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Saturday 18 Nov 2017

वर्तमान भारत में बुद्धिजीवियों की भूमिका

नंद चतुर्वेदी
30, अहिंसापुरी, उदयपुर (राजस्थान)
फोन- 0294-2450332
ठीक आधी सदी के बाद मैं उस पुस्तक को पढ़ रहा हूं जिसे 1961 में अमरीकन समाजशास्त्री एडवर्ड शिल्स ने लिखी थी। यह भारत के उन बुद्धिजीवियों का सर्वेक्षण है जो परम्परा और आधुनिकता के बीच अपना स्थान तलाश कर रहे हैं। यह सर्वेक्षण भारतीय बुद्धिजीवी की उस 'आहत और अपमानितÓ जिंदगी के आत्मसंघर्ष को अभिव्यक्त करता है जो अपनी महान और गर्वीली परम्परा को लालच और संभ्रम से देखता हुआ आधुनिकता के नये प्रतिमानों और जीवन-शैलियों को अपनी संस्कृति और स्वभाव का हिस्सा बनाता जाता है।
शिल्स की इस पुस्तक के पहले 1928 में प्रकाशित काका कालेलकर की पुस्तक 'जीवन साहित्यÓ में मैंने उनका छोटा-सा निबंध पढ़ा था- 'श्रमजीवी बनाम बुद्धिजीवीÓ। यह स्थूल सा सामाजिक विभाजन है लेकिन इसके कुछ मनोवैज्ञानिक परिणाम हुए हैं- छोटी-बड़ी, मान-अपमान की दृष्टियां बनाने में। कालेलकर जी ने लिखा है ''आज भी मनुष्य शिक्षा इसी उद्देश्य से प्राप्त करता है कि वह परिश्रम करने की सजा से बच जाए। एक दिन मैं सिन्ध में अपना स्नान-गृह साफ कर रहा था यह देखकर एक प्रख्यात धर्मोपदेशक मुझसे पूछने लगे- अजी, ऐसा काम करना था तो इतनी अंग्रेजी क्यों पढ़ी? चार इल्म पढ़े हैं, पर फिर भी अपने हाथ से काम कर रहे हैं। मुझे बड़ी शर्म मालूम होती है।ÓÓ कब से और क्यों यह कहना तो कठिन है लेकिन बुद्धिजीवियों के मन में चिन्तन और कर्म के बीच कोई घनिष्ठ आकर्षण देखने को नहीं मिलता और अगर बुद्धिजीवी की कोई विशेषता बताने का आग्रह किया जाए तो 'आराम और फुर्सतÓ से दिन गुजारने का लालच, शरीर-श्रम से बचना प्रमुख होगा। दार्शनिकों, विचारकों और कवियों के संबंध में यह धारणा आदर के साथ फैली हुई है कि वे पूरी जिन्दगी कल्पना-लोक में ही गुजारते हैं। इसका निहितार्थ यह है कि मेहनत से बनाई हुई, कर्म की दुनिया में वे अजनबी हैं और उन्हें इस तरह यथार्थ से बचते-बचाते रहने का हक भी है। इस तरह, विचार और बुद्धि को तेजस्वी और पवित्र बनाए रखने के लिए उसे शरीर-श्रम से अलगा दिया गया। बुद्धिजीवी उस वृहत्तर समाज से, उसकी भाषा और उसकी सार्वजनिकता, सर्जनात्मकता से अपरिचित हो जाए, इस अपरिचय को और अलगाव को उन्होंने महिमा-मंडित भी किया यह कहकर कि वे सामान्यजनों से भिन्न और विशेष है। इस अलगाव की रफ्तार और उसके भाव को अंग्रेजी ने हवा दी। अंग्रेजी जानने वालों का एक अलग तेज-तर्रार, चमत्कारी वर्ग बन गया। वर्ग-निर्माण की प्रक्रिया में, डॉ. राममनोहर लोहिया ने धन के साथ ऊंची जाति और अंग्रेजी भाषा को भी रेखांकित किया है, उसका करिश्मा भारत सहित तीसरी दुनिया के कई देशों में नजर आने लगा। 1935 में मेकॉले ने अनुवादकों या दुभाषियों का वर्ग तैयार करने की बात की थी जो बाद में 'बाबूÓ बना और 'बुद्धिजीवियोंÓ के वर्ग में प्रतिष्ठित हो गया।
