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Monday 20 Nov 2017

दुख-सुख की कमीज

श्याम सुंदर दुबे
श्रीचंडी जी वार्ड
हटा (दमोह) म.प्र.- 470775
मो. 09425405939
मन की सुई से
इच्छाओं के रंग-बिरंगे धागे लेकर
दुख-सुख की कमीज सिलती हो
कभी न फुर्सत से मिलती हो!

बनी अलगनी
अपने कंधों टांगे रहती
फटे-पुराने कपड़ों जैसी
सबकी चरित-कथाएं
चुप्पी साधे
घूंट-घूंट पीती रहती हो
जीवन-प्यालों भरी हुई
विष बुझी व्यथायें!

पूजा-घर-सी बना गृहस्थी
चंदन-गुलाब की गंध बनी हुई
अगरु-शलाका-सी तुम हरदम जलती हो!
तिनका-तिनका
नेह जोड़ गौरैया जैसा
संवेदन की डाली ऊपर,
बना रही तुम एक घोंसला,
कर जाती हो पार
विपद का तूफानी नद
लहरों से टकराता रहता
सदा तुम्हारा गजब हौसला!
दुख-रजनी की बेला-बीते
किसी दूसरे की सुख-डंठल
गंधवती ता•ाी कलिका-सी तुम खिलती हो!

जीवन-जल

तुम्हें देखकर
आती है
एक नदी याद!

बलखाती
चंचल-सी
लहराती बहती,
चट्टानों के
कानों में
शक्ति कथा कहती!
बनती प्रताप
तो गिरती है
घाटी में
फेनवती होती आबाद!
मंथर-सी
फैल-फैल
खेतों को सींचती,
घाट-घाट
जीवन-जल
अंजुरी भर उचीलती!
कर्मलीन
रहती सतत
घेरता नहीं कभी
तुमको अवसाद!

खगोलों में छलांगे

तुमने सुन ली है
आहट उगते सूरज की
अंधेरों को गारती प्रभातियों के बोलों में!
तुम्हारे साथ
पृथ्वी अंगड़ाई ले रही है
बस्ती-ग्राम-टोलों में!

आकाशी माथे पर
उजली इबारत-सी लिखती
तुम किरण-सी खेलती हो
इरादे कोंपली लेकर
ओस-स्वप्नों में
तुम्हीं जो इन्द्रधनु-सी फैलती हो!
झूलती थीं मौज में
जो हिंडौलों पर कभी
अब छलांगें तुम लगाती हो-
खगोलों तक!

केवड़े और केतकी-सी
तुम महकती हो
दरो दीवार को इक घर बनाती हो,
चांद-सूरज जागते-सोते
पलक को जब
तुम उठाती हो-गिराती हो!
मुस्कान से अपनी
कि तुम मरहम लगाती हो
समय के सर्वांग में उभरे
फफोलों में!

शगुन भरी उजास

तुम्हें अभी भी है
इंतजार ऋतुओं का
तुम अभी भी
अपनी अंगुलियों के पोरों पर
तिथियों को बिचारती हो!

परिवार की जड़ों को

सींचती तो निर्जला रहकर
अपने नेह-छोह के अमृत जल से
तुम्हारे सातियों से फूटती है
शगुन भरी उजास
जैसे अंकुर जगमगाता
धरती के अंतस्तल से!

पुरखिन की स्मृति-कोख से
जनमती व्रत कथाएं
उन जैसी शैली में अब भी उचारती हो!
आकाश के ग्रह-नक्षत्रों में
तुम तलाशती हो अपनी विपत निवारण के
अचूक नुस्खे पूजा-पाठ;
तुम्हारे आंचल के छोर में
रहती है ताजिन्दगी
तीज-त्यौहारों पर बंधी हल्दी की गांठ!
वर्तमान के दुखड़ों से
करती समझौते तुम
घर में भविष्य थापती
अतीत को उचारती हो!
सात रंग की पंखों वाली

मेरे ऊपर दिन था भारी
ऐसे वक्तों तुमने कैसे-
नींद-गौड़ ली अपनी क्यारी!

घर के भीतर उठी खदबदी
बाहर खौल कड़ाह रहा है
चिंताओं के तार तानता
समय मुझे गलफांसी लगता;
दुर्घटनाओं के देश-काल में
बदला करते केवल चेहरे
हर ताजा अखबार
आजकल बासी लगता!

सुपली फटक बिताई दुपहर
संझा, तुलसी-पूजा
हुआ सबेरा हाथ में ले ली
तुमने फूल बुहारी!

झाड़ पौंछकर घर चमकाया
दुधमुंह हंसी की रौनक फैली
ठनगन मगन हुआ मन-
भूला जीवन भर के दुखड़े;
चौका-चूल्हा, ताप-धुआं से
जीवन के रस को निचोड़ती
आपाधापी में सुन लेती
इनके चर्चे उनके पचड़े!
परची इक दिमाग में अटकी
किसको-कितना लेना-देना
किसकी रह गई शेष उधारी!
फटी-चिंथी तस्वीरों को
अपने सीने से चिपकाये
खोज रहा मैं अपने ही अतीत को
घिरा हुआ दु:स्वप्नों से;
बोल-बता पाता न खुलकर
अपनी ही भाषा में उलझा
अपने इस एकांत में रहता
सहमा-सहमा अपने से!
तुम्हें देखकर लगता रहता
सातरंग के पंखों वाली चिडिय़ा हो तुम
या फिर कोई जादूभरी पिटारी!