Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

थोपना

जयनंदन
एस एफ 3/116, बाराद्वारी सुपरवाइजर फ्लैट्स
साकची, जमशेदपुर - 831001
मो. 09431328758
यह तीसरा मौका था जब शोणित अपने कमरे में अंदर से सिटकनी चढ़ाकर पिछले 18 घंटे से बंद हो गया। पहले भी वह ऐसा दो बार कर चुका था। घरवाले उसे पुचकारते-पुकारते थक गये थे। सबकी जान हलक में अटक गयी थी, कहीं यह लड़का कुछ कर-करा न ले। अंदर से उसका बस एक ही जवाब आ रहा था, ''मैं अकेले में रहना चाहता हूं, मुझे परेशान न किया जाये।ÓÓ
किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह लड़का भूख-प्यास त्यागकर और स्कूल आना-जाना छोड़कर इस तरह कमरे में क्यों बंद हो जाता है। वे उसे बाहर निकलने के लिए ज्यादा दबाव भी नहीं बना पा रहे थे, क्या पता कहीं गुस्से में आकर कोई घातक कदम न उठा ले।
उसके घरवाले मंथन कर करके थक जाते, पर कोई कारण नहीं ढूंढ पाते। परिवार से भरा हुआ घर, दादा, पिता, मां, दो छोटी बहनें, शहर का सबसे नामी-गिरामी स्कूल, तमाम तरह की सुख-सुविधाएं, सबके थोक प्यार-दुलार का एकमात्र वारिस, पढ़ाई-लिखाई में भी कक्षा का अग्रिम पांक्तेय। फिर हो क्या जाता है इस लड़के को? 15 साल का होने को चला। 10वीं में पहुंच गया। कमअक्ल या नादान रहने की उम्र भी नहीं रही। घर के किसी भी सदस्य की तरफ से कोई अनदेखी नहीं। बबुआ को कुछ चाहिए तो तुरंत हाजिर, बस मुंह से निकलने भर की देर।
कहा - क्रिकेट खेलेंगे। पूरा सैट मंगवाया गया - बल्ला, हेलमेट, गिल्ली, बेल, बॉल, दस्ताना, स्टम्प्स, लेगगार्ड, एब्डोमेनगार्ड, थाईगार्ड, चेस्टगार्ड, बैटिंग शू आदि। कोचिंग के लिए क्रिकेट एकेडमी में दाखिला भी करा दिया गया। सप्ताह में तीन दिन प्रैक्टिस कराने दादा जी कार में बिठाकर साथ जाते। कहा - गिटार बजायेंगे। गिटार खरीदा गया और सिखाने के लिए एक मास्टर ढूंढे गये। सप्ताह में तीन दिन घर ही आकर वे सिखा जाने लगे। कहा - कार चलाना सीखेंगे। सिखा दिया गया। इसका भी खयाल नहीं किया गया कि लड़का अंडर एज है, शायद यह मानकर कि बड़े घर के बच्चों को इन नियमों का पालन जरूरी नहीं। कहा - मोबाइल सेट चाहिए, वह भी ब्लैकबेरी का। नवीं कक्षा में उसने कुछ अच्छा रिजल्ट कर लिया था तो उसे गिफ्ट चाहिए था। खरीद दिया गया ब्लैकबेरी का सेट, जिसकी कीमत थी 35 हजार रुपये। इतना कुछ होने के बाद भी इस लड़के पर आखिर कौन सा प्रेत सवार हो जाता है?
अब उसे कैसे निकाला जाये कमरे से। घरवालों ने सोचते-विचारते एक उपाय निकाला। बाजू का घर भाटिया परिवार का था। उस घर का एक लड़का शोणित का हमउम्र अथक भाटिया था। दोनों में गहरी दोस्ती थी। भाटिया परिवार अब यहां से शिफ्ट होकर शहर के दूसरे एरिया में चला गया था, तब भी उनमें पारिवारिक मित्रता कायम थी। इसी तरह दोनों बच्चों का स्कूल एक नहीं था, तब भी उनके बीच निकटता बनी हुई थी और वे एक दूसरे के अंतरंग थे। अत: तय हुआ कि अथक ही आकर कुछ कमाल दिखा सकता है। वह आवाज लगायेगा तो शोणित अनसुना नहीं कर पायेगा।
ठीक ऐसा ही हुआ, अथक की आवाज सुनते ही शोणित की बैटरी चार्ज हो गयी। उसने कहा, ''चल दरवाजा खोल, मैं आ गया हूं, देखूं तो जरा तू कमरे में बंद होकर क्या महान काम कर रहा है?ÓÓ
पहले तो उसने टालने की कोशिश की, ''अथक, तू अभी जा यार, मैं बाद में मिलता हूं तुमसे।ÓÓ
''बाद में नहीं, मुझे अभी मिलना है तुमसे। जल्दी कर नहीं तो तुम्हारे क्लास के सभी लड़के-लड़कियां यहां बुला लिये जायेंगे।ÓÓ
दरवाजा खुल गया। सबकी जान में जान आ गयी। शोणित का चेहरा देखने में ऐसा लग रहा था जैसे बहुत गहरे सदमे में हो। अथक ने पूछा, ÓÓक्यों ऐसी हालत बना रखी है, क्या हो जाता है तुम्हें? देखो तुम्हारे कारण घर के सारे लोग परेशान हैं।ÓÓ
''मैं क्या करूं अथक! मुझसे सहा नहीं जाता। कहीं से भी चोट लग जाती है या हर्ट हो जाता हूं तो सब कुछ व्यर्थ और बकवास सा लगने लगता है। मन नहीं होता कुछ भी करने का।ÓÓ
''जान सकता हूं कि इस बार तुम्हें चोट किस कारण से पहुंची है?ÓÓ
