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Saturday 18 Nov 2017

शातिर

मृत्युंजय तिवारी
4/2 चंडीदास एवेन्यू, बी जोन, दुर्गापुर, जिला- बर्दवान, प.बं.- 713205
मो.  09434536518
रज्जो की दादी गांव में डायन के रूप में मशहूर थीं। सिर पर सन से सफेद बाल,पोपला मुंह, झुकी कमर, शरीर का रंग आबनूस सा काला। वह उस उम्र में पहुंच चुकी थी जहां रसना तृप्ति ही जीवन का प्रमुख ध्येय बन जाता है। वह विधवा थी और घर पर अकेली रहती थी। रज्जो का बाप कब का मर चुका था और रज्जो पड़ोस के गांव में ब्याही जा चुकी थी लेकिन अपनी दादी की देखभाल के लिए अक्सर रज्जो को आना पड़ता था।
 गांववाले कहते बुढिय़ा की नाक गज भर लम्बी है। मुहल्ले में जहां कहीं भी जिसके घर कुछ खास पकवान बनता बुढिय़ा को भनक लग जाती और वह झुकी कमर लिए लाठी टेकती हुई उसके घर जा धमकती।
 का हो रमैना की बहू! कटहल की सब्जी रांध रही हो का? बहुत दिन हो गए लेंढ़ा की सब्जी खाए। बढिय़ा से रांधो तो खसी का मांस फेल।
 रमैना की बहू मन ही मन कुढ़ते हुए सोचती इसको कैसे पता चला कि घर में कटहल ही बन रहा है। फिर वह डर जाती जो डायन होती हैं उन्हें सब मालूम पड़ जाता है। अब इसको बिना खिलाए कटहल किसी को हजम नहीं होगा। रात-बिरात सब ढकचने लगेंगे। ऐसा ही महतो की लड़की की शादी में हुआ था, बुढिय़ा पकवानों की गन्ध सूंघते वहाँ पहुँच गई थी। महतो ने कुत्ते की तरह दुरदुरा कर भगा दिया था। रात में बराती-घराती सबको हैजा हो गया था। दोष हलवाई के मत्थे पड़ा था कि उसने खाना बनाने में साफ सफाई पर ध्यान नहीं दिया था। लेकिन असली सूत्रधार कौन है गाँववालों को मालूम था। वहां से निकलते ही बुढिय़ा ने सबको पेस दिया था। तब से महतो भी बुढिय़ा से संभल कर बात करता है।
 रज्जो की दादी कब डायन के रूप में सारे गाँव में मशहूर हुई यह कोई ठीक नहीं बतला सकता लेकिन ऐसा रज्जो के बाप के मरने के बाद शुरू हुआ था। तब जब झिमली के बच्चे का अन्नप्राशन था। बुढिय़ा बिना बुलाए ही वहाँ पहुँच गई थी उसने उसके बच्चे को गोद में उठाया, बलैयाँ ली ढोलक की थाप पर पोपले मुँह से सोहर भी गाया। सब कुछ ठीक था लेकिन उसी रात झिमली के बच्चे को तेज बुखार हो गया। वह आँखें उलटने लगा। घबरा कर झिमली गाँव के सुखदेव ओझा को बुला लाई। सुक्खू ओझा बहुत देर तक मंत्र बिड़बिड़ाता रहा फिर आंख खोल कर बोला तनिक कसर है। किसी ने पेस दिया है।
 दुहाई है महाराज! कौन है वो? झिमली ने हाथ जोड़ कर कहा।
कोई बिना बुलाये तुम्हारे घर आया था?
