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Thursday 23 Nov 2017

लड़की बिकाऊ नहीं है

डॉ. राजेश पाल
लेन-12, एकता विहार
सहस्त्रधारा रोड, देहरादून
मो.9412369876
सर्पीली पहाड़ी सड़क पर बोलेरो गाड़ी तेजी से चलती जा रही थी, गांव से निकलते ही गाड़ी में दुल्हन ले जाने के गाने ऊंची धुन में डैक में बज रहे थे। गाड़ी में बैठे हुए सभी बाराती गानों का पूरा लुत्फ ले रहे थे और उन पर ऐसा सुरूर छा गया था जैसे जंग में कोई राजा किसी रानी को जीत लाया हो।
गाड़ी ने नैनबाग पार कर लिया था पर लक्ष्मी को गानों की धुन कानों में चुभ रही थी। डामटा से नैनबाग तक लक्ष्मी इसी युक्ति पर मंथन करती रही कि किस तरह वह गाड़ी रुकवाए और इन लोगों को चकमा देकर गायब हो जाए लेकिन उसे कुछ सूझ नहीं रहा था न ही उसे कोई ऐसी घटना याद आई जब कोई लड़की इस तरह से बारातियों को चकमा देकर गायब हो गई हो। उसने तो बस वही कहानियां सुनी थी जिसमें दुल्हनें पहाड़ के गांव से खुशी-खुशी विदा होकर मैदान के किसी खुशहाल घर में प्रवेश करती हैं और उसके साथ जीवन से विदा होती है पहाड़ की पहाड़ जैसी तमाम दुश्वारियां। वह तमाम घटनाओं को याद कर ही रही थी कि गाड़ी भीड़ में बहुत धीमी हो गई, उसे लगा कि शायद ये ही विकास नगर बाजार होगा। अमर स्वीट शॉप के पास मुख्य सड़क पर घनी भीड़ थी और सड़क के दोनों तरफ पहाड़ के विभिन्न गांवों में जाने वाली ढेरों यूटिलिटी खड़ी हुई थी उनमें से कई गांवों के नाम वह जानती थी जहां उनकी रिश्तेदारियां भी थी, चकराता, त्यूणी, उत्तरकाशी, बड़कोट, पुरोला व नौगांव जाने वाली बसें भी सड़क के किनारे खड़ी हुई थी, बसों के कंडक्टर जोर-जोर से गंतव्य बोलकर सवारियों को बुला रहे थे, ड्राइवर भी उतनी ही जोर से हार्न बजा रहे थे।
जौनसार एवं जौनपुर के लोग अपनी वेशभूषा में तराई में बसे इस बाजार की गहमा-गहमी में दिखाई दे रहे थे। बोलेरो इस भीड़ में लगभग रेंग रही थी अचानक लक्ष्मी का ध्यान एक युटिलिटी पर गया जिसके ड्राइवर को वह पहचान रही थी, उसने जोर-जोर से उबकाई लेनी शुरू की और उल्टी करने का बहाना कर गाड़ी को सड़क के किनारे रुकवा ही दिया वह गाड़ी से उतरी तो उसके साथ दूल्हा नरेश भी नीचे उतर गया। वह दुल्हन की पोशाक में सजी हुई थी और यह पोशाक उसे भागने के लिए बहुत भारी लग रही थी। जबकि कितनी ही बार भारी वजन उठाकर वह पहाड़ के ढंगारों पर सबसे तेज दौड़ती थी पर अब उसे लग रहा था कि शायद वह भाग नहीं पाएगी और अगर भागी तो इन कपड़ों में उलझकर जल्दी ही गिर जाएगी। पर वह चकमा देने का पक्का इरादा कर चुकी थी और अपनी पूरी ताकत से भीड़ को चीरती हुई युटिलिटी की तरफ दौड़ी, दौड़ते-दौड़ते वह एक-दो लोगों से टकरा भी गई और उसके दौडऩे की चपेट में एक बच्चा गिरकर जोर-जोर से रोने लगा। गाड़ी में बैठा हुआ पंकज होने वाली मां की तरफ ही लगातार देख रहा था, गाड़ी में भी वह मां के एक तरफ ही बैठा हुआ था तथा स्वयं ही मां के स्नेह की उष्णता महसूस करने लगा था। वह जोर से चिल्लाया-