''यार, मैंने अपने दादा जी से वादा किया था कि मैं क्लास में फस्र्ट होऊंगा, लेकिन मैं तीसरे स्थान पर खिसक गया और वो लड़की फस्र्ट हो गयी, जो वन टु टेन में भी नहीं रहती थी। चेहरे-मोहरे से भी वह इतनी औसत है कि मैं उस पर नजर भी नहीं डालता था। लेकिन अब तो क्लास की ही नहीं स्कूल की वह नायिका बन गयी है। वह मुझे अब हेय की दृष्टि से देखती है।ÓÓ
''अरे यार तू ऐसा क्यों समझता है कि क्लास में फस्र्ट आने का अधिकार सिर्फ  तुम्हारा होना चाहिए? और फिर फस्र्ट आने से होता क्या है? ऐसी की तैसी फस्र्ट आने की। मैं तो तीसवें-चालीसवें स्थान पर रहता हूं, तो क्या हुआ? मुझे तो चोट नहीं लगती। बात यह भी है कि क्लास में फस्र्ट तो कोई एक ही होगा। इसका यह मतलब थोड़े ही है कि बाकी सब बेकार और फिसड्डी हैं।ÓÓ
''यार यह सब मैं जानता हूं लेकिन पता नहीं क्यों मैं दुखी होने से खुद को रोक नहीं पाता।ÓÓ
शोणित से ऐसा ही मिलता-जुलता जवाब पिछली बार के एकांतवास में भी सुना जा चुका है। पहली बार तो वह नदी में कूद पड़ा था। एक मछुआरे ने उसे बचा लिया। कारण था उसका मोबाइल सेट का खो जाना। इस मोबाइल ने उसके सत्तर प्रतिशत समय पर कब्जा कर लिया था और उसके वजूद का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया था। ईमेल, फेसबुक, व्हाट्स अप, फोटोग्राफी, चैटिंग, कॉलिंग, एसएमएस, एमएमएस, इंटरनेट, संगीत, फिल्म, टेलीविजन, रेडियो आदि सारे संचार माध्यम को अपनी जेब में लेकर घूमने की उसकी आदत हो गयी।
वह मोबाइल जब कहीं छूट गया या फिर किसी ने मार लिया तो उसे ऐसा लगने लगा जैसे उसने अपना सर्वस्व खो दिया। लगा कि वह इस दुनिया से कट गया और उसके जीवन में कुछ बचा ही नहीं। कितना कुछ डेटा संग्रहीत कर रखा था उसने......उसका प्रेम....उसकी दोस्ती....उसकी दुश्मनी, कई महत्वपूूर्ण सूचनाएं, ज्ञानवद्र्धक सामग्रियां सब कुछ रिकार्डेड था इसमें। अब वह किस मुंह से नया मांगे। पैंतीस हजार रुपये कोई छोटी रकम नहीं होती और अगर मांगने से मिल भी जाये तो इतना सारा जमा किया हुआ डेटा का क्या होगा? कितनी मेहनत और कितने समय से वह यह सब जमा करता रहा था। उसे लगा जैसे इन सबके बिना जीना जीना नहीं हो सकता और वह नदी में कूद गया।
अथक ने उस बार भी उसे समझाया, ''एक मोबाइल सेट के खो जाने से तुम्हारा जीना दुश्वार हो गया, मेरे पास तो कोई मोबाइल नहीं है तो क्या मेरा काम नहीं चल रहा? और मेरे जैसे लाखों बच्चे हैं। पन्द्रह-बीस वर्ष पहले जब मोबाइल टेक्नोलॉजी का इस तरह प्रसार नहीं हुआ था तो क्या लोग जी नहीं रहे थे? किसी चीज का गुम हो जाना भी भला कहीं कारण होता है सुसाइड करने का? कल को तुम्हारा जूता खो जाये, या तुम्हारा सबसे अच्छा ट्राउजर फट जाये तो यह भी तुम्हारे सुसाइड का कारण बन सकता है।ÓÓ

''तुम जो कहते हो, उसमें कुछ भी गलत नहीं है अथक। मैं खुद भी सोचता हूं कि मैं ऐसा क्यों हूं? लेकिन मैं यह सोचते हुए भी वैसा का वैसा ही रह जाता हूं। मुझे तुम्हारे बारे में भी खयाल आता है कि तुम्हें तो किसी चीज की परवाह नहीं होती और तुम हमेशा बहुत कम में भी खुश रह लेते हो। मुझे भी ऐसा ही रहना चाहिए, लेकिन हो नहीं पाता।ÓÓ
दूसरी बार फिर वह कमरे में बंद हो गया था। बाहर से दरवाजा पीटने पर भी भीतर की कोई आहट नहीं। अंतत: दरवाजा तोडऩा पड़ गया। वह अचेत पड़ा था। दादा की नींद की गोलियां उसने पांच-छह खा ली थी। तुरंत डॉक्टर के पास ले जाया गया, स्लाइन चढ़ाया गया और ऑक्सीजन आदि देकर ठीक किया गया। इस बार का कारण स्कूल के एक मास्टर की डांट-फटकार बन गया। स्कूल के सभी बच्चों को यह सख्त निर्देश था कि कोई भी बाइक चलाकर स्कूल नहीं आयेगा, चूंकि नाबालिगों द्वारा बाइक चलाना सड़क सुरक्षा कानून का उल्लंघन है। स्कूल बस की सुविधा जब उपलब्ध है तो सभी उसी का उपयोग करें। शोणित फिर भी कई बार मोटर सायकिल से अथवा कार से स्कूल आ जाता और कैम्पस के बाहर ही गाड़ी पार्क कर दिया करता। एक दिन किसी बच्चे को उसकी बाइक से हल्की सी ठोकर लग गयी। उसने मास्टर जी से शिकायत कर दी। मास्टर जी ने मार्निंग एसेम्बली में ही उसे सबके सामने खूब खरी खोटी सुनायी। चेतावनी देते हुए कहा, ''स्कूल में तुम्हारे जैसे और भी रईस बच्चे हैं, लेकिन तुम्हारी तरह ढीठ और अशिष्ट नहीं हैं। तुम्हें अपनी सुपरियरिटी शो करने का शौक हो गया है। तुम पढऩे में अच्छे हो, इसका यह मतलब नहीं कि तुम्हें मनमानी करने और अनुशासनहीन होने की छूट मिल गयी है। आइंदा अगर यह हरकत तुमने दोहरायी तो तुम्हें कठोर कार्रवाई का सामना करना होगा। तैयार रहना।ÓÓ