 हाँ, झिमली को याद आया रज्जो की दादी।
 बस, बस मैं समझ गया। सुक्खू बोला तुम लोग नहीं जानती हो बड़ी हँकड़इत डाइन है वो अपने बेटे को मारकर यह विद्या सीखा है।
 बेटा यानि रज्जो का बाप। लेकिन महाराज झिमली ने आपत्ति जताई उसका बेटा तो खेत में काम करते वक्त लू लगने से मरा था।
अरे यह सब कहने के लिए है। डाइन बनने के लिए पहले अपने घर के आदमी को मारना पड़ता है। एक लोटा पानी ले आ। मैं मंत्र पढ़ देता हूं। उससे बच्चे का माथा धो देना कल तक सब ठीक हो जाएगा। थोड़ा बहुत बुखार रह भी जाए तो गांव के मनोज डाक्टर के पास चली जाना,अपने आदमी हैं। टोना खत्म हो गया है।
 झिमली ने ऐसा ही किया। बच्चे का बुखार कम हो गया।
धीरे-धीरे यह बात पूरे गांव में फैल गई। रज्जो की दादी को लोग अब दूसरी नजर से देखने लगे। उसके बाद गांव में बहुत सारी घटनाएं घटीं जिसमें रज्जो की दादी का नाम जुड़ता रहा। किसी के साथ झगड़ा हो गया, किसी की बहू ने जहर खा लिया, कोई मुकदमे में हार गया, किसी की गाय के थन से खून निकलने लगा, सब रज्जो की दादी की बुरी नजर का कमाल था। सुक्खू ओझा के पौ बारह थे। लोग डाक्टर वैद्य के चक्कर लगाने के बाद अन्त में सुक्खू ओझा के पास जाते। आश्चर्य की बात यह थी कि जिसे केन्द्र में रख कर ये चर्चायें हो रही थी वह यानि रज्जो की दादी इनसे बिल्कुल निस्पृह थी। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कोई उनके बारे में क्या कह रहा है। उनकी दिनचर्या पहले जैसी ही थी। रज्जो को जब अपनी दादी के बारे में टोनही या डाइन होने की खबर मिली तो वह दौड़ी चली आई। उसने जोरदार शब्दों में इन बातों का खण्डन किया और खबर फैलाने वालों को ललकारा लेकिन कोई उसकी चुनौती स्वीकार करने आगे नहीं आया।
 ऐसा नहीं था कि गाँव के सभी लोग इस बात को मानते थे। कुछ लोग आधुनिक चेता, विज्ञानमनस्क, उच्चशिक्षित भी थे। लेकिन वे अपने अर्जित ज्ञान को अपने तक ही सीमित रखने में विश्वास रखते थे। फिर इस काम में जोखिम भी था जिसे उठाने की न उनमें इच्छा थी न साहस। इसलिये पिछड़ों की बस्ती में लोग कैसे जी रहे हैं, कितने अंधकार में हैं उन्हें कोई मतलब नहीं था।
इसी बीच एक घटना घट गई। वह एक अगहनी शाम थी। हवा में हल्की कनकनी थी। बुढिय़ा अपनी झोपड़ी में अकेली बैठी हुई थी। उसे ठंड सी महसूस हुई तो उसने कँथरी बदन पर ओढ़ ली। आज उसका रोने का मन हो रहा था पता नहीं क्यों। ऐसे ही अक्सर अकेली सुनसान रातों में उसका रोने का मन होता है और वह भोंकार कर रोती है। तब उसके कमजोर गले से किसी बच्चे के रिरियाने जैसी आवाज निकलती है। पड़ोस के लोग सुनकर सहम जाते हैं आधी रात को यह डायन कोई साधना कर रही है।
 आज सारा दिन उसने कुछ नहीं खाया था। कौन देता? पड़ोस की राधे बहू जो रज्जो के नहीं रहने पर उसकी देखभाल करती है, अपने मायके गई है। रज्जो भी दो दिन हो गए उसका हालचाल पूछने नहीं आई।
 अचानक बुढिय़ा के नथुनों से सुगन्धित पकवानों की गन्ध टकराने लगी। बुढिय़ा का मन चंचल हो उठा। इस असमय में यह गन्ध कैसे? कहीं उसके मन का वहम तो नहीं है। तभी उसने देखा उसकी झोपड़ी के दरवाजे पर दो आदमी खड़े हैं। उनके हाथों में एक बड़ी परात थी जो कपड़े से ढकी हुई थी। खुशबू वहीं से आ रही थी।
 कौन है? बुढिय़ा के गले से मरियल आवाज निकली।
 रजमतिया की दादी हौ का? एक पुरूष की भारी आवाज उभरी। हम हैं कमल सिंह।
 अच्छा, मुखिया जी? बुढिय़ा अचकचा गई ये इस समय? उसके दुआर पर?