''पाप्पा वो देक्खो मम्मी तो भाग गी।ÓÓ
उसे भागता देखकर नरेश उसके पीछे दौड़ा और गाड़ी से उतरकर नरेश का पिता सुग्गन तथा मामा लाभचंद, उसका छोटा भाई उमेश भी उसकी तरफ दौड़े।
लक्ष्मी पहचानती थी यूटिलिटी का ड्राइवर किशन उसके मामाकोट (मामा का गांव) का है और वह उसकी गाड़ी में कई बार डामटा से बैठकर मामाकोट गई थी। ड्राइवर किशन उसके ममेरे भाई का दोस्त है। वह बदहवास सी किशन के पास पहुंची और जोर-जोर से चिल्लाने लगी-
''किशन भाई जी मुझे बचा लो, मुझे बचा लो, तुम जल्दी से गाड़ी स्टार्ट कर मुझे यहां से ले चलो।ÓÓ
किशन ने उसे दुल्हन की पोशाक में एक नजर में नहीं पहचाना। वह समझ गई कि किशन उसे पहचान नहीं पा रहा है। उसने जल्दी-जल्दी बता दिया कि- ''मैं तुम्हारे दोस्त रघुवीर भाई की बुआ की लड़की हूं।ÓÓ
जब तक किशन कुछ समझ पाता बाराती लक्ष्मी को पकडऩे के लिए आ पहुंचे और वे लक्ष्मी की बांह पकड़कर ले जाने के लिए खींचने लगे, लेकिन लक्ष्मी लगातार चिल्लाए जा रही थी किशन बीच-बचाव में आ गया और देखते ही देखते ही यूटिलिटी के दस-बारह ड्राइवर किशन का साथ देने के लिए वहां जमा हो गए, सड़क पर चलती भीड़ थम सी गई और इस तमाशे को देखने के लिए लोग दुकानों से निकल-निकल कर बाहर आ गये, उचक-उचककर देखने लगे। भीड़ का शोरगुल बढ़ गया था और कोई कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। लेकिन एक दुल्हन की पोशाक पहने सुन्दर लड़की को इस तरह खींचते हुए देखकर यह समझना मुश्किल नहीं था कि लड़की को उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ लोग जबरदस्ती ले जा रहे हैं। भीड़ की सहानुभूति निश्चित रूप से लड़की के साथ हो गई और बीच-बीच से आवाजें आने लगी। बढ़ती भीड़ को देखकर बारातियों में दहशत भर गई और उन्हें लगने लगा कि यहां इस स्थिति में वे अपनी बात किसी को नहीं समझा पाएंगे और हो सकता है भीड़ उन पर किसी भी वक्त टूट पड़े।
नरेश के पिता ने लक्ष्मी के आगे हाथ जोड़ दिए- ''बेट्टी तमाश्शा न करै म्हारी इज्जत भी और थारे पिता की इज्जत भी जागी, आ चल म्हारी गेल्लो घर चल।ÓÓ
लेकिन ड्राइवरों के धक्के-मुक्के में उनकी बात आई-गई हो गई। किशन ने भीड़ को धकियाकर लक्ष्मी को यूटिलिटी में चढ़ा दिया और खुद बारातियों से उलझ गया, कुछ ड्राइवरों ने नरेश के कॉलर पकड़कर उसे भीड़ में खींच लिया। नरेश के पिता सुग्गन ने फिर यही पैंतरा चला और किशन के आगे हाथ जोड़कर बोला- ''बाबूजी म्हारी बात सुणो हम कोई जोर-जबरदस्ती से लड़की को लेके नी जा रे, लड़की के घरवालों ने लड़की की मरजी से शाद्दी करी।ÓÓ
पहाड़ी लड़की को दुल्हन की पोशाक तथा देशी बाराती देखकर किशन यह तो समझ गया था कि मामला शादी का है लेकिन यह नहीं समझ पा रहा था कि लड़की भागना क्यों चाहती है और न ही वहां इस तरह का माहौल बन पा रहा था कि किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके। उसके साथी ड्राइवरों ने उसे सलाह दी कि मामला लड़की के साथ जोर-जबरदस्ती का है अत: यही ठीक रहेगा कि इन्हें थाने के सुपुर्द किया जाए।