असेम्बली में खड़े सभी बच्चे दम साधकर शोणित की फजीहत देख रहे थे। वह गर्दन झुकाकर शर्मसार होता रहा था। हालांकि यह एक मास्टर जी की फटकार थी, लेकिन इसे उसने एक छीछालेदर की तरह महसूस किया और घर जाकर उसने ढेर सारी दवा गटक लेने का कदम उठा लिया, जैसे इस अपमान के बाद उसके जीने का कोई मतलब ही नहीं रह गया।
उसके पिता अनुराग गणपत और दादा गजानन गणपत हैरान रह गये। दादा भी एक ऊंचे प्रशासनिक पद से अवकाशप्राप्त थे और उसके पिता भी एक प्रशासनिक अधिकारी ही थे। दादा को याद है, जब वे अपने गाँव के स्कूल में पढ़ते थे तो मास्टर जी शैतानी करने वाले बच्चों के हाथ-पैर बांधकर (गड़मोगली देना कहा जाता था) जहर कनैली की छड़ी से पिटाई करते थे। इसका कोई बुरा नहीं मानता था। कभी-कभी तो कई गार्जियन बदमाशी करने वाले अपने बच्चे को मास्टर जी से पिटवाने के लिए खुद स्कूल लेकर आ जाते थे।
आजकल क्या हो गया कि मास्टर की हल्की सी डांट-डपट भी बच्चों से सही नहीं जाती। कई बार तो सुना जाता है कि बच्चों के कहने पर गार्जियन स्कूल में मास्टर को चेताने और धमकाने आ जाते हैं कि आपके डांटने या चपत लगाने पर मेरा बच्चा बीमार पड़ गया या स्कूल आने से कन्नी काटने लगा। स्वाभिमान अच्छी बात है, लेकिन इतने छोटे बच्चों में स्वाभिमान और भावना की ग्रंथि का इतना नाजुक होना और उसका झट आहत हो जाना, क्या अच्छा संकेत कहा जा सकता है एक आकार ले रही आकृति के लिए जिसे कई बार कटने, पिटने और तपने की क्रिया से गुजरना जरूरी होता है? गजानन बाबू सोचने पर विवश हो गये कि शोणित के बनने में कोई चूक तो नहीं हो रही। आखिर क्यों यह लड़का बार-बार आहत हो जाने की सीमायें लांघ देने पर उतारू हो जा रहा है।
अपने बेटे अनुराग से वे इस बारे में विमर्श करने लगे।
''अनुराग, कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके एक-एक नखरे पर हमारा बिछ-बिछ जाना इसकी जेहनियत और एकलाख (मिजाज) पर गलत असर डाल रहा है?ÓÓ
''आप कैसी बातें करते हैं पापा जी? कौन आदमी अपने बच्चे की अधिकतम सहूलियत और जरूरत का खयाल नहीं रखता। खासकर जो समर्थ और सुखी-संपन्न है, वह अपने बच्चे को क्या अभाव और किल्लत में रखना पसंद करेगा? आप याद कीजिए, मेरी परवरिश में तो आपने कभी कोई कमी नहीं रहने दी। मैं आज जो कुछ हूं, आपकी ही प्रेरणा, प्रोत्साहन से आपके दिखाये रास्ते पर चलकर ही पहुंचा हूं।ÓÓ
''देखो, कुछ तो फर्क है, वो शायद इतना सूक्ष्म है कि तुम उसे देख नहीं पा रहे। मैंने कभी तुम पर स्कूल थोपने की कोशिश नहीं की। कक्षा में तुम्हें अव्वल आना है, इसके लिए मैंने तुम पर कभी दबाव नहीं बनाया। तुम्हें नाश्ता और खाने में क्या लेना है, कब लेना है, तुम्हारी मां ने इसकी परवाह कभी नहीं की। बाइक और कार चलाना तुमने तब सीखा जब खुद नौकरी में आ गये। मोबाइल और इंटरनेट की तो तुमने पढऩे के दौरान झलक भी नहीं देखी। लड़कियों से दोस्ती को तो छोड़ो, उनकी निकटता से भी तुम दूर भागते रहे। जेब खर्च के नाम पर मां ने तुम्हें कभी भले रुपये-दो रुपये दे दिये होंगे, मैंने तो कभी एक छदाम नहीं दिया। ट्यूशन-कोचिंग के नाम पर एक मास्टर जी को मैंने जरूर रख दिया था जो घर में आकर तुम्हें सारे विषय पढ़ा जाया करता था। ऐसा नहीं कि अलग अलग विषय के लिए अलग-अलग कोचिंग सेंटर में जाकर नाक रगडऩा पड़े।ÓÓ
अनुराग ने सरसरी तौर पर दृष्टिपात कर लिया शोणित के अब तक के लालन-पालन के प्रति पूरे परिवार की संलग्नता पर। उम्र के तीसरे साल में ही उसे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में भर्ती के लिए तैयार किया जाने लगा। प्ले स्कूल में भेजना, फिर घर में ही कोचिंग दिलाना, अंग्रेजी माध्यम के सभी चर्चित स्कूलों में ऐडमिशन के लिए टेस्ट दिलवाने की गंभीर कवायद करना। असफल होने पर अंतत: पैरवी लगाकर और एक बड़ी राशि डोनेशन में देकर शहर के सबसे नामी स्कूल में दाखिला करवाना।
