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Monday 20 Nov 2017

दास्तान दोहे की

 

डॉ. शिवनंदन कपूर
कपूर क्लिनिक, भगत सिंह चौक
कहावाड़ी, खण्डवा (म.प्र.) 450001
नन्हा सा दोहा गुजरे जमाने से आज भी दिल में समाया है। रसना के सरस सिंहासन पर जमा, मधु-बिन्दु सा रस टपका रहा है। नन्हा है, छौने सा। कलात्मक कलाबाजियां खाता, कला के कमाल दिखा रहा। यह वाणी के देवालय का लघु दीप है। लघु वर्तिका है। जिसका धूम सरस्वती के साधकों में अपनी सुरभि से धूम मचा रहा। इसने दो 'चरणोंÓ में समस्त विश्व नाप लिया। भारत की अनेक भाषाओं में छा गया। उर्दू के अखिल विश्व मुशायरे तक इसकी खुशबू छाई। भाषा और कल्पना के जुड़ाव वाली सीपी का आबदार मोती है। इस नटखट की क्या कहिए। सीधा रहे तो दोहा। उल्टे तो सोरठा। जिस लय में, जिस रंग में उमंग से, तरंग, संग गा लो। साहित्य में निहारिये। कोष को संवारिये। नर के अतिरिक्त यह पाखी का भी परिचायक है। वामन सा यह काव्य-पुरुष अपने दो 'चरणोंÓ से सारा साहित्य-संसार नाप गया। भावना और रस में विभोरकर साहित्य के अपार विस्तार का ओर-छोर पा गया। यह जीवन का वट-बीज रहा। जीवन के सारे रहस्य आत्मसात किए। रस का, सिद्धि का बीज-मंत्र कहें। 13-11 मात्राओं वाले इस अद्र्ध-सम छंद ने पूर्णता का पारायण कराया। इसके दो किनारे हैं। उनके मध्य ही रस-सरिता प्रवाहमान है। दो बाहें हैं- एक दूजे की ओर आलस रहिस लालस से बढ़तीं। अनुभवों के फूलों वाली सुगंधी सजी माला है। शारदा के केलि-मंदिर में कल कूजन करते दो क्रीड़ा-कपोत है। कुहकती कोकिलाओं की तान की उड़ान है। कामिनी के कोमल कंवल से कांपते ललछौंहे होठ है।
'द्विपदीÓ, या 'द्विपदाÓ की संज्ञा तो इसे मिली ही। बड़ो दूहो, तुंबेरी दोहा, दोही, दोहरा आदि इसकी संतानें हैं। अन्य छंदों से मिलकर इसने 'अमृतध्वनिÓ, 'कुण्डलीÓ के रूप में संबंध-विस्तार किया। जयशंकर प्रसाद ने 'स्कन्दगुप्तÓ के पृष्ठ 147 पर, दोहे के आधार पर 'दोहकीयÓ छंद की अवतारणा की है। डॉक्टर विनयतोष भट्टाचार्य के मत से, सर्वप्रथम सरहपा ने दोहे का शुद्ध प्रयोग किया था। हजारी प्रसाद जी ने इसकी पुष्टि की थी। (हिन्दी साहित्य का इतिहास, आदिकाल, पृ. 96)। दोहा प्रस्तुत है-
''जीवन्तहं जो न उ जरइ सो अजरामर होइ।
गुरु उबए से विमल मइ सो घर घण्णा कोइ।।ÓÓ
हिन्दी में दोहे के दोले पर तुलसी, नन्ददास, बिहारी, मतिराम, वृन्द सभी झूले। इसके दो सूत्रों को धरकर दुलारे लाल ने ही नहीं दुलार पाया। आज भी अनेक लेखनी के लाल-लाल हो रहे। हिन्दी ही नहीं, मराठी में भी केशवसुत एवं मोरोपंत ने जन-मन को रिझाया। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
''महाराष्ट्र भावेऽ तहीं दोहा रीति नवीच।
रची मयूरेश्वर हिला, मनी घरील कवीच।।ÓÓ मोरोपन्त
मोरोपन्त ने तो 'दोहा रामायणÓ ही लिख डाली। श्री केशवसुत का भी उदाहरण लें-
''स्वहृदय फाहुनि निजनखरी, चिवट तमाचे दोर।