भीड़ का रुख आक्रामक होता देख बाराती सोच ही रहे थे कि किसी तरह भीड़ से बचने का तरीका निकले। पुलिस थाने का नाम सुनकर पहले तो बाराती सकपका गए और सब हाथ जोड़कर ड्राइवरों की मान-मुनौव्वल सी करने लगे। जब सुग्गन ने देखा कि ड्रायवरों की भीड़ ने नरेश को बुरी तरह घेरकर नीचे गिरा दिया तो वह हाथ जोड़कर तुरंत थाने चलने के लिए तैयार हो गया।
सब्जी मंडी के सामने बाईपास रोड थाने पर इंस्पेक्टर विक्रमसिंह आज सुबह से ही खाली बैठा हुआ था, ग्यारह बज चुके थे और अभी तक थाने में कोई भी केस नहीं आया था और न ही फील्ड से कोई गश्ती सूचना उसे मिली थी। खाली बैटे-बैठे वह दो बार चाय पी चुका था और निठल्ले गालियों की जुगाली में उसे कुछ मजा नहीं आ रहा था, उसने मेन बाजार, पुलिस चौकी इंचार्ज महिपाल बिष्ट को फोन मिलाया ''अरे बिष्ट! आज इलाके में कोई हलचल नी है सब मर गये क्या? कोई केस हो तो थाने में भेज दियो सीध्धे।ÓÓ
इसी बीच थाने के सामने दो-तीन गाडिय़ां रुकी और उनसे उतरकर पन्द्रह-बीस लोगों ने जब थाने के गेट के अंदर प्रवेश किया तो यह देखकर इंस्पेक्टर राठौर संयत होकर कुर्सी पर थानेदारी रुआब के साथ फैल गया, अभी तक सुनसान पड़े थाने में सभी अपने-अपने तरीके से सजग व क्रियाशील हो गए। थाने के बरामदे में हेड कांस्टेबल दरियाव सिंह रावत चौकन्ना होकर भीड़ को समझने की कोशिश करने लगा। दुल्हन के लिबास में एक लड़की तथा कुछ यूटिलिटी के ड्राइवर, जिनमें से कुछ को वह पहचानता भी था तथा कुछ अनजान चेहरे देखकर उसने कयास लगाने की कोशिश की कि मामला लड़की को लेकर है, उसने भीड़ को बरामदे में ही संभालते हुए बेफिक्री के अंदाज में भीड़ पर नजर डाली, कुछ जानकर चेहरों ने जोर से कहा- ''इंचार्ज साहब! नमस्कारÓÓ।
दरियाव सिंह रावत के कंधे और ऊंचे हो गए, उसने ड्राइवरों को आत्मीयता मिश्रित रौब से पूछा ''क्या बात है कैसे आए होÓÓ?
ड्राइवर किशन ने बारातियों की तरफ इशारा करते हुए कहा ''साहब ये लोग हमारी इस बहन को जबरदस्ती ले जाना चाहते हैं आप चाहें तो सारी बात लक्ष्मी से पूछ सकते हैं।ÓÓ
दरियाव सिंह रावत ने लड़की को गौर से देखा और कहा- ठीक है तुम लोग ठहरो, मैं जरा सी.ओ. साहब से बात करके आता हूं।
भीड़ को वहीं रोककर दरियाव सिंह रावत, इंस्पैक्टर विक्रम सिंह राठौर के पास गया और मुस्कुराते हुए बोला- ''साहब मुर्गा फंस गया है और साथ में एक मुर्गी भी है।ÓÓ
इंस्पेक्टर विक्रम सिंह राठौर ने टेबल पर रखी हुई बेंत को दोनों हाथों में गोल-गोल घुमाकर सीधे तनकर बैठते हुए कहा- ''अरे रावत ठीक-ठीक बता मामला क्या है?ÓÓ
रावत ने खैनी से काले हुए दांत निपोरते हुए कहा- ''साहब मुझे तो ऐसा लग रहा है कि मामला लड़की नापसंदगी का है और लड़की बारातियों के साथ जाना नहीं चाहती है, बाकी आप लपेट लेना। आप कहो तो मैं अंदर भेज देता हूं।ÓÓ