दाखिला मिल गया तो एक ग्रैंड पार्टी दी गयी और तमाम दोस्तों-रिश्तेदारों को बुलाया गया। कुुछ इस तरह जैसे अब इस लड़के को स्वर्णिम भविष्य का गारंटी कार्ड हाथ लग गया हो। घर भर की नजरें अब उस पर बिछी रहने लगीं.....उसका सोना, जागना, स्कूल के लिए तैयार होना, नाश्ता-खाना, होमवर्क कराना, खेलना। कक्षा में वह अव्वल स्थान पर पहुंचे, इसके लिए कभी पिता, कभी दादा उसे घड़ी-घड़ी ताकीद करने लगे। उसके पढऩे-लिखने और याद करने के तरीके को बार बार संशोधित करने लगे। हिदायतों के बोझ से मानो वह दब दब सा जाता। वह इसे इस रूप में लेने लगा कि पिता की इच्छा पूरी न करके वह एक बहुत बड़ा गुनाह कर रहा है। गुनाह से उबरने के लिए उसने रात-दिन खुद को पढ़ाई में झोंकना शुरू कर दिया और अन्तत: अव्वल स्थान पर पहुंचने में उसे कामयाबी मिल गयी। यह कामयाबी उसे पूरी तरह यार-दोस्त, खेल-कूद, हंसी-मजाक, गपशप, टीवी-रेडियो आदि से पूरी तरह कटकर किताबी कीड़ा बन जाने की कीमत पर प्राप्त हुई। इन मन:स्थितियों में वह एकांतप्रिय और अंतरमुखी होता चला गया।
इसी तरह पंचसितारा परवरिश की छतरी तले शोणित की इंटर तक की राजसी पढ़ाई पूरी हो गयी। अब उसके सामने आई.आई.टी. की प्रवेश परीक्षा में सफल होने का लक्ष्य रख दिया गया। पिता ने अपनी सीख की गठरी खोलते हुए कहा, ''लाखों बच्चे इस प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं, जिनमें सिर्फ  पाँच-छह हजार बच्चे सफल हो पाते हैं। ये वे बच्चे होते हैं जो इसकी तैयारी में खुद को झोंक देते हैं। ईमानदारी से जो जितना ज्यादा मेहनत करता है उसे उतना अच्छा रैंक मिलता है। तुम्हें जहां जिस कोचिंग इंस्टीट्यूट से जितना कोचिंग लेना है, हमारी ओर से खुली छूट है, तुम लग जाओ।ÓÓ
शोणित का मन इंजीनियरिंग की तरफ  बिल्कुल नहीं था। उसे फिजिक्स, केमिस्ट्री और गणित के सवालों से बड़ी कोफ्त होती थी। उसे लगता था जैसे धागे के एक पुलिंदे को उलझाकर कोई उसे सुलझाने के लिए कह दे या फिर तीन-चार महीन अनाजों को मिलाकर कोई उसे अलग-अलग करने का काम सौंप दे। उसने दबे स्वर में अपनी इच्छा जतायी, ''पापा, मैं इंजीनियर नहीं बनना चाहता, मेरा रुझान क्रिकेटर बनने की तरफ  है। क्रिकेट में ही अपना कैरियर मैं बनाना चाहता हूं।ÓÓ
अनुराग गणपत के चेहरे पर एक हेय का भाव उतर आया, ''मतलब तू वो बनना चाहता है जिसमें पढऩा-लिखना न पड़े ?ÓÓ
शोणित ने कोई जवाब नहीं दिया। मन ही मन सोचकर देखा तो लगा कि उसके अवचेतन में शायद ऐसा ही कुछ है। निश्चय ही पढऩा उसे अब एक थका देने वाला काम लगने लगा है।
''क्या समझते हो, क्रिकेटर बनना आसान है? सवा सौ करोड़ की आबादी में जो एक राष्ट्रीय टीम बनती है, जिसे खूब नाम, इनाम, इकराम मिलता है, उसमें सिर्फ पन्द्रह-बीस ही चयनित होते हैं। बाकी सब राज्य और क्षेत्र स्तर तक ही सिमट कर रह जाते हैं। आजकल आईपीएल नाम से एक कमर्शियल टूर्नामेंट शुरू हुआ है, जिसमें पशु-पक्षी और जमीन-जायदाद की तरह खिलाडिय़ों की खरीद-फरोख्त  होती है। इसमें भी कुछ गिने-चुने खिलाडिय़ों को ही खपने का अवसर मिल पाता है।ÓÓ
शोणित समझ गया कि पिता उसे हतोत्साहित करने के लिए नकारात्मकता थोप रहे हैं, वरना उन्हें क्या मालूम नहीं कि टीम इंडिया में जो चयनित नहीं होते, उनके लिए स्टेट, जोनल और आईपीएल में खेलने के अलावा और भी कई तरह के काम होते हैं। कोई अम्पायर, कोई कमेंट्रेटर, कोई सेलेक्टर, कोई कोच बन जाता है। ये काम राष्ट्रीय स्तर से लेकर मोहल्ले स्तर तक निष्पादित होते हैं। उसने बिना कोई जिरह किए अपनी पसंद का एक दूसरा विकल्प सामने रख दिया, ''फिर तो मैं एक गिटारिस्ट के तौर पर अपना कैरियर बनाना चाहता हूं। आप जानते हैं कि गिटार बजाना मेरा शौक रहा है और मैं ठीक-ठाक बजा भी लेता हूं।ÓÓ