कादुनि दोफण बलितीं ही सत्वाची मी चोर।।ÓÓ
अक्षर के धनी कवियों ने अपनी अक्षय अक्षरजननी से दोहे को बेहद दुलारा, संवारा। शब्दों के मणिपट्ट पर चढ़ाया। दूल्हा बनाया. प्यार के प्याले पिलाए। उस चषक से चुस्की भर, कल्पना के सतरंगी दोले पर झुलाया। पींगे मारता, वह तो आकाश छूने लगा। इस द्विपद के भ्रमर, भ्रामर आदि 23 भेद कर डाले। दोहे की अनोखी शब्द-मैत्री दुर्लभ है। गौहर अ$फशां हैं- मोती बगरातीं। गौर फरमायें-
''कहत, सुनत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भवन में करते हैं, नैननि ही सों बात।।ÓÓ
गोशयेतनहाई नहीं। एकान्त हो तो कान्त से कुछ कह लें। 'हॉलÓ है। फिर भी यह हाल कि 'भरे भवनÓ में भी बात करने के लिए बेहाल हैं लाल। वो भी कम नहीं। 'दोनों तरफ है आग बराबर लगी हुई।Ó नैन-बान चलते हैं। इधर से उधर तक महज कान ही कान लगे हैं। पर ये अनोखे बूमरैंग, सैन के ये परवाज पर मारते निशाने पर लगे। जवाब भी ले आये। 'गोशे-होश या होश के कान फड़कते, फडफ़ड़ाते रह गए। कैमरे की 'क्लिकÓ सी आवाजन हुई। हर लफ्ज़ पर पलक भर ढपकती है। सवाल-जवाब हो जाते हैं। इस होशियारी पर आंखें मिलनी ही थी। लोचनों में लावण्य छाया। जैसे किरण ने गुदगुदाया। गुल खिला। जैसे बोल उठा, 'क्या गुल खिलाया।Ó गुल-गपाड़ा करने वाले ताकते रह गए। दोहे की इसी दिग्विजय ने कवियों को द्रवित किया। वे 'दोहे के 'पथेर दावीÓ हुए। दो हाथों के इस 'सव्यसाचीÓ से कौन 'दो-दोÓ हाथ करने वाला।Ó सब छन्दों ने छल-छन्द छोड़ हाथ ऊंचे कर लिए हैं। दोहे ने दोनों हाथों में वाणी के 'प्रसादÓ के दोने धर दिये। विरोधियों ने दोनों हाथ ऊंचे कर दिए। दोहे की दोहाई फिरते ही, सब दोहाई देने लगे।
उपर्युक्त दोहे में शब्द-मैत्री भर नहीं है। एक जंजीर-बंदी है। रंग-बिरंगे रत्नों की जंजीर है। रस-सागर के बीच नन्हें जजीरे हैं। एक के बाद एक रंग। अलग-अलग तस्वीरें। रवीन्द्र ठाकुर की पंक्ति दिल में उभरती है, 'मेघेर ऊपर मेघ जुटेछे, रंगेर ऊपर रंग।Ó मुगलिया हरम में अजूबे 'फानूसे-खयालÓ भी रोशन होते थे। उनकी एक $खासियत थी। उस का$गजी कन्दील के भीतर तरह-तरह की तस्वीरें चस्पा रहती थीं। कन्दील धुएं या हवा की लहर से चक्कर खाता, देखने वालों को चकराता। एक के बाद एक सूरतें- अलग नजारें। दोहे के रंगमंच पर अलग-अलग रंग दिखाते।
दोहे के कूजे में जितना रंग आ जाता है, समा जाता है, और छन्दों में नहीं आ पाता। यूं कहिये, दूसरों का रंग उतर जाता है। नीला रंग श्रृंगार का है। रसराज कन्हाई तो रग-रग पर वही रंग चढ़ाए हैं। उस पर दूजा रंग चढ़ता ही नहीं। यह दोहा निरखिये-
''छिप्यौ छबीलो मुंह लसै नीले आंचर चीर।
मनो कलानिधि झलमलै कालिन्दी के नीर।।ÓÓ
