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Thursday 23 Nov 2017

जा रही हूँ

 

कमल जीत चौधरी
गाँव व डाक - काली बड़ी
तह. व जिला - साम्बा 184121
जम्मू व कश्मीर
मो. - 09419274403
जा रही हूँ ...घर
बुहार रही हूँ ...घर
सामान बाँध रही हूँ

सब बाँध फांद कर भी
तुम छूट ही जाओगे थोड़े से
रह जाओगे अटके
पंखे के पेंच में
खिड़की के कांच में

कौंधोगे
बाहर के दृश्य में
धूप में छांव में
दर्पण में अर्पण में

ले जा रही हूँ
बुदबुदाती प्रार्थनाएँ सभी
पर तुम
जली हुई अगरबत्ती में
पिघली हुई मोमबत्ती में
चकले बेलने की खुरचन में
बर्तनों की ठनकन में
अजान में
चौपाई में
रह जाओगे बिखरे हुए थोड़ा थोड़ा
चारपाई में
तुम छूट ही जाओगे
नमक में नमक जितना
बुहारूं चाहे कितना

किसी के किस्सों में
टुकड़ा टुकड़ा हिस्सों में
रुत परेशान में
किसी की जबान में
हौसले की कमान में
रह जाओगे तुम
उठे हुए तूफ़ान में

तुम्हारा छूटना मुझे अच्छा लगेगा
तुम छूटोगे
पाबन्द हुई किताबों में
अंधेर गर्द रातों में
जुगनुओं के ख्वाबों में
ओस की बातों में

छूट जाओगे थोड़े से
शहर के शोर में
सीढिय़ों में
कोरिडोर में
रात की रेत में
रेत की सेज में
तवी की छवि में
कल्पना की कवि में
छत पर उगी काई में
खंभे की परछाई में

तुम छूट ही जाओगे थोड़ा सा
घास में
मु_ी बांधे हाथ में
आकाश में
चाँद में

जा रही हूँ
तुम्हें छोड़कर थोड़ा थोड़ा
सामान बांधे खड़ी देख रही हूँ
मैं भी तो छूट रही हूँ थोड़ा थोड़ा
कैसे बुहारूं
कितना बुहारूं

जा रही हूँ ...घर
बुहार रही हूँ ...घर।

पत्थर

एक दिन हम
पक कर गिरेंगे
अपने अपने पेड़ से
अगर पत्थर से बच गए तो

एक दिन हम
बिना उछले किनारों से
बहेंगे पूरा
अपनी अपनी नदी से
अगर पत्थर से बच गए तो
एक दिन हम
दाल लगे कोर की तरह
काल की दाढ़ का स्वाद बनेंगे
अगर पत्थर से बच गए तो -

एक दिन हम
एपिटेथ पर लिखे जाएंगे
अपने अपने शब्दों से
अगर पत्थर पा गए तो।

कवि गोष्ठी में आने के लिए
मैं सुनने आया कविता
मुझे अखबार सुनाया गया
पढऩे बैठा अखबार
मुझे बाज़ार पढ़ाया गया ...

किकर* की दातुन कर
खेत के नक्के* मोड़ता हूँ
बन्ने* पर चापी* मार
साग टोडा* खाता हूँ
बेसुरा होकर
पूरे सुर में लोक गीत गाता हूँ

मैं नहीं पढऩा चाहता बाज़ार
पर बाज़ार मुझे जबरदस्ती पढ़ लेना चाहता है
बाज़ार सबको पढ़ रहा है
बड़ी तेजी से
उसकी सॉफ्टवेयर कुल्हाडिय़ाँ
फार्मुलावन गाडिय़ाँ
हमें काट रही हैं ...

बचने के लिए
पानी हो जाओ
अगर कट के बचना है तो
थोड़ा सा गोबर बचाओ -
फिर कवि गोष्ठी में आओ।

1 - किकर - एक काँटों वाला पेड़
2 - नक्के - सिंचाई का पानी मोडऩा
3 - बन्ने - खेत की मेड़
4 - चापी - बैठने की एक मुद्रा
5 - टोडा - बाजरे की रोटी

देश के भीतर एक देश

देश के भीतर एक देश
नंगा भूखा बेछत सो नहीं पाता

एक बड़े आलीशान गोल भवन का
बड़ी बेअदबी के साथ
एक टी वी चैनल लाइव प्रसारण करता है
हर ब्रेक में गुड नाईट का विज्ञापन देता है -

देश के भीतर एक देश
खर्राटे भरता रहता है।
 
डरना

खाओ
खूब खाओ
मैं नहीं करता मना

खाना
मगर चींटी देखना

पीओ
खूब पीओ
मैं नहीं करता मना

पीना
मगर ऊँट देखना

जाओ
सो जाओ
मैं नहीं करता मना

सोना
मगर सपना देखना ...

डरो
खूब डरो
मैं नहीं करता मना

डरना
मगर डर से डरना।