दरियाव सिंह रावत ने बाहर जाकर इशारे से उनको बुला लिया और कहा- ''कुछ आदमी बाहर रुक जाओ, जो जरूरी हैं अंदर चले जाओ।ÓÓ
किशन, दो-तीन ड्राइवर व लड़की को लेकर अंदर चला गया उन्होंने बारातियों को भी अंदर बुला लिया, कुछ लोग कुर्सियों पर बैठ गए, कुछ खड़े रहे, एक कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए इंस्पेक्टर राठौर ने लड़की को बैठने के लिए कहा और मोटी-मोटी आंखों से सबकी तरफ घूरा और थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोला ''कौन जबरदस्ती ले जा रहा था लड़की को?ÓÓ
सुग्गन सिंह खड़ा हुआ था, हाथ जोड़कर झुक गया-
''साहब कोई जोर-जबरदस्ती नी कर रहे थे दरअसल लड़की की मर्जी से ही लड़की को ब्याहकर लाए हैं।ÓÓ
इंस्पेक्टर राठौर ने लड़की की ओर इस तरह देखा कि वह बिना पूछे ही उसके हाव-भाव से अंदाजा लगा ले। इंस्पेक्टर को अपनी ओर घूरते देखकर कुर्सी पर बैठी लड़की और सिमटकर बैठ गई। किसी थाने में तो दूर उसका किसी सरकारी ऑफिस में किसी साहब के सामने बैठने का यह पहला अवसर था। वह एक अनजान भय से अंदर तक कांप गई।
''दूल्हा कौन सा हैÓÓ इंस्पेक्टर ने जोर से पूछा।
सुग्गन सिंह ने नरेश की तरफ इशारा करते हुए कहा- ''जी यो है मेरा बेट्टा।ÓÓ
नरेश अपने अस्त-व्यस्त कपड़ों में थोड़ा संयत होकर इंस्पेक्टर के आगे थोड़ा झुक गया।
इंस्पेक्टर विक्रम राठौर घाघ हो चुका था इस थाने में उसकी पोस्टिंग तीन साल से थी उसे मामले को समझते देर नहीं लगी, इस थाने में इस तरह के कई मामले पहले भी देख चुका था, इंस्पेक्टर ने नरेश को घूरते हुए पूछा-
''कितने बच्चों के बाप हो?ÓÓ
''जी दोÓÓ
''क्या-क्या उमर है?ÓÓ
''जी दस साल का लड़का और तेरह साल की लड़की।ÓÓ
''कितनी उमर है तुम्हारी?ÓÓ
''जी पैंतीस सालÓÓ
''झूठ बोलते हो, शरम नहीं आती, चालीस से कम के तो लग नहीं रहे हो, तो चालीस साल में दूल्हा बनने चले हो।ÓÓ
सुग्गन ने थोड़ा रिरियाते हुए कहा- ''साहब उमर तो थोड़ी ही है थोड़ा घर-गृहस्थी के बोझ से दबा हुआ। बहू गुजर गी थी, बच्चों की सारी जिम्मेदारी इसी के ऊप्पर है।ÓÓ
इंस्पेक्टर विक्रम सिंह ने एक बार फिर हुंकार भरी और शब्दों का जाल बिछाया, ''तो कुछ खरचा-खुरचा करा या लड़की को बहला-फुसला कर लाये हो?ÓÓ
सुग्गन सिंह, इंस्पेक्टर के थोड़ा पास सरक आया और विनम्रता में हाथ जोड़कर झुककर दोहरा हो गया ''नहीं साहब, लड़की के पिताजी की मरजी से रिश्ता जोड़ा है बस साहब पैंतीस हजार रुपए खरचा दिया है और बहू के जेवर और कपड़े भी हमने ही चढ़ाए हैं लड़की के पिताजी का कोई खरचा हमने नी करवाया।ÓÓ
गहनों का नाम सुनकर लक्ष्मी और बोझ से दब गई, वह कुछ बोलना चाह रही थी पर उसे कहीं बोलने का मौका ही नहीं मिल रहा था उसकी जुबान जैसे चिपक गई थी।