 तब तक मुखियाजी और उनका साथी घर के अन्दर आ चुके थे। उन लोगों ने परात को बुढिय़ा के बगल में रख दिया और कपड़ा हटा दिया। देखकर बुढिय़ा की आंखें फैल गईं। परात पूड़ी, कचौड़ी, रायता, बुंदिया, मिठाई आदि से भरी हुई थी।
 तुम्हारे लिये लाए हैं। मुखियाजी ने खंखार कर ठंडे गले से कहा।
 बुढिय़ा ने यह भी नहीं पूछा कि क्यों लाए हैं बस मुखियाजी की ओर कृतज्ञ नजरों से देखते हुए चपर-चपर खाने लगी।
 वे लोग कुछ देर तक बुढिय़ा का खाना देखते रहे, फिर मुखियाजी ने खंखार कर कहा रजमतिया की दादी, एक काम था तुमसे।
 बुढिय़ा के मुंह में कचौड़ी का टुकड़ा फंसा हुआ था उसे चुभलाते हुए उसने प्रश्नसूचक नजरों से मुखियाजी की तरफ देखा।
मेरा दो ठो दुश्मन है. मेरा पटीदार है इसलिये हम सीधे कुछ कर नहीं सकते। बहुत मनबढ़ू हो गया है। उस पर तुमको बान चलाके ठंडा करना होगा।
 दुहाई महाराज! मैं यह सब कुछ नहीं जानती हमको झूठै लोग बदनाम कर दिए हैं।
 चुप रहो मुखियाजी ने डपटते हुए कहा सारा गांव जानता है कि तुम क्या हो। डायन कभी मुंह से नहीं स्वीकारती कि वह डायन है। कल अमावस्या है। सुनते हैं इस दिन तुम लोगों का जोर बढ़ जाता है। कल ही तुम मेरा काम कर दो। इसके लिए जो भी लगे बोल देना। कल यह तुम्हारे पास आएगा। मुखियाजी ने अपने साथी की तरफ इशाऱा किया और उन लोगों का नाम बोल देगा। चाहो तो सुअर कटवा सकती हो,या फिर मुर्गा या अंडा की बलि। लेकिन काम होना चाहिए। मुखियाजी ने चलने का उपक्रम किया फिर रूक गए, बोले लेकिन याद रखना यह बात तुम अपने पेट में रखना। यदि भूल से कहीं कुछ बोल दिया तो तुम्हारा क्या हाल होगा सोच लेना।
 बुढिय़ा सकते में थी। उसके मुंह से कोई बोल नहीं फूटा।
 बाहर निकल कर मुखियाजी ने खुली हवा में गहरी सांस ली। उनका साथी बोला घरवा कितना महक रहा था। हमको तो उबकाई आ रही थी।
 बाहर अंधेरा फैल चुका था। मुखियाजी ने पूछा मोटर साइकिलवा कहां रखे हो?
ऊ का महुआ के पेड़ के नीचे। साथी ने एक तरफ इशारा किया।
 वहां पहुंच कर उन लोगों ने देखा मोटर साइकिल के पास एक छाया मूर्ति खड़ी है।
 कौन है? मुखियाजी ने तेज आवाज में पूछा।
 पायँ लागों मुखियाजी। हम हैं सुक्खू ओझा। दिशा- मैदान के लिए निकले थे तो देखा आप लोग रज्जो की दादी के घर में ढुक रहै हैं। मैं एक बात बताने के लिये रूक गया।
 कौन सी बात? मुखिया ने गरज कर कहा।
 बाबू साहेब सुक्खू ने फुसफुसाते हुए कहा डायन की परछाईं भी शरीर पर लगने से अनिष्ट होता है और आप लोग तो उसके घर पर चले गए।
तुम अपने काम से मतलब रखो। तुमको ओझइति कुछ नहीं आता है। तुम और वह झोलाछाप मनोज डाक्टर मिलकर गांव में क्या गुल खिला रहे हो हमको मालुम नहीं है का?