'बुद्धिजीवीÓ अंग्रेजी शब्द 'इन्टेलक्चुअलÓ का पर्यायवाची है। शिल्स ने लिखा है कि ''आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी का अभ्युदय आधुनिक भारत की तरह 19वीं सदी में ही हुआ है। पहले भारतीय प्रशासकों और बाद में आधुनिक शिक्षा के विकास के साथ कॉलिज-शिक्षकों के रूप में। 19वीं सदी के पूर्वाद्र्ध में राजा राममोहन राय भारतीय प्रशासकों की पंक्ति के और हेनरी डी. रोजिओ कॉलिज शिक्षक के रूप में बुद्धिजीवियों में शामिल होने वाले अग्रणी महानुभाव थे। सदी के उत्तराद्र्ध में वकील और पत्रकारों को बुद्धिजीवियों की जमात में स्थान मिल गया। इस दूसरे चरण में लेखकों, उपन्यासकारों, कहानीकारों, कवियों, नाटक लिखने वालों का एक बड़ा समुदाय, जो हर अर्थ में आधुनिक था, बंगाल में प्रतिष्ठा प्राप्त करने लगा। गौरतलब है कि इनमें उपन्यास और कहानी-लेखकों के पास किसी प्रकार की पूर्व भारतीय अथवा देशज परम्परा नहीं थी। इस प्रकार भारत में बुद्धिजीवी जनसमुदाय बनने लगा जिसकी रुचियों को भारतीय बुद्धिजीवी महत्व देने लगे।ÓÓ (दि इन्टेलक्चुअल बिटवीन ट्रेडीशन एण्ड मोडर्निटी- इन इंडियन सिचुएशन; एडवर्ड शिल्स, पृष्ठ 15)
इस लम्बे अंतराल में भारतीय बुद्धिजीवियों ने सार्वजनिक जीवन में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है और यदि उन्हें पश्चिमी प्रतिमानों की दृष्टि से देखें तब भी उनकी तकनीकी दक्षता, विश्लेषणात्मक मेधा, स्वभाव और रुचियां असंदिग्ध हैं। 1961 के आंकड़ों के अनुसार उनकी संख्या 1,60,000 तक पहुंच गई है। यह संख्या इतनी बड़ी है कि उसकी आवाज अनसुनी नहीं की जा सकती है और जो कई विषयों पर आयोजित विचारोत्तेजक परिसंवादों में परिपक्वता का सबूत हो सकती है।
यह बात ध्यान में रखने जैसी है कि भारतीय बुद्धिजीवी अनेक केन्द्रों से अपनी शक्ति ग्रहण करता है और इस तरह कई दबावों के बीच रहता है और रास्ता बनाता है। ''उसके पास अपनी समृद्ध बौद्धिक सम्पदा और परंपरा है, एक पारम्परिक सामाजिक संरचना है, मुगल साम्राज्य के दिनों में तहस-नहस किया गया बौद्धिक ढांचा है, अंग्रेजी राज में तैयार किए गए बौद्धिक-संस्थान और इनकी अपनी परम्परा है, भारत की गरीबी और निरक्षरता है और इस तरह विदेशों से आयातित आधुनिकता को स्थान देने की आधी-अधूरी इच्छाएं हैं।ÓÓ (वही)
बुद्धिजीवी की विशेषताओं को जानने की इच्छा करते हुए यह तलाश करना आवश्यक है कि ''आधुनिकताÓÓ के लक्षण क्या हैं क्योंकि आधुनिक होने की शर्तें बुद्धिजीवी होने की शर्तें भी हैं। प्राय: लोग समझते हैं कि आधुनिक होने के लिए नए रहन-सहन का दिखावा और एक ऐसी रुमानी किस्म की जीवन शैली काफी है जो परम्परा को ढके रहती हो और बाहर-बाहर से परिवर्तन की क्रांतिकारी-भाषा भी काम में लेती चली जाती हो। यह इसलिए भी होता है कि आधुनिक होना मुश्किल होता है और उसकी अनिवार्यता के संबंध में हम पूरी-पूरी तरह आश्वस्त भी नहीं होते। इस तरह पुराने समाज आधे-अधूरे मन से आधुनिक होना चाहते हैं लेकिन दूसरा या सनातन मन जो पीछे देखता है- बदलूं या न बदलूं इस दुविधा या संशय से घिरा रहता है। इस तरह आधे-अधूरे मन से आधुनिक होता है यानी आधे-अधूरे मन से बुद्धिजीवी।