अनुराग समझ गये कि लड़के ने पढ़ाई-लिखाई से भागने का पूरा मन बना लिया है। उन्होंने नरमी और चतुराई से पेश आने की भंगिमा बना ली, ''देखो बेटा, तुम्हें जो कुछ भी करना है, अपने लिए करना है। फर्ज करो कि तुम बिल्कुल अकेले हो और तुम्हारा पूरा परिवार अर्थात हमलोग तुम्हारे साथ नहीं हैं। क्या तुम गिटार बजाकर अपनी और अपने होने वाले बीवी-बच्चों की आजीविका चला लोगे? गिटार बजाने के कहां-कहां और कितने स्कोप हैं? फिल्मी गानों के जो संगीत निर्देशक होते हैं उनकी टीम में या फिर पेशेवर कंसर्ट में कई साजिंदों के साथ एक गिटारिस्ट भी होता है। गाना रिकॉर्ड हो जाता है तो सीडी/डीवीडी या फिर यूट्यूब के जरिये पूरा देश सुन लेता है। अब बताओ, इस देश को ज्यादा संख्या में किसकी जरूरत है क्रिकेटर की, गिटारिस्ट की या इंजीनियर की?ÓÓ
शोणित लाजवाब सा होकर पिता का मुंह देखता रह गया। अनुराग ने आगे कहना शुरू किया, ''क्रिकेट खेलना चाहिए, गिटार भी बजाना एक अच्छी बात है, एक संभ्रांत शौक है। तुम इंजीनियरिंग पढ़ते हुए भी अपनी इन रुचियों को जिंदा रख सकते हो। क्रिकेट को एक व्यायाम के रूप में लो, गिटार वादन को मानसिक थकान से मुक्ति के तौर पर लो। पकड़ अच्छी बन जाये तो कॉलेज की टीम में जगह बना लो.....कॉलेज की सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति दो। लाखों लोग हैं जो खेल और संगीत को इसी रूप में लेते हैं।ÓÓ
शोणित समझ गया कि इंजीनियरिंग पढ़े बिना उसे पारिवारिक शिकंजे से मोक्ष नहीं मिल सकता। उसने शहर के सबसे महंगे कोचिंग इंस्टीट्यूट से कोचिंग लेनी शुरू कर दी।
एक दिन उसे अथक मिल गया। उसने भी आई.कॉम. पास कर लिया था। बेफिक्र और मनमौजी मूड में किसी हॉल से सिनेमा देखकर आ रहा था। पूछने पर बताया कि महात्मा गांधी जनता कॉलेज में उसने बी.कॉम में एडमिशन ले लिया है। शोणित ने देखा कि उसके चेहरे पर किसी प्रकार के तनाव की कोई रेखा नहीं है। शहर के इस सबसे चालू और सार्वजनिक कॉलेज में प्राय: सबको ऐडमिशन मिल जाता है। किसी भी प्रवेश परीक्षा को पास करने की कोई जरूरत नहीं। शोणित ने पूछ लिया, ''तब आगे क्या करना है इस कॉलेज में पढ़कर?ÓÓ
''कुछ भी कर लूंगा यार। सड़क बनाऊंगा, फर्नीचर बनाऊंगा, बिल्डिंग बनाऊंगा, सब्जी या फल की दुकान खोल लूंगा, टेलरिंग शॉप खोल दूंगा, मोटर मेकेनिक, पेंटर, प्लम्बर या इलेक्ट्रिशियन बन जाऊंगा। कहने का मतलब यह कि इंजीनियर, डॉक्टर और साइंटिस्ट छोड़कर बाकी सारा कुछ इसी कॉलेज से पढ़कर बना जा सकता है। लड़के बन भी रहे हैं - जज, कलेक्टर, वकील, नेता, व्यापारी, किरानी, किसान, पत्रकार, चपरासी, मास्टर, ठेकेदार, बिल्डर, दर्जी, पुलिसकर्मी, ब्रोकर आदि आदि। खैर छोड़ो, सुना कि तुम प्रेरणा क्लासेज से कोचिंग ले रहे हो। सब कुछ ठीक तो चल रहा है? तुम्हें एक बड़ी नौकरी में देखकर मुझे भी गर्व होगा यार कि कभी तुम मेरे दोस्त रहे थे।ÓÓ
''नहीं अथक, ठीक नहीं चल रहा है, यार। इंस्टीट्यूट के मंथली टेस्ट में मेरा रैंक काफी नीचे रहता है। मैं अच्छा नहीं कर पा रहा हूं। पापा और दादा जी लगातार मुझे प्रोत्साहन भाषण का टॉनिक देते रहते हैं। उस टॉनिक से मेरी सेहत बनने की जगह और बिगड़ती जा रही है। तैयारी में मेरा बिल्कुल मन नहीं लग रहा।ÓÓ
''अरे लेकिन तू तो नीचे की कक्षाओं में अच्छा खासा रैंक होल्डर बना रहता था। खैर, हताश होने की जरूरत नहीं है। फिर कोई गलत-सलत कदम मत उठा लेना। कहते हैं कि इस दुनिया में तेज दिमाग लोगों के लिए कम काम है और कम दिमाग वाले लोगों के लिए बहुत ज्यादा काम है। मन बहलाने के लिए कभी-कभार क्रिकेट खेल लिया कर और तेरे गिटार का क्या हुआ, बजाने का जो भूत सवार हुआ था, वह अब भी है या उतर गया?ÓÓ
''भूत तो अब भी सवार है, लेकिन उसे उतारने वाले दो सिद्ध तांत्रिक मेरे घर में मौजूद हैं।ÓÓ
''वे तुम्हें बहुत ऊंचाई पर पहुंचाना चाहते हैं यार। वे तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। तुम खुशकिस्मत हो कि वे तुम्हारे लिए इतने ज्यादा कंसर्न हैं। मुझे देखो, मेरे बाबूजी ने तो सब कुछ मुझ पर ही छोड़ दिया है। मुझे लगता है शोणित कि घर में कोई ऐसा जरूर हो जो डांटे, बरजे और नजर रखे। मैं कितना कुछ आवारगर्दी कर लेता हूं, घर में कोई नहीं टोकता।ÓÓ
''तू मुझे ऐसा कहकर हौसला देने की कोशिश कर रहा है न ताकि मैं अपना बैलेंस बनाये रखूं!ÓÓ