 सुक्खू ओझा सकपका गया। मिनमिनाते हुए बोला फिर भी मेरा बात में सच्चाई है। डायन का आंगछ बहुत खराब होता है।
मैं जानता हंू, लेकिन डायन सबको नुकसान नहीं पहुंचाती। कहकर मुखियाजी ने अपनी धोती का फेंटा कसा और बुलेट गाड़ी पर सवार हो गए।
 इसे संयोग कहा जाए या गफलत धूल भरे कच्चे रास्ते पर गाड़ी चलाते हुए अचानक एक सांड़ सामने आ गया। मुखियाजी ने साठ-सत्तर की स्पीड पर चल रही गाड़ी को जोर से ब्रेक लगाया कि दोनों छिटक कर जमीन पर जा गिरे। मुखियाजी को काफी चोट आई। उनकी तुलना में उनका साथी कम घायल हुआ।
 करीब महीना भर मुखियाजी अस्पताल में भर्ती रहे। इस दौरान उन्हें बार-बार सुक्खू ओझा की कही बातें याद आती रहीं डायन की परछाई भी शरीर पर लगने से अनिष्ट होता है। उन्होंने सोचा ठीक तो! ठीक ही कहा था उस ओझा ने। वह सांड़ भी लगता है उसी डायन का भेजा हुआ था।
 उन्होंने निर्णय लिया ठीक होते ही वे उस डायन को गांव से खदेड़ कर रहेंगे।
 ऐसा ही हुआ। मुखियाजी ने घर पहुंचते ही एक सप्ताह के अन्दर पंचायत बिठा दिया।
 बुढिय़ा को घर से उठाकर लाया गया। रज्जो को भी बुला लिया गया। मुखियाजी ने कहा यदि यह आदिवासियों का गांव होता तो अब तक लोग बुढिय़ा को जिन्दा जला देते या फिर सर मुंडवा कर नंगा करके पूरे गांव में घुमाते। लेकिन यह शरीफ लोगों का गांव है। हम लोग ऐसा नहीं करते हैं। कह कर मुखियाजी ने बुढिय़ा की ओर देखा। उन्हें डर था कि वे यदि सजा की बात करते हैं तो बुढिय़ा उनके मिलने का भेद न खोल दे। लेकिन बुढिय़ा चुपचाप थी और थर-थर कांप रही थी।
 आप लोग क्या कहते हैं भाइयों? मुखिया ने उपस्थित लोगों से पूछा। गांव के वे लोग जो अपनी परेशानियों की वजह बुढिय़ा को मानते थे काफी नाराज थे। उन्होंने समवेत स्वर में कहा फिर भी बुढिय़ा को कुछ सजा तो मिलनी ही चाहिए।
 इसकी सजा यह है कि यह तीन दिन के अन्दर हमारा गांव छोड़ दे। उसके बाद भी यदि यह गाँव में दिखाई दे तो इसे पत्थरों से मारकर भगाया जाए। मुखिया ने फरमान सुना दिया। पंचों ने समवेत स्वर में हामी भरी।
 रज्जो ने बिलखते हुए कहा आप लोग पढ़ल-लिखल हैं। आप लोग कैसे कहते हैं कि मेरी दादी डाइन है?
किसी ग्रामीण ने जवाब दिया गाँव में इतना जो अनिष्ट हुआ है सब जगह तुम्हारी दादी मौजूद पाई गई हैं। अभी दो महीना पहले लालू की बहू के पेट में जो बच्चा खराब हुआ है उसमें भी तुम्हारी दादी का हाथ था. उसको का जरूरत थी उसका पेट छूकर असीरबाद देने की?
रज्जो को कोई जवाब नहीं सूझा। कुछ लोग चिल्लाने लगे बुढिय़ा को सजा दो। कुछ मनचलों ने पत्थर फेंकना शुरू किया। बुढिय़ा हाय बप्पा! कहकर जमीन पर गिर पड़ी। एक पत्थर उसके माथे से लगा, भल-भल खून बहने लगा।
 परिस्थिति बिगड़ती देखकर मुखियाजी खड़े हो गए।
 शान्त हो जाइए भाइयों! यह शरीफ लोगों का गांव है यहां मारपीट करने से गांव की बदनामी होगी। हमने फैसला कर दिया है।
 बुढिय़ा को टांगटूग कर उसके घर पहुंचा दिया गया।
 बुढिय़ा अर्धमूच्र्छित थी। रज्जो ने उसके घावों को धोकर जड़ी- बूटियों का लेप चढ़ाया। बीच में बुढिय़ा को होश आया तो रज्जो रोते हुए बोली क्या सचमुच दादी, तुम कुछ सीखी हो?