बहरहाल आधुनिक होने की शर्तों को देखें। ''पहली शर्त है कि आधुनिक मनुष्य नए अनुभव के लिए हमेशा उत्सुक रहेगा। दूसरी शर्त यह कि वह न केवल सवालों के उत्तर ढूंढने के लिए तत्पर रहेगा जो वर्तमान परिवेश से उपजे हैं बल्कि उनके बारे में अपनी राय बनाने की क्षमता भी विकसित कर लेगा। वह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए आस्थाशील होगा, तीसरी शर्त- उसे यह मालूम होगा कि किसी भी समस्या को देखने के कई कोण हैं और उसे हल करने के कई उपाय हो सकते हैं। चौथी बात यह है कि वह अतीत की अपेक्षा वर्तमान के नजदीक होता है और भविष्य की तरफ देखता है। उसका पांचवां सरोकार समय होता है; वह समय की कीमत जानता है; उसके काम करने के घंटे निश्चित होते हैं; वह समय का पाबंद है और अपने काम को व्यवस्थित रूप से करता है। छठी शर्त- अपने काम को सम्पन्न करने के लिए वह परिस्थितियों और परिवेश को अनुकूल बनाता है। वह परिस्थितियों के वश में होने की अपेक्षा उन्हें अपने वश में रखता है। सातवीं बात यह है कि वह जानता है कि दुनिया अबूझ नहीं है, उसका गणित समझा जा सकता है और सामाजिक संस्थाओं द्वारा, जिन पर मनुष्य का वश है, दुनिया बदली जा सकती है। आठवीं बात विज्ञान और टेक्नोलॉजी में उसका पूरा विश्वास होता है और अंतिम बात यह कि वह मनुष्य की बराबरी में विश्वास करता है और न्यायपूर्ण व्यवस्था का समर्थक है।ÓÓ
आधुनिक मनुष्य या बुद्धिजीवी होने की सबसे बड़ी शर्त यह स्वीकार करना है कि हमारी दुनिया उसकी व्यवस्था, बहुत से सवाल, स्वाधीनता के, समता के, मनुष्य और स्त्री के, उत्पीडऩ के, वे दैविक, अमूर्त और निर्गुण नहीं है। उनका संबंध सामाजिक रचना, विवेक, मनुष्य के विचारों, इच्छा-शक्ति और परिवर्तन की दिशाओं से है। इस तरह वह विचारों की अंतहीन संभावनाओं के बीच खड़ा रहता है। दरअसल दुनियाभर के बुद्धिजीवियों की विलक्षणता ज्ञान और विचारों के साथ टकराना और उस रोशनी के लिए प्यासे हिरण की तरह भागते रहना है जिसे व्याख्यायित करने के लिए शायद 'संभावनाÓ सबसे सार्थक शब्द है।  
यदि हम भारतीय समाज को देखें तो पाएंगे कि वहां बुद्धिजीवी की कोई अलग पहचान नहीं है, उस तरह जिस तरह पश्चिम में है। एक बौद्धिक असहमति दर्ज कराने की और सत्ता प्रतिष्ठानों के वैचारिक दुराग्रहों के विरुद्ध संघर्ष करते रहने की। मसलन हम सात्र्र का एक जीवन प्रसंग लें- ''सात्र्र ने हर समय हर जगह होने वाले दमन के विरुद्ध आवाज उठाई। अपने देश के सैनिकों द्वारा अल्जीरिया की स्वाधीनता को कुचलने की कार्रवाई से क्षुब्ध होकर उसने फ्रांसिसी सैनिकों को सेना से भाग जाने के लिए उकसाया और द गॉल को चुनौती दी कि जब इस उद्देश्य के लिए प्रकाशित घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले दूसरे व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है तो उसे भी जेल में बंद किया जाए। सात्र्र ने कहा कि यदि सच्चा न्याय ही किया जाना है तो मुझ पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया जाए क्योंकि मैंने फ्रांसिसी सैनिकों से युद्ध क्षेत्र से भागने का आह्वान किया है तो द गॉल ने कहा कि क्या कोई वाल्तेयर को भी बन्दी बनाता है- सात्र्र फ्रांस है।ÓÓ (सात रंग- देवेन्द्र इस्सर, पृ. 