''बैलेंस तो हर हाल में खोना नहीं चाहिए शोणित। तुम्हें आखिर कमी ही किस चीज की है? खानदानी रईस हैं तुम्हारे पिता।ÓÓ
''ठीक है....ठीक है। मेरे एक दादा जी ही काफी है घर में प्रवचन देने के लिए, अब तू भी दादा जी मत बन जा।ÓÓ
इस मुलाकात के कोई दो-ढाई माह बाद शोणित के दादा गजानन गणपत अथक से मिलने उसके घर आ गये। वह समझ गया कि फिर शोणित ने कुछ गड़बड़ कर दी है। उन्होंने पूछा, ''बेटे, सच सच बताना, तुम शाम को कितने बजे घर लौट आते हो?ÓÓ
''दादा जी, छह बजे के बाद तो अमूमन मैं घर में ही होता हूं। सप्ताह में एकाध बार सिनेमा या दोस्तों के किसी कार्यक्रम के कारण भले एक-डेढ़ घंटे की देरी हो जाती होगी।ÓÓ
इसकी पुष्टि करने के खयाल से दादा ने अथक की मां की ओर निहारा। मां ने समर्थन करते हुए कहा कि अथक ठीक कह रहा है। दादा ने इस सवाल का प्रयोजन स्पष्ट करते हुए अपनी चिन्ता सामने रख दी, ''आजकल शोणित रात बारह-एक बजे के पहले घर नहीं आता। हमें लगा कि अथक भी ऐसा ही कर रहा होगा। हम ऐसा महसूस कर रहे हैं कि वह किसी बुरी संगति में पड़ गया है और ड्रग व ड्रिंक लेने लगा है। कल तो उसने अति कर दिया, सुबह का निकला अब तक नहीं लौटा। रात भर हम उसकी राह तकते रहे। मोबाइल भी उसका स्विच ऑफ  बता रहा है। संभावित ठिकानों पर हम जितना पता कर सकते थे, कर लिया। हारकर मुझे यहां आना पड़ा। जैसा कि उसका स्वभाव रहा है, हम बहुत डरे हुए हैं कि कहीं उसने कोई घातक कदम न उठा लिया हो।ÓÓ
अथक सुनकर हैरान रह गया। उसने कहा, ''मैं उसे ढूंढने की कोशिश करता हूं दादा जी। आप खुद को संभालिये और घर जाइए। मैं मिलता हूं आकर।ÓÓ
अथक भले ही इन व्यसनों से दूर था, लेकिन उसे कुछ अड्डों की जानकारी थी। कई जगह छान मारने के बाद एक जगह वह मिल गया। एक मंदिर था, जहां के परिसर में साधुओं के ठहरने का एक कमरा था। वहां ड्रग बेचने का कारोबार चलता था। दादा का अनुमान ठीक निकला। वह ड्रग का शिकार हो गया था। हैवी डोज ले लेने की वजह से वह मंदिर के आसपास ही लुढ़क गया था और घर जाने की हालत में नहीं रह गया था। साधुओं ने उसे घसीटकर मंदिर परिसर के बाहर एक कूड़ेदान के पीछे डाल दिया, ताकि मंदिर पर किसी को शक न हो। अथक ने उसे उठाकर एक ऑटो पर लाद लिया और घर पहुंचा दिया। उसकी हालत देखकर घरवाले सन्न रह गये। आँखें बुझी हुई, चेहरा निष्प्राण सा, देह निचुड़ी हुई, होश उड़ा हुआ। उनकी उलझन और बढ़ गयी कि आखिर क्या वजह हो सकती है कि इतना खयाल रखने और प्यार-दुलार करने के बावजूद यह लड़का बार बार आत्महत्या के रास्ते पर चल पड़ता है। एक तरह से यह आत्महत्या का ही प्रयास तो है। ड्रग एडिक्ट क्योर सेंटर में उसका इलाज और लंबी काउंसिलिंग करायी गयी। जब वह नार्मल होकर भरोसा दिलाने लगा कि अब वह उस रास्ते पर नहीं जायेगा तो फिर उसकी इच्छा से कोचिंग में जाने की सबने सहमति व्यक्त कर दी। उसे बिना बताये उसके आने-जाने पर पूरा ध्यान रखा जाने लगा।
उसके पिता अनुराग गणपत ने उसके बिखरे मनोबल को दृढ़ता सौंपने की दृष्टि से कहा, ''तुम इंस्टीट्यूट के मंथली टेस्ट में पिछडऩे की ज्यादा चिंता मत करो बेटे। हां, अच्छा करने की कोशिश करते रहो, नहीं होता है तो कोई बात नहीं। इसके लिए खुद को पीडि़त करने की कोई जरूरत नहीं है। हम दूसरा उपाय निकाल लेंगे। सारे इंजीनियर क्या आई.आई.टी. में ही पढ़कर बनते हैं? और भी हजारों कॉलेज हैं।ÓÓ
अनुराग गणपत ने जो कहा, अंतत: वही नौबत आ गयी। शोणित लगातार टेस्ट में पिछड़ता रहा। उसके दादा और पापा को यह अंदाजा हो गया कि आई.आई.टी. कम्पीट करना इसके बूते की बात नहीं है। यह अंदाजा सही साबित हुआ। आई.आई.टी. की ही नहीं बल्कि और भी कई स्टेट लेवेल के इंट्रेंस टेस्ट में भी वह बहुत पिछड़ा हुआ रहा। तय किया गया कि दक्षिण के किसी ठीकठाक कॉलेज में डोनेशन देकर उसका एडमिशन करा दिया जाये। मतलब उसे हर हाल में इंजीनियरिंग ही पढऩा था, इससे कम की पढ़ाई घरवालों को लियाकत और रुतबे में हेठी जैसी लगती थी। शोणित ने एक बार फिर कन्नी काटने की कोशिश की, ''डोनेशन के कॉलेज से डिग्री लेकर क्या होगा? वहां तो कोई कंपनी नौकरी देने नहीं जाती। बहुत भटक कर और टपला खाकर नौकरी मिलती भी है तो पैकेज इतना पुअर होता है कि अपने इंजीनियर होने पर शर्मिंदगी होने लगती है।ÓÓ
