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Thursday 23 Nov 2017

आर्ट का पुल

फहीम आजमी
अनुवाद- दरवेश भारती
डी-38, निहाल विहार नांगलोई
नई दिल्ली- 110041
मो. 9268798930
पहले तो सारा इलाका एक ही था और उसका नाम भी एक ही था। इलाका बहुत उपजाऊ था। बहुत-से बाग, खेत, जंगली पौधे, फूल और झाडिय़ां-सारे क्षेत्र में फैली हुई थीं। इस इलाके के वासियों को अपने जीवन की आवश्यकताएं जुटाने के लिए किसी और इलाके पर आश्रित नहीं होना पड़ता था। खेतों से अनाज, पेड़ों से मकान बनाने और जलाने की लकडिय़ां, भट्ठों से पकी हुई ईंटें, पास के बागों से फूल और साग-सब्जी, पास के तालाब से मछलियां ... अर्थात् आवश्यकता के सभी पदार्थ उपलब्ध थे।
धीरे-धीरे पास के व्यापारिक नगर से व्यापारिक सभ्यता और विकास की लहरें इस इलाके की ओर बढऩे लगीं और एक दिन इस इलाके में बहुत-बड़ा नाला खोदा गया जिसने इस क्षेत्र को दो भागों में बांट दिया। किसी ने कहा कि यह गड्ढा बिजली के तारों को खम्भे के ऊपर से ले जाने के स्थान पर धरती  के नीचे दबाने के लिए खोदा गया है। कोई कहता था कि इस इलाके में टेलीफोन आनेवाला है और यह टेलीफोन की लाइनें बिछाने के लिए खोदा गया है अथवा जितने मुंह उतनी बातें। बस सवेरे ही ट्रेक्टर और कुटियर और उसके साथ कुछ मजदूर आ जाते थे, फावड़े और गेंती के साथ। ये लोग इस गड्ढे को गहरा करना शुरू कर देते थे और शाम को चले जाते थे। यदि इनसे कोई पूछता था तो बस यही कहते कि ठेकेदार से पूछ लो, हमें नहीं मालूम कि यह क्यों खोदा जा रहा है।
दिन-प्रतिदिन गड्ढा गहरा होता गया और एक दिन उसने इलाके के बीच में एक सूखे नाले का रूप धारण कर लिया। अब इसको पार करना लगभग असम्भव-सा हो गया और इस प्रकार नाले के इस पार के लोगों तथा उस पार के लोगों का संबंध विच्छेद  हो गया। कभी-कभी नाले के इस पार के लोग उस पार के लोगों से नाले के दोनों ओर खड़े होकर वार्तालाप कर लेते थे और अधिकतर बात का विषय यह नाला ही होता था।
उन्हें उन कोयलों और मैनाओं से बहुत स्पद्र्धा होती थी, जो बिना किसी बंधन के नाले के इस पार के पेड़ों से उड़कर उस पार के पेड़ों पर बैठ जाती थींऔर इस पार के खेतों से उड़कर उस पार के खेतों में दाने चुगने लगती थीं।
और एक दिन ठेकेदार के आदमी चले गए। नाला उसी प्रकार खुदा रहा। संभवत:, दूसरा ठेकेदार, जिसे तार बिछाना था या तीसरा ठेकेदार, जिसे गड्ढा पाटना था, अभी तक निश्चित नहीं किया गया था या वह किसी दूसरे इलाके में व्यस्त था। यह सूखा नाला यों ही पड़ा रहा, यहां तक कि वर्षा आई और यह पानी से भर गया। धीरे-धीरे उसके दोनों ओर के किनारे टूटने लगे और उसने एक नदी का रूप धारण कर लिया, जो आगे चलकर एक बड़े नाले में मिल जाती थी और फिर उस दरिया में मिल जाती थी, जो इलाके के पास ही बहता था।
सर्दी आई तो लोगों ने सोचा कि नाले का पानी खुश्क हो जाएगा और शायद ठेकेदार के आदमी उसको पाट दें। कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्होंने उसे स्वयं पाटने का विचार किया, परंतु जैसे ही सर्दी समाप्त हुई और गर्मी आई, आस-पास की पहाडिय़ों पर बर्फ  पिघलने लगी। यह बर्फ  पहले भी पिघलती थी, परंतु छोटी-छोटी नालियों के रूप में फैल जाती थी और तेजी से ढलान की ओर बहकर उसका पानी दरिया में मिल जाता था। यदि कहीं पानी फैला भी तो अधिक समय तक नहीं रूकता था, किंतु अब सारा पानी बहकर इलाके के उस नाले में आ गया। गर्मी बीती, वर्षा आई, नाला और विस्तृत हो गया । किनारे और टूटे तथा यह नाला हर बरस चौड़ा होता गया और फिर एक बड़े दरिया ने इलाके को दो भागों  में बांट दिया, इलाके के निवासियों को दो भागों में बांट दिया, रिश्तेदार कुछ इधर और कुछ उधर रह गए और जब मुहम्मद खान की पुत्री के विवाह की समस्या आई तो मुहम्मद खान की पत्नी ने कहा, ' तो फ्रिक काहे की है? तुम्हारे भाई के बेटे के साथ तो बचपन में रिश्ता हो चुका है।Ó
मुहम्मद खान पहले तो चुप रहे, फिर उन्होंने एक ठंडी सांस ली और बोले, ' क्या बात करती हो? अरे, वे लोग उस पार के हैं। अब हमारा उनसे क्या वास्ता! अपने इलाके में रिश्ता खोजो।Ó
' तो ऐसी कौन सी बात है, हम एक ही तो हैं। वह उस पार रहता है तो क्या हुआ!  तुम्हारा भाई ही तो है।Ó
'नहीं, अब वह उस पार रहता है, बीच में दरिया है। इस पार के लोग उस पार के लोगों से अलग हैं। वह मेरा भाई था, लेकिन तब, जब दरिया नहीं था।Ó
'तो दरिया खून के रिश्ते को तो नहीं तोड़ सकता।Ó
और फिर अरब से आवाज आई । हमारा भी खुदा वही है। पूरब का खुदा वही है, पश्चिम का खुदा वही है और आज सब कहते हैं, हम सबका खुदा वही है। फिर दरिया ने क्या बदला, खुदा को तो बदला नहीं।
शहनाई की आवाज फिर गूंजी और मुहम्मद खान ने सोचा- दरिया उस आवाज को तो रोक नहीं सका और रोक भी नहीं सकता। यह तो दरिया के पानी से टकराकर और भी अच्छी लगती है।
और फिर देखते-ही- देखते कुछ और लोग मुहम्मद खान के पास आ बैठे और सोचने लगे- क्या अच्छी आवाज आ रही है, दरिया के उस पार से। हमारी सरहदें अलग हैं और बीच

