इन सभी का निषेध करती है कि औरत जब तक पुरुष प्रधान व्यवस्था की प्रतिनिधि बनकर छोटे-मोटे सुखों की खातिर दो खेमों में बंटी रहेगी, तब तक वह कमजोर से कमजोरतर होती जाएगी। उधार की ताकत के बल पर अपने को ताकतवर समझना एक प्रकार का भुलावा है जिसका अंत कभी भी सुखद नहीं होता। मंदा सोचती है कि बऊ और अम्मा की जीवनधारा एक-दूसरे से भिन्न है। पुरूष प्रधान समाज के डर से बऊ ने जिस आदिम भूख को निर्ममता से मारा है उसके परिणामस्वरूप बऊ का अम्मा के प्रति डाह या ईष्र्या का जन्म लेना स्वाभाविक है। यदि बऊ ने वैधव्य अपने लिए जिया होता तो उन्हें अम्मा पर क्रोध आता और उस क्रोध में कहीं न कहीं क्षमा-भाव भी रहता।
    उपन्यास में एक जगह और पीढिय़ों की टकराहट दिखायी देती है वह है कुसुमा भाभी और रिश्ते में लगने वाले चचिया ससुर दाऊजी;अमरसिंह का सम्बन्ध। कुसुमा भाभी रिश्ते में पूज्य दाऊजी ;अमर सिंह से शरीर सम्बन्ध स्थापित करती है। पति यशपाल की परित्यक्ता कुसुमा जन्म से रूग्ण दाऊजी से प्रेम करती है और प्रेम के फलस्वरुप प्राप्त संतान पर गर्व भी करती है और यह उसी परिवार में उसी के पति के सामने होता है। पति को यह बरदाश्त नहीं होता जबकि पति स्वयं ही कुसुमा के रहते एक अन्य औरत को उसकी सौत बनाकर लाया है। कुसुमा भाभी सामाजिक वर्जनाओं पर खुली चुनौती बनकर उभरती है। जब उसकी सास कुसुमा और दाऊजी;अमर सिंह के रिश्ते पर आक्षेप लगाती हुई कहती है कि पिता के समान ससुर को भी तूने नहीं छोड़ा, इस पर वह जवाब देती है अगिन साच्छी कर के ही आए थे तुम्हारे पूत के संग। सात भांवरे फिर के ! लिहाज रखा उसने? निभाया सम्बन्ध? दूसरी बिठा दी हमारी छाती पर। उस दिन से कोई सम्बन्ध, कोई नाता नहीं रहा हमारा! जो ब्याह कर लाया था उससे ही कोई ताल्लुक नहीं तो इस घर में हमारा कौन ससुर और कौन जेठ। रीतिरिवाज और मर्यादा की दुहाई सिर्फ  स्त्री जाति के लिए किये जाते है। स्त्री का संबल तोडऩे के लिए तमाम तरीके के चारित्रिक आक्षेप उस पर लगाए जाते हैं। कुसुमा ने अपनी मर्जी से दाऊ जी से सम्बन्ध जोड़ा था फिर क्यों परिवार के लोगों ने उसका विरोध किया, जबकि उसका पति पहले ही उससे संबंध तोड़कर सौत लाकर उसकी उपेक्षा करता है। पुरुष सत्तात्मक समाज में पुरुष हमेशा अपने को स्वामी और स्त्री को दासी के रूप में देखता आया है लेकिन आज उसी पुरुष को कुसुमा ने दाऊ जी से संबंध बनाकर उसकी औकात दिखा दी। कुसुमा भाभी का चरित्र आत्मनिर्णय और दृढ़संकल्पों से निर्मित नारी चरित्र है जो अपने व्यक्तित्व को क्रमश: दृढ़तर बनाती चलती है। मंदाकिनी के व्यक्तित्व को भी वह संकल्पों में ढालती रहती है। उसका चरित्र हर बड़ी चुनौती से निखर कर अधिक प्रखर और तेजस्वी बनता जाता है।
उपन्यास की कथा में आदि से अंत तक उतार-चढ़ाव आता रहता है। ऐसे कुछ और पात्र हैं, कुछ और घटनाएं हैं जो उपन्यास को आदि से अंत तक रोचक बनाते हैं और इन्हीं में पीढिय़ों की टकराहट भी यत्र-तत्र दिखायी पड़ती है। बऊ पुराने जमाने की स्त्री थी जो समाज और उसके बनाये गये नियमों से छेड़छाड़ करने की तो कभी सोच ही नहीं सकती थी, जबकि मंदा नये जमाने की समझदार युवती है। वह पहले तर्क की कसौटी पर सामाजिक नियमों और परम्पराओं को कसती है, अगर वे रूढ़ और रूग्ढ़ होते है तो वह उन नियमों का पुरजोर विरोध भी करती है। इसी कारण वह अपनी मां प्रेम को पुन: स्वीकार लेती है। उपन्यास की सबसे सशक्त पात्र मंदा और कुसुमा भाभी है। कुसुमा भाभी जहां सामाजिक, पारिवारिक बंधनों को नकारते हुए अपने और दाऊजी के सम्बन्धों को खुलकर स्वीकार करती है जिसके लिए वह सभी से लडऩे के लिए तैयार है। वही मंदा के जीवन का एकमात्र उद्देश्य समष्टिमंगल का भाव है उसके लिए वह अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है और उसके जीवन पर इदन्नमम ; आत्म का विसर्जन और लोकपक्ष में आत्मार्पण का आशय चरित्रार्थ होता है।
सहायक ग्रंथ
1. मैला आंचल- फणीश्वरनाथ रेणु  
2. इतिवृत्त की संरचना और संरूप-रोहिणी अग्रवाल
3. मैत्रेयी पुष्पा: स्त्री होने की कथा-संपा.विजय बहादुर सिंह
4. हंस, अगस्त 1994, संपा.राजेन्द्र यादव
5. आधुनिक हिंदी उपन्यास भाग-2-संपा. नामवर सिंह