 बुढिय़ा बुक्का फाड़ कर रो पड़ी नहीं बेटी, लोग झूठै बदनाम कर रहे हैं। हमको कौन सिखाएगा? जवानी में दिन भर गदहा खटान खटती थी, रात को तुम्हारे दद्दा के सोंटे की मार खाती थी। कभी आराम नहीं मिला। तुम्हारी माँ भी तुमको जनम देने के बाद गुजर गई। हम डाइन होती तो क्या तुमको पाल पोस कर बड़ा करती?
लेकिन इतना लोग जो कहते हैं...रज्जो ने कुछ कहना चाहा।
 बुढिय़ा की आँखें सुलग उठी अरे हम सचमुच डाइन होती तो उन दाढीजारों के लिये काली माई बन जाती। सबको एक-एक करके देवी स्थान में बलि चढ़ाती। बुढिय़ा फिर रोने लगी।
 रज्जो के मन में भी बहुत आक्रोश था तुम यह जगह मत छोडऩा दादी। चाहे मुखिया कहे या सुखिया। हमने छोटू के बापू से बात की है। वे कल सुबह आ जाएंगे। हम तीनों मिलकर यहाँ रहेंगे। देखें कौन निकालता है।
रात के तीसरे पहर रज्जो की आँख लग गई थी। बुढिय़ा रात भर कराहती रही थी। रज्जो की जब नींद खुली तो पौ फट चुकी थी। उठते ही उसने बुढिय़ा की ओर देखा। बुढिय़ा निश्चल, निस्पंद पड़ी थी।
 दादी! दादी! रज्जो ने पुकारा। कोई आवाज नहीं। फिर छाती पर हाथ लगाकर देखा कोई स्पंदन नहीं। रज्जो सब समझ गई। उसकी दादी सारी यातना, लांछन से परे दूसरी दुनिया में जा चुकी थी।
 रज्जो बुक्का फाड़ कर विलाप करने लगी।
बुढिय़ा की मौत से गाँववालों को कोई अफसोस नहीं हुआ बल्कि कई लोगों ने चैन की साँस ली कि चलो बला टली। रज्जो का पति दूसरे दिन ही घर आ गया था। उसने ही दाह-कर्म आदि का काम सम्पन्न कराया।
 इस घटना के महीना भर बाद एक दिन सुबह ही रज्जो के दरवाजे पर सुक्खू ओझा पहुँचा।
 मुझे तुम्हारी दादी के गुजर जाने से बहुत सदमा पहुँचा है। उसने रोनी सूरत बना कर कहा भगवान उसकी आत्मा को शान्ति दे। एक ग्लास पानी पिलाओगी बेटी।
रज्जो ने पानी भरा ग्लास उसके हाथों में थमाया। पानी पीकर सुक्खू कुछ देर बैठा रहा फिर रज्जो को घूरते हुए बोला।
 तुम भी कुछ सीखी हो क्या?
 क्या मतलब? रज्जो समझ नहीं पाई।
मतलब तुम्हारी दादी तुमको भी कुछ सीखा कर गई हैं का? तुम्हारे हाथ का पानी पीते ही मेरे पेट में दर्द होने लगा है। अब घर जाकर भभूत मलना होगा।
रज्जो भौंचक रह गई। फिर उसने अपने आप को संभाल लिया, बोली हां, लेकिन उस रूप में नहीं जिस रूप में आप जानते हैं। मैं अपनी दादी से भी बढ़कर हूं। ठहरिये, आपके लिये दवा लेकर आती हूं।
उसने पुकारा सुनते हो छोटू के बापू ये सुक्खू ओझा क्या कह रहे हैं।
सुक्खू घबरा कर उठ खड़ा हुआ उन्हें क्यों बुला रही हो?
वे आपसे भी बढ़कर ओझा हैं। आपका दर्द अभी छूमंतर हो जाएगा। वह घर के अन्दर चली गई।
 रज्जो का पति घर के पिछवाड़े जलावन के लिए लकड़ी फाड़ रहा था। आवाज सुन कर वह आते हुए बोला क्या कह रहे हैं?
 तब तक रज्जो भी हाथों में झाड़ू लिये बाहर निकली। उसने उंगली से रास्ते की ओर इशारा किया जहाँ लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ सुक्खू ओझा चला जा रहा था।