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Sunday 21 Jan 2018

कच्चा दूध

प्रेमशंकर रघुवंशी
प्रताप कॉलोनी
हरदा (म.प्र.) 461331
भूरी भैंस जनी थी पहले
परसों ब्याई गैया
भर-भर लुटिया बांटन लागीं
चीका घर घर मैया।

थूनी थूनी पड़ा पड़ेरू
थूनी थूनी बछड़े
दादी जिनके रोम-रोम में
तेल ठीक से चुपड़े
रम्हा रम्हा पूरी गौशाला
नचती ता ता थैया।

भर-भर मथनी मही बनाए
नेनू लोंदे लोंदे
जो भी मांगन आये उनको
भौजी थके न दे दे
बासी खीर सुबह तक खायें
मिलकर बहना भैया।

कच्चा दूध गमकता घर में
पुरा पुरा में मट्ठा
बच्चों के मुंह सदा महकता
मक्खन खट्टा-मिट्ठा
गौ दोहन की सरर सरर से
उठे दूध पर छैया।

गाये जने पर उत्सव होता
भैंस जने पर मेला
मेहमानों की होने लगती
हर दिन रेलम पेला
भोजन पे मनुहारें करते
घी देते परसैया।

जब तक गाय भैंस का गोरस
तब तक द्वारे गंगा
लगता है परिवार गांव में
अब तो पूरा चंगा
कुछ दिन को खुशियों के तट पर-
ले आई यह नैया।

माथे पर

माथे पर मंडराते गिद्ध
तने आसमान और बिछी हुई धरती के
ये ही तो बन बैठे सिद्ध!!

एक ही झपट्टे में धारदार चोंचों से
नोंच-नोंच खा जाते गोश्त
हंसते हैं बजा-बजा तालियां
खिड़की के पीछे से दोस्त
लेकिन ये कांपते कलेजों से
होते क्यों खुद में आबद्ध!!

आओ अब एक साथ तन मन की आगी से
झुलसा दें इनके ये पंख
तब जाकर फूंक लें इरादों भर
डटकर के मुक्ति के शंख
अभी तो जरूरी है खड़ा होना
हम सबका इनके विरुद्ध!!