दादा ने उसे समझाते हुए कहा, ''तुम्हारा यह कहना ठीक है, लेकिन यह उसके लिए है जिसकी पृष्ठभूमि में कोई बड़ा टेक नहीं है। तुम्हारे पीछे कई लंबे-लंबे सबल हाथ हैं। तुम्हारे पास कोई सी भी सिर्फ ऊंची डिग्री होनी चाहिए, सेट करने की जिम्मेदारी फिर हमारी होगी। अपनी नौकरी में रहते हुए बहुतों को मैंने और तुम्हारे पिता ने उपकृत किया है, आखिर वे कब काम आयेंगे।ÓÓ
शोणित के पास छूटने का अब कोई रास्ता नहीं था। 5 लाख का डोनेशन देकर तमिलनाडु के एक कॉलेज में कम्प्यूटर साइंस की डिग्री के लिए उसका ऐडमिशन करा दिया गया। शोणित के एकदम मन मुताबिक कॉलेज था यह। यहां सेमेस्टर वाइज पास करने का कोई झंझट नहीं था। समय पर मोटी फीस चुकाना ही यहां पढ़ाई का पैमाना था। चार साल गुजारने के बाद उसे इंजीनियरिंग की डिग्री मिल गयी।
दादा ने अपने रसूख और संपर्क का इस्तेमाल करते हुए उसे एक आई.टी. कंपनी में नौकरी लगवा दी। लेकिन कुछ दिन ही वह वहां टिक सका। चूंकि आगे जॉब का निष्पादन सिफारिश से नहीं दक्षता और मेरिट से होना था, जिसका उसके पास नितांत अभाव था। इसी तरह कभी दादा तो कभी पिता अपनी पैरवी से कई कई कंपनियों में उसे टिकाने की कोशिश करते रहे और वह अपने अपढ़पन तथा अयोग्यता के कारण बाहर का रास्ता पकड़ता रहा। ऐसे में एक हीनभावना उसे लगातार घेरती रही। उसके दादा और पिता ने जब यह भांप लिया कि लगातार विफलता की कुंठा उसे फिर कोई गलत कदम उठाने के लिए बाध्य कर सकती है, तो उसे अपने पास ही बुला लिया। इकलौता वारिस था, वे उसे जिस किसी हाल में भी महफूज देखना चाहते थे।
वापस आने के अगले ही दिन शोणित अपनी उदासियों और विफलताओं के पेंट चढ़े चेहरे लिये हुए अथक के पास पहुंच गया, अर्से से उससे मुलाकात नहीं हुई थी। उत्सुकता थी कि देखें हमेशा मामूलीपन धारण किये रहने वाला आदमी, जो अपनी कक्षा में चालीसवां या उससे भी पीछे के रैंक में रहा करता था, जिसके माता-पिता उस पर पढ़ाई के लिए न अपनी कोई इच्छा थोपते थे और न बहुत नजर रखते थे, जो शुरू से सर्वसुलभ चालू सरकारी स्कूल और महात्मा गाँधी जनता कॉलेज का विद्यार्थी रहा था, जिसके पास न कोई स्पेशलाइज्ड डिग्री थी, न उसकी पृष्ठभूमि में कोई बड़ा टेक या जैक था, जो बेफ्रिकी और अलमस्ती के अंदाज में कहा करता था कि वह जीवन में छोटा से छोटा या अति साधारण जैसा कोई भी काम कर लेगा, अब किस हाल में है और क्या कर रहा है?
किसी ने बताया था कि बी.कॉम. कर लेने के बाद अपने कहे अनुरूप वह ग्रीज, तेल और कालिख में लिथड़े रहने वाले हेल्पर बनकर बाइक, स्कूटर और कार वगैरह की मरम्मत करने का काम सीख रहा है। शोणित यह मानकर चल रहा था कि अब तक वह मिस्त्री बन गया होगा और किसी कार की बोनट खोलकर इंजन में मुंडी घुसाये होगा या फिर किसी बाइक के खुले पार्ट-पुर्जों में उलझा हुआ होगा।
यह सच था कि वह खुद को रगड़कर और घिसकर एक अच्छा मोटर मेकेनिक बन गया था। काफी दिनों तक कभी इस गैरेज, कभी उस गैरेज में दिहाड़ी करता रहा। फिर उसने एक अपना कार सर्विस सेंटर खोल लिया। उसकी फुर्ती, उसका ज्ञान और बातचीत में निहित मेधा के बूते उसे एक बड़ी कार कंपनी से अधिकृत (ऑथराइज) सर्विस सेंटर के तौर पर फ्र्रेंचाइजी मिल गयी। अथक जब उसके पास पहुंचा तो 'भाटिया कार सर्विस सेंटरÓ लिखे एक विशाल साइनबोर्ड के एक बड़े से अहाते में बीस-पच्चीस लगी कारों की चल रही सर्विसिंग का वह सुपरविजन करने में व्यस्त था। लगभग डेढ़ दर्जन कारीगर और हेल्पर काम में भिड़े हुए थे। शोणित पर नजर पड़ते ही उसने खुशी में अपनी बाहें फैला दी, ''अरे मेरा हीरो, कब आये तुम? तुमसे मिलने की वाकई मेरी बड़ी इच्छा हो रही थी। एक-दो बार दादा जी कार की सर्विसिंग कराने आये थे। उनसे पता चला कि तुम इंजीनियर बनकर किसी बड़ी कंपनी में बड़े ओहदे पर लग गये हो। चलो, आओ ऑफिस में बैठकर बातें करते हैं।ÓÓ शोणित उसके इस विस्तार को देखकर हैरान रह गया। किसी आर्किटेक्ट से जबर्दस्त फर्निश किया हुआ उसका वातानुकूलित आलीशान कमरा यकीन नहीं दिला पा रहा था कि यह अथक के बैठने के लिए है। अथक ने उसकी आँखों में तैरते भाव को पढ़ते हुए कहा, ''ताज्जुब में पड़ गये न! दरअसल मुझे भी कभी-कभी खुद को पहचानने में असुविधा हो जाती है। इस कुर्सी पर बैठने के बाद खुद को ही चिउटी काटकर जांच लेता हूं कि मैं स्वप्न में नहीं हकीकत में हूं। तू अपनी बता, कहां है इस वक्त?ÓÓ