राठौर खड़ा होकर गरज पड़ा और हाथ में बेंत घुमाते हुए बोला- ''हूं... तो मामला मानव खरीदारी का है, खरीदकर लाए हो लड़की, दफा 340, 345, 265 लगेगी, सात साल की जेल काटोगे सारे के सारे। चूतड़ों पे डण्डे पड़ेंगे और जमानत भी नी होगी तब पता चलेगा। चालीस साल का दूल्हा ले के चले ब्याहने सोलह साल की लड़की से, अकल ठिकाने करूंगा तुम्हारी। दरियाव सिंह बन्द कर दे इन्हें लॉकअप में।ÓÓ
सुग्गन सिंह अन्दर तक कांप गया था वह इंस्पेक्टर राठौर के पैरों में हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा।
इंस्पेक्टर राठौर ने दरियाव सिंह को इशारा करते हुए कहा ''पहले इसे ही ले जा, बुड्ढे को। इसकी अकल ठीक करके ला, इसके दो-चार पड़ेंगे तो समझ में आवेगा।ÓÓ
दरियाव सिंह इशारा समझ चुका था और वह सुग्गन सिंह को पकड़कर अंदर के कमरे में ले गया उसने सुग्गन सिंह को सहानुभूति के साथ ऊंच-नीच समझाई। सुग्गन सिंह ने अपने बनियान की जेब से दस हजार का बण्डल दरियाव सिंह के हाथ में रखते हुए हाथ जोड़कर बोला- ''साहब हमें बचवा दो थारी बड़ी मेहरबान्नी होगी।ÓÓ
दरियाव सिंह रावत, सुग्गन सिंह को एक बेंच पर बैठे रहने का इशारा करके बाहर आ गया और इशारे में अपनी बात इंस्पेक्टर विक्रम को समझा दी। इंस्पेक्टर विक्रम सिंह ने कहा- ''भई देखो! ये मामला तो पेचीदा है लड़की के पिताजी को बुलाया जाएगा, उससे भी पूछा जाएगा अभी तुम सब लोग बाहर ठहरो।ÓÓ
इंस्पेक्टर ने महिला कांस्टेबल मंजू पंवार को बुलाकर कहा ''जब तक इसके पिताजी नहीं आ जाते लड़की तुम्हारी कस्टडी में रहेगी।ÓÓ
मंजू पंवार, लक्ष्मी को बराबर वाले कमरे में लेकर गई और उसे अपनी सीट के सामने वाली बेंच पर बैठा दिया।
ड्राइवरों को अपनी-अपनी गाडिय़ां लेकर वापस गांव भी जाना था इसलिए वे अपने नुमाइन्दे किशन और यूटिलिटी एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहर सिंह चौहान को थाने में छोड़कर लौट गए।
मंजू पंवार ने जौनपुरी में लक्ष्मी से बातचीत शुरू की। अपनी बोली में बात करके लक्ष्मी ने खुद को थोड़ा हलका महसूस किया और मंजू पंवार की आंखों में उसे अपनापन दिखाई दिया। मंजू ने आत्मीयता से पूछा ''भुली (छोटी बहन)! क्या हुआ तेरे साथ?ÓÓ
लक्ष्मी की आंखें छलक आई थी ''सबने मिलकर धोखा किया मेरे साथ, मेरे मां-बाप मिले हुए थे इस धोखे में, मुझे शादी से पहले इसका छोटा भाई दिखाया और शादी के दिन लेकर ्आए बड़े भाई को। मैंने रात भर बहुत विरोध किया लेकिन मां-बाप ने मुझे मनोज महावर के कर्ज और घर की गरीब हालत का वास्ता देकर इनके साथ शादी करने को मजबूर कर दिया। पैंतीस हजार में दो बच्चों के बाप के हाथ बेच दिया मेरे मां-बाप ने। मैं तड़पती रही पर मेरी बात किसी ने नहीं सुनी, अब मैं भागती नहीं तो क्या करती।ÓÓ
इंस्पेक्टर विक्रम सिंह ने बरामदे में बैठे दूल्हे नरेश को इशारे से अपने पास बुलाया और उसके कंधे पर हाथ मारकर ठिठोली करी ''क्यूं भई जवान आज सुहागरात का मजा किरकिरा हो गया, माल तो अच्छा मारा है तूने, मस्त पहाडऩ लाया है ढूंढ के। पट्ठे चिंता ना कर मैं भिजवाऊंगा। चिन्ता न लाइयो, आज नी तो कल तेरी सुहागरात जरूर मनवावेंगे, बस जरा सेवा का ध्यान रखियो, सेवा से ही मेवा मिलता है।ÓÓ