112) भारतीय समाज में सत्ता-प्रतिष्ठानों को इस प्रकार की निर्मम आलोचना सुनने का थोड़ा अभ्यास भी नहीं है और ऐसी हिम्मत से राजकाज, राज-पुरुषों और राजनेताओं की नीति-आलोचना करने वाला कोई बौद्धिक-वर्ग या बुद्धिजीवी यहां तैयार ही नहीं हुआ है। संसार से डरना, भागना, अपनी धर्म-संस्कृति की मुख्य लय या सुर को बेसुरा न होने देना, जल में कमल की तरह रहना और अंत में 'मोक्षÓ को पाने के लिए अलौकिक उद्वेगों के बीच रहना-जीना ही इसका कारण है? भारतीय बुद्धिजीवी की मनोरचना का रहस्य क्या है? किस परम्परा में उसकी मनोरचना होती है और अंत तक किस बौद्धिक-परम्परा के मनोवैज्ञानिक करिश्मों से वह मोहित रहता है? शिल्स ने इस दबाव को 'धार्मिक-संवेगÓ (क्रद्गद्यद्बद्दद्बशह्वह्य ह्यद्गठ्ठह्यद्बह्लद्ब1द्बह्ल4) के अन्तर्गत स्थान दिया है, एक महासागर में मिल जाने का भाव, इन्द्रिय बोध की छोटी हदों और रोज-रोज के संकीर्ण अनुभवों को लांघकर सबमें विलीन हो जाने की इच्छा, जो पश्चिम में केवल धार्मिक-अनुभवों की श्रेष्ठ कोटि है, यहां के बुद्धिजीवियों के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा है।
भारतीय समाज में वैराग्य, विरक्ति, जीवन के दु:खों से घबराना और कहीं अन्यत्र आनंद ढूंढना इस कदर चाहा जाता रहा है कि हमारी जीवन-व्यवस्था में हमने जिन आश्रमों की रचना की है, उनमें से केवल एक गृहस्थ में ही हम जिन्दगी का असली चेहरा देखते हैं। यह आयु का एक चौथाई हिस्सा होता है जो देखते-देखते बीत जाता है और तीसरे-चौथे आश्रम के दिन आ जाते हैं जहां से हम जीवन की अनित्यता, नश्वरता और निस्सारता को पूरी गंभीरता से समझने की कोशिश करते हैं। यही दिन होते हैं जब भारतीय बुद्धिजीवी दुनिया को 'मृग मरीचिकाÓ और मिथ्या समझने लगता है। यह पूरी दुनिया उसे 'मायाÓ लगने लगती है और सारे उत्पीडऩ, दु:ख, यातनाएं, गैर-बराबरी, गरीबी, अकाल, रोग, युद्ध आदि भगवान की लीला या इच्छा नजर आती है। पश्चिम के बुद्धिजीवियों को हमारा यह स्वभाव उस आध्यात्म-संस्कृति का हिस्सा ही नजर आता है जो दुनिया को नई तरह का बनाने की इच्छा को कमजोर करता है और वैराग्य या उदासीनता की ओर धकेलता है। यह संयोग नहीं है कि समाजवाद के प्रमुख पक्षधर और नेता जयप्रकाश नारायण, अपने समय की क्रान्तिकारी राजनीति के संचालक अरविन्द घोष, साम्यवादी व्यवस्था के प्रबल समर्थक मानवेन्द्रनाथ राय, उत्तर-जीवन में झंझटभरे दुनिया के रास्तों को छोड़कर मानवकल्याण के सुगम और निर्विवाद रास्तों पर चले जाते हैं जो वानप्रस्थियों और संन्यासियों के हैं। जयप्रकाश राजनीति से छिटककर भूदान-आंदोलन में चले जाते हैं, अरविन्द आध्यात्म-चिंतन के लिए आश्रम की स्थापना करते हैं और एम.एन. राय प्रतिवर्ष अपने अनुयायियों के साथ वार्षिक शिविर लगाते हैं जहां वे जीवन के प्रति सौम्य रुचियां विकसित करने पर बल देते हैं। असल में तो भारतीय बुद्धिजीवी के पास और उसके चारों ओर 'मोक्षकामीÓ विचारों का विश्वास ही फैला रहता है और उसकी आकांक्षा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने की होती है। सांसारिक जीवन और उसके प्रश्न उसे इतने डरावने लगते हैं कि जो सांस्कृतिक परम्परा उसे मिली है उससे वह उनकी चमक नहीं, निकटता देखता है और हमेशा के लिए बंधनरहित हो जाना चाहता है।