सूर ने भी 'दिव्यÓ नयनों से नीले रंग का असर देखा था। इसीलिए लिखा, 'नील वसन फरिया कटि पहने।Ó पर यहां असर में कसर रह गई है। वह मैदान सर नहीं कर पाया। प्रसाद जी ने भी कामायनी के रूप वर्णन में रंग जमाने के लिए, नीला वसन चढ़ाया- 'नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला रंगÓ। यहां अंग खुला। रंग भी कुछ खिला। पर वह सिलाÓ या असर न दिला पाया। कलानिधि तो है। पर दोहे में वह पाखी सा पर मार रहा। नीले चीर को चीर कर, रूप रंग दिखा रहा। चल नीर में झलमल करते चांद की छटा कुछ और होती है। अंग अधखुला होने में वो बात नहीं। झिलमिल जल में लावण्य का लास सतत तरंग सा रह-रह झलक मार रहा। इसी दम पर दोहा दूसरों का दम निकाल रंग उतार देता है।
साहित्य में नर को 'द्विपदाÓ तथा 'द्विपदीÓ कहा गया है। दो पदों वाला दोहा ही साहित्य संसार का काव्य पुरुष है। इसकी समता देव-सुमन कहे जाने वाले लवंग से की जा सकती है। स्वर्गीय सुमन के सम्मान से सुरभित, लघु होकर भी मान का प्रतीक बन गया है। जैसे वह मुखस्थ होते ही, उसे सुरभित कर, मन प्रफुल्लित कर देता है, वैसे ही नावक के तीर सा दोहा भी जीभ पर चढ़ते ही हृदय मुदित करता है। एक और दोहा मन को ललकार रहा है। पुकार रहा है-
''दृग उरझत, टूटत, कुटुम, जुरत चतुर चित प्रीत।
परत गांठ दुरजन हिये दई नई यह रीत।।ÓÓ
नयन जुड़ते ही, चतुर के दाब, वह 'दांवÓ मारा, सब चित। दोहे की इसी रीत से सारे छंदों में गांठ पडऩी ही थी। चतुरों ने गांठ बांध ली, दोहे की दोहाई मान ली। अब तो हर कवि दोहे के गठबंधन करने में लगा ही नहीं, भाग्यवान मान रहा है। अब गांठ पर गांठ पड़े, उसकी बला से। दोहे ने इतिहास में कई क्रान्ति की। पृथ्वीराज के दोहे ने आ•ाादी की डगर से विचल रहे, राणा प्रताप को अडिग, अचल कर दिया था। राजा जयसिंह राणा के विरुद्ध थे। बिहारी ने मिलने वाली मुहरों का मोह छोड़, निर्भयता से कहा था-
'स्वारथ, सुकृत न श्रमु वृथा सोचु विहंग विचारि।
बाज पराये पानि पर ते पंछीनु न मारि।Ó
नरेश नौउम्र नवोढ़ा के अनुराग में राज-काज से मुंह मोड़ बैठे। बिहारी ने प्राण-भय छोड़, फिर उन्हें झकझोर कर सचेत किया-
'नहि पराग, नहि वसंत रितु, नहि विकास इहि काल।
अली कली ही सों बिंध्यो, आगे कौन हवाल।।Ó
दोहे के दो पदों को, काव्य के खेत में बोये चने के समान ऐसा जोड़ा कि राग से जुड़ वे अनुराग में एक हो, अंकुरित हो उठे। आलम-आलम के मशहूर शायर थे। बैठे-बैठे एक मिसरा बर्फ की तरह दिमा$ग के आसमान में चमका-
'कनक छरी सी कामिनी काहे को कटि छीन।Ó
पर दूसरी लाइन लाइन पर ही न आ रही थी। बिजली सी ही कौंध कर गायब। सर खुजाया, पर वक़्त ही जाया हुआ। कोप और कोफू के मारे, पगिया उतार, वह कागज खूंट में बांध, खूंटी पर डाल दिया। पाग रंगने को दी। रंगरेजन की नजर गांठ पर पड़ी। उसने गांठ खोली। कागज पढ़ा। विद्युत की लहर सी दूसरी पंक्ति दिमाग में नाच उठी, 'कटि को कंचन काटि के कुचन मध्य धरि दीन।Ó
कागज खूंट में बांध दे आई। आलम ने गांठ खोली। पूरा दोहा देख खिल उठे। कहना न होगा, मिसरे की बंदिश ने दो दिल एक कर दिए।