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Thursday 23 Nov 2017

टूटा तो भी

शैलेंद्र
द्वारा,जीवनदीप अपार्टमेंट
तीसरी मंजिल
36, सबुज पल्ली, देशप्रिय नगर
बेलघरिया, कोलकाता-700056
मो.09903146990
कि जैसे टूटा कोई तारा
घबरा कर
घुप्प अंधेरे से
किसी ने न देखा
उसका चेहरा
न सुनी
आवाज उसकी
टूटा तो भी
कोशिश की
जाते-जाते
हल्की सी ही सही
रोशनी बिखेरने की
जुगनुओं ने
बस जुगनुओं ने
उसे देखा विस्मित
बाकी सारे के सारे
सो रहे थे
गहरी नींद में।

तब

अजी, आप मुझे थोड़ा-थोड़ा अच्छा लगते हैं
कभी-कभी बुरा भी थोड़ा-थोड़ा
कभी संतुलित, कभी हल्के
कभी बहुत भारी-बोझ की तरह
तब सचमुच अच्छे नहीं लगते
आपके मुंह से निकले उद्गार

अजी, मैं क्या करूं
न जाने क्यों आदत मेरी सुधरती नहीं-
काले को सफेद कह नहीं पाता
मटमैले को कभी लाल कहा नहीं

सपने को तो बहुत कुछ सह लेता हूं
झूठ सहा जाता नहीं-सो मुझे माफ कीजिएगा
वैसे तो आप एक मानुष ही हैं, जो भूलें करता है
सीखता है उनसे, सुधारता है खुद को थोड़ा
अजी, मुझे भी नहीं पसंद चाबुक-कोड़ा

पर सच यही है कि आपका लुढ़कना
अच्छा नहीं लगता, दिल आपका सच्चा नहीं लगता
जब साफ-साफ कुछ कहते हैं-अच्छे लगते हैं।

नादानी

तुम्हारे पास है क्या
कि कोई आएगा
खैरियत पूछने
फेरने पीठ पर हाथ
पोंछने को आंसू

कुछ भी तो नहीं कमाया
न धन, न रुतबा, न नाम

कितने नादान हो तुम
जीते हो तब भी उम्मीद में
कि कोई आएगा गले लगाने...

फिर

फिर धमाके
फिर लपटें
फिर तड़-तड़ की
बौराई आवाजें
फिर रक्त से सनी सड़कें
फिर टूटे-कटे अंग
आंखें रह जाती हैं दंग
फिर चीख-पुकार
फिर आतर्नाद
फिर क्रंदन
अरे, तुम कैसे हो इंसान...

उससे पहले ...

बड़े शरीफ हैं
बड़े खुशनसीब
सोए हैं गहरी नींद में
फूलों की सेज पर
नींद टूटेगी शायद तब
कांटे की शक्ल में जब
भूचाल कोई आएगा
उससे पहले भला कौन
उन्हें जगा पाएगा...

बदलेंगे वही

जाग उठे हैं सोते से
जो रोते थे
बस रोते थे
किस्मत को कोसते
सोते थे
जाग उठे हैं
कुछ जाग उठे हैं
भय उनके अब भाग चुके हैं।

श्रम की ताकत जान चुके हैं
खुद को थोड़ा पहचान चुके हैं
बदलेंगे वही
मिजाज मौसम के
तोड़ेंगे वही जड़ताएं।

कभी-कभी

पुचकारते हुए से
दुलारते हुए से
प्यारे-प्यारे
अस्त्रहीन
शब्द
कभी-कभी
अख्तियार कर लेते हैं
खंजर की शक्ल
अक्ल ठिकाने लगाने पर
जब हो जाते हैं आमादा।


रीति

चल पड़ी है रीति
किस्तों की
खतरे में पड़ी
बुनियाद
रिश्तों की।

उनके साथ

हमारे कानों तक पहुंचती हंै-
हंसी
कभी-कभी
चेहरे पर खिली मिलती है

खिलखिलाहट और ठहाके भी
दुर्घटनावश कभी-कभी

रुआंसे चेहरे
थरथराते जिस्म
कनखियों से भी दिख जाते हैं-
अक्सर

नम आंखें
विलापतीं आवाजें
लगातार पीछा किए जा रही हैं-
हमारी
हम-आप सुन-देख लेते हैं
मालूम नहीं
उनके साथ ऐसा क्यों नहीं हो पाता ।