नरेश, इंस्पेक्टर की बात सुनकर कृतज्ञता से मुस्कुराया ''साहब आपकी मेहरबानी रही तो सेवा भी हो जा गी।ÓÓ
बेंच पर बैठी हुई लक्ष्मी को पिता के आने का इंतजार बहुत लम्बा लग रहा था, पिता के आने पर भी उसे अपने बचने की कोई उम्मीद नहीं लग रही थी, फिर भी वह अपनी स्थिति पर मंथन किए जा रही थी, बैठे-बैठे वह उन स्मृतियों में खो गई जो उसने पहाड़ की दुश्वारियों से निजात पाकर मैदान में शादी करने वाली औरतों के मुंह से सुनी थी और उनसे भी ज्यादा उनके रिश्तेदारों या घरवालों ने बढ़ा-चढ़ाकर जो बातें बताई थी। शिमला बुआ जो ब्याही थी हरियाणा के यमुना नगर जिले में कहती नहीं थकती थी- कई-कई ट्रैक्टर हैं, सैकड़ों बीघे खेत, गाय, भैंस, ढोर, डन्गर। दूसरी बुआ सरजो जो पहाड़ में ही रह गई, दिन भर पहाड़ के ढंगारों पर दौड़ती रहती बकरियों के पीछे और शाम को लौटती कमर पर घास की गठरी लादे और एक दिन मर गई ढंगार से खाई में गिरकर। किस-किस की बात करूं, जमना दीदी जो ब्याही थी मुजफ्फरनगर जिले में या मौसी की लड़की पार्वती जो ब्याही थी सहारनपुर जिले में। सभी सुनाती थी अपनी-अपनी खुशहाली के किस्से, बड़े-बड़े शहर बाजारों की खरीदारियां। उन्हीं के तरह मैं भी थी और मैं ही क्या, कौन नहीं है ऐसी लड़की जो नहीं चाहती है निजात पाना पहाड़ में जीवन भर के संघर्षों से। पर इन संघर्षों से मुक्ति के पीछे की काली कथा के बारे में तो हमने कभी भी नहीं सोचा, सोचती भी कैसे? इन कथाओं के पीछे अंधेरा था जिनका सिर्फ उजला पक्ष ही दिखाई दिया।
सुग्गन सिंह ने मंगत राम की ओर इशारा करते हुए इंस्पेक्टर से कहा- ''साहब! लड़की के पिता भी आ गया, इनकी मर्जी से ही हुई है साहब शाद्दी।ÓÓ
इंस्पेक्टर विक्रम सिंह राठौर ने मंगत राम को नीचे से ऊपर तक घूरते हुए कहा- ''तो तुमने ही बेची है अपनी लड़की, तुम भी मानव तस्करी में इनका साथ जेल जाओगे।ÓÓ
''नहीं साहब मैं तो कोई तस्करी नहीं करता, हमारे यहां से तो ढेरों लड़कियां देश में ब्याही जाती है, साहब अभी तक तो ऐसा कोई कानून सुना नी था, कोई गलती हो गई हो तो माफ कर दो।ÓÓ
''कानून तुम हमें बताओगे, लड़की की मर्जी के खिलाफ जोर-जबरदस्ती से शादी करते हो, जेल में सड़ोगे तो कानून पता चलेगा।ÓÓ
अभी तक इंस्पेक्टर विक्रम सिंह को सारी कहानी पता चल चुकी थी। इंस्पेक्टर ने दरियाव सिंह को इशारा करके कहा- ''ले जाओ इस मंगतराम को और समझाओ इसे कौन-कौन सी धारा लगती है मानव तस्करी में।ÓÓ
दरियाव सिंह, मंगत राम को पीछे के कमरे में ले गया और उसे समझाया कि लड़के वाले तो छूट जाएंगे, तुमने पैसे लेकर लड़की को बेचा है तुम फंस जाओगे, तुम्हारे हित में यही है कि जहां तुमने पैंतीस लिए हैं लड़के वालों से, दस और लेकर साहब की सेवा में अर्पित कर दो, तुम्हारी जान बच जाएगी।