भारतीय बुद्धिजीवी इसके अलावा यूं भी कई मनोग्रंथियों के बीच जाता है। आज तो प्राय: वह इस मनोवैज्ञानिक यातना से गुजरने की बात करता है जिसे वह 'जड़ों से कट जानाÓ कहता है। उसे लगता है कि वह अपने लोगों से अलग हो गया है और जैसे एक अजनबी दरवाजे-दरवाजे भटकता है लेकिन कोई दरवाजा नहीं खुलता, वह भी अजनबी हो गया है और उसके लिए सारे जाने-पहचाने दरवाजे बंद हो गए हैं। अपने लोगों से अलग जैसे- वह किसी द्वीप में रहता है। थोड़ा सा हिन्दुस्तानी और ज्यादा अंग्रेज। इस बात को समझने की कोशिश में वह पश्चिमी शिक्षा और संस्कृति को मुख्य अपराधी पाता है।
अपने ही लोगों में अजनबी होने के कारण अंग्रेजी भाषा और रहन-सहन यदि एक कारण हो तब भी भारतीय जीवन और व्यवस्था के अन्तर्विरोध इतने स्पष्ट हैं कि उन्हें नजरअंदाज करना अंधेरे में रहना ही होगा। असल में भारतीय बुद्धिजीवी को इस सवाल का मुकम्मिल उत्तर ढूंढना है कि भारतीय समाज के विघटन का प्रमुख कारण क्या है; वह जिदगी को उदास भी करता है, दूसरों से अलग भी और दंभ तथा बड़प्पन की अनेक श्रेणियों में बांटता है। वह कारण नजर नहीं आता वह जाति-व्यवस्था है, जो भारत के लोगों को ऊपर से और बहुत गहरे अंदर से अपरिचय और अजनबीपन में बांटती है, स्थायी और अनुलंघनीय दीवारें खड़ी करती है। जाति-प्रथा में बंटा हुआ देश यह देखने ही नहीं देता कि जाति-दंभ ने आत्मीयता की जगह कितनी कम कर दी है। भारतीय बुद्धिजीवी अपनी जड़ों की तलाश करने के सिलसिले में भटकता हुआ इस अपने अंदर के विभाजन को नहीं देखता जो सम्पूर्ण सामाजिकता के गहरे ताने-बाने को विछिन्न करता रहा है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारत के अधिसंख्य बुद्धिजीवी कुलीनता और जाति व्यवस्था के पक्ष में हैं। वे उसे सामाजिक संगठन की महत्वपूर्ण इकाई मानते हैं। जड़ों की तलाश में निकले हुए वे इस बुनियादी कारण को नहीं देखते या नहीं देखना चाहते।
भारतीय बुद्धिजीवियों के परिवार सामान्यतया गरीब और समृद्धिहीन हैं। अभी भी बड़़े विद्वान, लेखकों, कवियों, पत्रकारों, अध्यापकों को सम्मानजनक मुकाम नहीं मिलता और वे सुविधाएं तो दुर्लभ हैं जो उनकी व्यावसायिकता, गुणवत्ता या कलात्मक दक्षता बढ़ाने के लिए जरूरी है। परिवार में स्त्री-पुरुष के बीच के रिश्ते अमानवीय और तनावपूर्ण हैं। स्त्रियों की शिक्षा, उनको शक्तिशाली बनाने के प्रयत्न, उन्हें अपने स्वभाव के अनुसार जीवन जीने की स्वाधीनता और दूसरे प्रश्न केवल चालाकी भरी प्रतीक्षाएं हैं। बुद्धिजीवियों की निराशा और रसहीन जीवन शैलियां उस सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक संसार की प्रतिछवियां ही हैं जिन्हें बदलने को हम आधे-अधूरे मन से कुछ दूर जाते हैं और फिर अपनी जड़ों को ध्वस्त होने, बचाने के लिए नहीं, उन्हीं पुरानी हवेलियों में लौट आते हैं जिनके दरवाजे और खिड़कियां छोटी हैं।
