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Thursday 23 Nov 2017

साक्षी हूँ मूक

 विजेन्द्र
503 , अरावली ,  ओमैक्सी हिल्स ,  से. 43
फरीदाबाद -121001, हरियाणा
मो. 9910562258
मछलियों को भी आना पड़ता है
सूखे तट पर
अनेक दुनियाओं में से
वनों की दुनिया भी एक है
जो भीगते हैं वर्षा में
देर तक बूँद बूँद निचुड़ते हैं मंद मंद
मेरी दुनिया से अलग और भिन्न हैं
जाने कितनी दुनियायें और और                                                                                                                                  तंग गलियों की बेचैनी से आक्रांत
कठफोड़वा भी मेरा नायक है
कहा है जिसे मैंने वसंत का राजकुमार
अदृश्य दीवारों को
तोड़ता रहा है मनुष्य ही
खड़ी करता है
पत्थर की दीवारें वही दृश्य अदृश्य
अपने ही आस पास
मुझे नदी करती है अलग
सूखी धरती से, पुष्प से, पत्थर से
मछली से ही बने होंगे उभयचर
हमारे पूर्वज कौन थे
कौन से जंतु हैं
जो भूल गये अपना जल पथ
पक्षियों के आदि पूर्वज सरीसृप
जंतुओं के जीवाश्म ... उनकी हड्डियाँ
काल की खरोंचें, कराल विकराल
चट्टानों के माथे पे
साक्षी हैं मौन, सन्नाटे का घनापन
तब मैं कहाँ था
शब्द भी कहाँ थे
कोई बिना बदले नहीं रहा
बदलना है उसे भी
जो अब हो गया है सड़ा नरक
भीगा पत्थर
कठफूला बाँस
फफंूद लगा गोबर
अटल टल कुुछ भी नहीं है
तप्त लावा बना है ठोस पर्वत
जिन बातों को नहीं जाना
मेरे पुरखों ने
उसे मैंने जाना है तप कर इस्पात में
जलती धरती ठण्डी हुई है
जहाँ नहीं था चिन्ह जीवन का
हल चलाता है खेतों में किसान
दलदल बदला है उर्वर भूमि में
ओह ... कैसा जादू है
समुद्र से मुखर होते हैं
नव अंग पृथ्वी के प्रशांत
क्या देखा है तुमने
मैदानों को सहसा बदलते पहाड़ों में
पतझरी वन भी
कभी रहा होगा सदाबहार
जब बदलते हैं पत्थर, वृक्ष, चट्टानें, नद, नदी
तो क्यों नहीं बदले
यह सड़ा ठठ्र, बुझी देह, ठण्डी राख
स्वयं नहीं बदलता कुछ भी
असंख्य सिलवटें झलकती हैं पटलविरूपण में
प्रहार पर प्रहार दहल पर दहल
कौन कैसे बदले
कौन करेगा इसका निर्णय
मैं नहीं बदला
अपनी सहज इच्छा से
भूख की आग ने
मुझे बनाया है सर्वभक्षी
वनों की सघनता ने
सिखाया है पथ बनाना
पहाड़ों ने पत्थरों को तोडऩा
अभावों की कोख से ही जन्मी है आग
हर बदलाव में नहीं होते
चिन्ह रोशनी के
दाने अन्न के
गंध फूलों की, बीज उगान के
स्वाद सिंकी रोटी का
मरते सूखते देखा है
जंतुओं ...पौधों को
धरती पे निढाल
आज भी मरते हैं कुछ ही लोग ठण्ड से
झुलसते हैं लू में कुछ ही
धरती होती है काली आदमी के खून से
घने में घूमते घूमते
पार किये हैं अदृश्य बाड़े सित असित
क्यों होते हैं उकाब के डैने
इतने मज़बूत, ऊंची उड़ान को उत्साहित
पंजे खौफनाक
सुर्खाबों के खूबसूरत जोड़े सुनहरे तैेरते लहरें
सारसों की लंबी गर्दनें
आसमानी रंग
सिर कत्थई
किसके हाथ करते हैं चट्टानों में
सुरंगों का निर्माण
बिना पंख जो पहुँचता है चंद्रमा पे
मरु के सूखे हृदय से उमड़ती जल धार
महा वन सघन गहनतर
छितर रहे हैं मंद मंद
तुले हैं कुछ लोग
उन्हें बनाने को मैदान
कौन छीनता है अदिवासियों से
उनकी विरासती धरती
वे क्यों  खड़े होते हैं विरोध में
लेकर तीर धनुष अपनी धरती की हिफाज़त को
होने लगा है ज्ञान उन्हें वर्ग शत्रु का

कौन बनाता है उन्हें हिंसक, विद्रोही,  खौफनाक
बिना फेफड़ों के
कैसे ले पायेंगी साँस मछलियाँ
कोई ठौर नहीं जिनको
सघन वनों के सिवाय
विपदाओं से बचने को
करता रहा हूँ हर कदम पुनरावलोकन
समुद्र मंथन
कलुष प्रक्षालन
अपने अंतरंग का
विगत, गत अगत की कडिय़ाँ
पिरोई हैं शब्द धागों में
तेज़ दौडऩे को उँगलियाँ नहीं
चाहिये सुम खुर गद्देदार पाँव
घोड़ा कैसे चरेगा घास
भालू की गर्दन से
चबाने वाले दाँतों को चाहिये
मोटे, खुरदरे, गाँठ गँठीले पौदे
बाडं़े स्थाई नहीं हैं
न तट , न ज्चार भाटे , न चट्टानें कठोर
बादल कहाँ ढके रहते हैं सूर्य को सदा
चक्की के पाट और सिलबट्टे के दँात भी
कहाँ दे पाते हैं साथ आदमी का
जो वर्जित हैं भूमि मेरे लिये
दूसरे को है मनोहारी आवास
बर्फ  में मगन है सफेद रीछ
सूँघ कर भांपता है
मछली को हिम नद में
होता जाता हूँ क्यों
अपनी नन्ही सी दुनिया का आदी
एक अदना भीरु
आदमकद शीशे में कैद
कहाँ नहीं रह सकता मैं किस ठौर
मुझे नहीं करनी पड़ी अदला बदली
हाथ पैरों की पक्षी के परों से
घोड़े के दाँतों से , हाथी की सूँड़ से
ऊँट की गर्दन से
बाड़ों को तोड़ कर ही
बना हूँ मनुष्य
जो सुनता है
दूसरों की धड़कनें
करुण क्रंदन, राग, अनुराग, विराग
डूबी साँसों की गहरी आह
मैं नहीं हूँ दास वनों का
पहाड़ों का , नदियों का
मैंने छीनी है निसर्ग से
उसकी पाठ््य पुस्तक
काटता हूँ उन बंधनों को
जो मुझे रोकते हैं बढऩे से
ढहाता हूँ उन दिवारों को
जो नहीं करने देती प्यार मनुष्य से
मुक्त होने को ही
बदला है मैंने स्वयं को
विश्व विराट धरती को