''अब मैं कहीं नहीं हूं अथक। तमाम ठोकरें खाकर घर वापस आ गया हूं।ÓÓ
अथक कुछ कहने ही जा रहा था कि एक कार ओनर कमरे में आकर अपनी कार की खराबियों के बारे में बात करने लगा। वह गया तो दूसरा ओनर आ गया। दूसरा गया तो एक मेकेनिक आकर किसी पेचीदे फॉल्ट के बारे में समाधान पूछने लगा। इसी तरह कभी ओनर, कभी मेकेनिक, कभी स्टोरकीपर, कभी एकाउंटेंट बिना गैप दिये एक के बाद एक आते रहा। दो-तीन बार तो उसे उठ-उठ कर जाना भी पड़ा। चाहकर भी शोणित से बतियाने का वक्त वह नहीं निकाल पाया तो विवश होकर उसे कहना पड़ा, ''सॉरी दोस्त। तुम्हें और बैठाकर बोर करना उचित नहीं है। मैं कल शाम तुम्हारे घर आता हूं यार। कल साप्ताहिक छुट्टी का दिन है। आराम से खूब बातें करेंगे।ÓÓ
अथक की मसरूफियत और एक काबिल बॉस की मानिंद उसकी डीलिंग देखकर विस्मय-विमुग्ध शोणित घर लौट गया। अगले दिन जब अथक वहां पहुंचा तो बाहर से ही गिटार बजने की आवाज उसे सुनाई पड़ गयी। गेट पर ही दादा जी मिल गये। कहने लगे, ''जब से आया है अपने कमरे में बंद होकर गिटार बजाता रहता है। न उसे खाने की चिन्ता रहती है, न किसी से बोलने-बतियाने की। गिटार भी बजाता है तो दुख, वैराग्य और उदासी की धुनें निकालता है। उसे समझाओ अथक कि वह जो करना चाहे, करे, अब उसे कोई न मना करेगा, न अपनी मर्जी लादेगा।ÓÓ ''आपको नहीं लगता दादा जी कि यह कहने में आपने काफी देर कर दी?ÓÓ
''कहने में देर नहीं बेटा, शायद यह समझने में देर कर दी कि यह मेरा वक्त नहीं है जब घर के बड़े की इच्छा बच्चों के लिए गीता की तरह शिरोधार्य हुआ करती थी।ÓÓ
अथक जब उसके कमरे के पास पहुंचा तो गिटार से मुकेश के एक गाने की धुन बज रही थी.....'तेरी दुनिया में जी लगता नहीं, वापस बुला ले....मैं सजदे में झुका हूं, मुझको ऐ मालिक उठा ले......।Ó
किवाड़ खटखटाने के बाद दरवाजा खुला तो अथक के साथ दादा भी कमरे में प्रवेश कर गये। शोणित ने अपने मुुरझाये चेहरे पर थोड़ी सी खुशी लाने की कोशिश की। अथक उसे गीत की हताश दुनिया से निकलकर मूड बदलने का आह्वान करने लगा, ''मैं आ गया हूं, अब यहां कोई उदासी और मायूसी नहीं रहेगी। यार, तू सचमुच कितना अच्छा गिटार बजाने लग गया है। लेकिन इस तरह दर्द, दुख और नाउम्मीदी के गीत क्यों बजाते हो। खुशी, उत्साह और मौज-मस्ती को तूने धकिया कर क्यों किनारे कर दिया है?ÓÓ
''मैंने कई बार इसे समझाया है अथक कि गिटार ही बजाना है तो बेशक बजाओ। बन जाओ एक सिद्ध गिटारिस्ट, लेकिन शोक और मातम की धुनों से निकलो बाहर और उमंग व जोश को जीवन में जगह दो।ÓÓ
दादा कह ही रहे थे कि बीच में ही गुस्से से फनफना उठा शोणित, ''हद हो गयी.....अब गिटार पर मैं कौन सा गीत बजाऊंगा, इसका निर्णय भी आप करेंगे? मैं कह देता हूं कि अब मुझे कोई टोका-टाकी न करे, वरना मैं घर से चला जाऊंगा सदा के लिए।ÓÓ
शोणित का इस तरह अशिष्ट और क्रोधित स्वर सुनकर दादा अवाक रह गये। घर में उसके पिता अनुराग गणपत भी आ गये थे और उन्होंने भी शोणित का बोलना सुन लिया था। अपने पिता से उन्होंने कभी न जुबान लड़ायी थी और न इस तरह बेरुखी से पेश आये थे। उनका धैर्य भी आज जवाब दे गया और वे भी गर्जना कर उठे, ''दादा से इस तरह बात की जाती है? जितना ही हम तुम्हारे नखरे उठाते जा रहे हैं, उतना ही तुम हमारे सिर चढ़ते जा रहे हो। आखिर ऐसा क्या है तुममें कि हम तुम्हें झेलते रहें। कमरे में बंद होकर गिटार बजाना भी क्या कोई काम है। अब तुम्हारी यह हरकत हम नहीं झेलेंगे, तुम्हें जो करना है कर लो।ÓÓ
उन्होंने गिटार उठाया और सामने की दीवार से दे मारा। गिटार कई टुकड़ों में विभक्त होकर मातम को साकार कर गया। सभी हक्के-बक्के रह गये।