दरियाव सिंह ने सुग्गन सिंह को भी वहींबुलवा लिया और उन लोगों को समझाया कि तुम दोनों पार्टी चाहो तो मामला सुलझ सकता है, नहींतो दोनों पार्टी जेल जाओगे, दस मिनट देता हूं सोचकर बता देना।
दस मिनट के बाद दरियाव सिंह कमरे में आया तो सुग्गन ने सात हजार रुपए दरियाव सिंह के हाथ में रखते हुए प्रार्थना की ''साहब! सब लोगों से इकट्ठा करके इतना ही जुगाड़ हुआ अब छोड़ दीजिए।ÓÓ
दरियाव सिंह उन दोनों को लेकर इंस्पेक्टर विक्रम सिंह के पास आकर कहा- ''साहब! दोनों गांव के शरीफ आदमी हैं आपसी रजामंदी से शादी हुई है जाने दीजिए।ÓÓ
''ठीक है लड़की को बुलाओÓÓ इंस्पेक्टर विक्रम बात समझ गया था।
लक्ष्मी बाहर आने को तैयार नहीं थी,वह नहीं चाहती थी कि उसके पिता की मजबूरी सबके सामने उपहास बन जाए।
इंस्पेक्टर विक्रम सिंह ने मंगत राम की तरफ देखते हुए कहा- ''अपनी बेटी को समझाओ, पहले पैसे लेते हो और फिर सब घर वाले मिलकर ड्रामा करते हो, लड़की के नखरे देखो पहले खुशी-खुशी शादी रचाई और जाने के नाम पर ड्रामा कर रही है।ÓÓ
इंस्पेक्टर के शब्द लक्ष्मी के दिल में नश्तर से चुभ गए वह खुद ही इंस्पेक्टर के सामने आकर खड़ी हो गई, लक्ष्मी के  अपमान ने उनका स्वाभिमान जिन्दा कर दिया, उसके मन में शक्ति भर गई, उसके चेहरे का रूप बदला हुआ था।
पिता मंगत राम ने बेटी की ओर बढ़कर कंधे पर हाथ रखकर समझाने की मुद्रा में बात शुरू की ही थी पर लक्ष्मी छिटककर दूर हो गई। उसने आग्नेय नेत्रों से देखते हुए पिता के स्वाभिमान को झकझोरा ''पिताजी! अगर मुझे बेचना ही था तो मुझे मजबूरी बताकर किसी मंडी में मेरा सौदा कर देते पर तुम लोगों ने तो मिलकर मेरे साथ धोखा किया है, मैं रात भर मना करती रही, रोती रही पर मेरी बात किसी ने नहीं सुनी, क्या इसीलिए पाला था मुझे।ÓÓ
मंगत राम का चेहरा बुझ गया वह सिर झुकाकर एक तरफ हो गया, इंस्पेक्टर विक्रम सिंह माल ले चुका था इसलिए लड़की को भिजवाना उसकी जिम्मेदारी हो गई थी। वह लड़की की तरफ गरजकर बोला ''इन लोगों ने तुम्हें पैंतीस हजार में खरीदा है, तुम कोई पहाड़ की पहली लड़की तो हो नहीं जिसकी शादी मरजी के खिलाफ हो रही है, हर महीने कितनी ही लड़कियों को बेच रहे हैं मां-बाप, तुम्हें जाना तो पड़ेगा ही इनके साथ।ÓÓ
लक्ष्मी पहाड़ के जंगलों में घास-पत्ती काटते हुए कितनी ही बार खूंखार जंगली जानवरों का मुकाबला कर चुकी थी, उसके हाथ में लम्बी, पैनी, दंराती से उसे हौसला और ताकत आ जाती थी। इंस्पेक्टर भी उसे खूंखार जंगली जानवर लगने लगा। उसने अपने हाथ को मजबूती से इस तरह इंस्पेक्टर की तरफ उठाया जैसे उसके हाथ में पैनी दंराती आ गई हो और उसने चीखते हुए कहा- ''इंस्पेक्टर! होती होंगी और लड़कियां बिकाऊ पर यह पहाडऩ बिकाऊ नहीं है।ÓÓ
लक्ष्मी सब लोगों को चीरती हुई तेजी से बाहर निकल  आई और पहाड़ की तरफ चल दी। लक्ष्मी के तेवर से सबको परास्त मुद्रा में देखकर किशन व मोहर सिंह चौहान भी थाने से बाहर निकलकर लक्ष्मी के पीछे-पीछे चल दिए।