में दरिया है, मगर यह गाने-बजाने की आवाज कितनी मधुर लग रही है। शादी हो गई  और शहनाई की आवाज बंद भी हो गई, परंतु अब तो लोगों को चस्का पड़ गया था। दरिया के किनारे पर प्रतिदिन सायंकाल को मेला लगने लगा। उस पार के गीत और सितार की मधुर आवाज सुनते रहते और $िफर उस पार के लोग भी अपनी तरफ के किनारे पर बैठने लगे, इस पार के गीत सुनने  के लिए। दरिया के पानी से छनकर आनेवाली मधुर आवाज कितनी दर्द-भरी थी, कितनी सुरीली। और फिर इन आवाजों के साथ और बहुत-कुछ आया। दरिया के किनारों पर पिकनिक होने लगी, पकवान बनने लगे। वर्षा से बचने के लिए छप्पर बन गए, बैठने के लिए चबूतरे और भोजन की सुगंध और गाने की महक और शरीरों की झलक। अब दोनों तरफ के इलाकों में नफरत का एहसास समाप्त हो गया था। और एक दिन इस इलाके का मुखिया आया और कहने लगा, 'तुम्हारे यहां गानेवालों और शायरों की क्या कमी है कि तुम उस पार के गानों की आवाज इतने शौक से सुनते हो। अरे, अपने इलाके के गाने गाओ, अपने इलाके वालों की आवाज सुनो। बस्ती में जाकर बैठो। वे तो उस पार के लोग हंै।Ó
परंतु मुहम्मद खान बोला, 'मुखिया जी!  अब यह तुम्हारे बस की बात नहीं है कि इनको रोको। इन्हें अब नाव की जरूरत नहीं। ये तो आसानी से उस पार चले जाते हैं आर्ट के पुल पर से...।Ó और इस बार किसी ने मुहम्मद खान की बात को नहीं काटा।
मुखिया अपनी आंखों पर दाएं हाथ की हथेली से साया करके और उचक-उचककर दरिया पर बना हुआ पुल तलाशने लगा।