नि:संदेह हमारे देश की बौद्धिक-परम्परा पुरानी और कुछ अनुशासनों को अत्यंत समृद्ध बनाने वाली रही है पर वह ब्राह्मण-वर्चस्व की ही है इसलिए एक सीमित अर्थ में ही उन्हें 'उत्पादकÓ कहा जा सकता है। वह दरअसल 'व्यवस्थाकारोंÓ को ही महत्व देती है और नियामक बनाती है। इस व्यवस्था में 'लोकÓ केवल अवान्तरण करता है और स्थापित व्यवस्था के अनुसार पाप-पुण्य का भागी बनता है। मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ है, जो कर्म-बंधन और पुनर्जन्म से मुक्ति है। पुराने भारतीय समाज में इस तरह प्रगल्भ तत्वमीमांसा के बावजूद व्यवस्था में हस्तक्षेप की बहुत कम जगह है। व्यवस्था के लोकानुमति तथा सामाजिक हस्तक्षेप की गुंजाइश इसलिए भी कम है क्योंकि पुरुषार्थ-सिद्धि (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) व्यक्ति सापेक्ष है। वर्ण-व्यवस्था की कठोर सीमाएं विमर्श या बहस को अनावश्यक बना देती है क्योंकि वह एक तरह से निर्णायक स्थिति है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारतीय समाज में विशेषतया पुराने भारतीय समाज में 'बुद्धिÓ या उसकी उपलब्धियों को किसी सराहनाभाव से नहीं देखा जाता। तर्कम अप्रतिष्ठायाम्- तर्क अप्रतिष्ठित है क्योंकि वह चातुर्य है आज्ञैर छल है इसलिए विग्रह, प्रश्न, कॉन्फ्लिक्ट पैदा करता है; संशय और विनाश। यह बुद्धि की सीमा दिखाने का प्रयत्न है। प्राय: आस्था शब्द का प्रयोग होता है जो 'पवित्रताÓ की कोटि में आता है और किसी को विमर्श या प्रश्न की अनुमति नहीं देता।
'बुद्धिजीवीÓ यानी समाज को बदलते हुए देखने वाले, बदलाव की अनिवार्यता उपादेयता को स्वीकार करने वाले, उस प्रक्रिया में शामिल होने वाले व्यक्ति के लिए पिछली दो शताब्दियों के पुनरावलोकन से आई निराशा को तोडऩे के लिए सिर्फ यही आशा बनी है कि वह अनेक ऐसे बुद्धिजीवियों के अवदान से समृद्ध हुई है जिन्होंने पुराने और निष्फल वैचारिक ढांचों को तोड़ा और मनुष्य को उत्साहपूर्वक जीने के लिए झंझोड़ा है। सहस्रों विचारों की रोशनी के सामने हमारी आंखें खुली रहे, विचारों का कोई डर हमारे मन में न समाए, केवल थके हुए मन से हम इतिहास को न देखें-पढ़ें, ऐसी उमंग पैदा करना बुद्धिजीवियों के कर्तव्यों में शामिल है।
लेकिन बुद्धिजीवी दुनिया में बराबर-बराबर बंटे नहीं हैं और इसी तरह दुनिया की यंत्रणाएं और क्लेश भी बराबर-बराबर विभाजित नहीं हैं। देखा जाए तो तीसरी दुनिया के देश विकल्पहीन हैं और उनकी भूमिका या तो पश्चिम के विकास  और प्रगति के प्रतिमानों का अनुकरण है या फिर अपने ही उस अतीत की ओर देखना है जहां से जिन्दगी को बदलने की कोई त्वरा या बेचैनी नजर नहीं आती और जहां किसी व्यावसायिक दक्षता, संसार से संबंधित कामों की सफलताएं, वैज्ञानिक शोधों का आनंद या गेहूं की नई प्रजाति से कृषि का उत्कर्ष सराहा जाता है। औपनिवेशिक दासता से युक्त दुनिया के देशों ने और वहां के बुद्धिजीवियों ने पश्चिम की समृद्धि, प्रौद्योगिकी, बाजार और वस्तुओं के अर्थशास्त्र को मानवीय विकास का चरम लक्ष्य स्वीकार कर लिया है। इस तरह तीसरी दुनिया की सारी प्रतिभा और समझ, अनुभव और बुद्धि, विविधता और निर्माण के नये रूप विलुप्त हो गए हैं और विकास की दौड़ एक आयामी, एकतरफा हो गई है। पश्चिमी बुद्धिजीवियों की यह आशा क्षीण हो गई है कि तीसरी दुनिया के अलग जीवनानुभव और सांस्कृतिक-विवेक किसी भिन्न व्यवस्था की तलाश करने में कामयाब होंगे, जबकि साम्यवादी और पूंजीवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नजर नहीं आ रहा। और अब दो व्यवस्थाओं में से साम्यवादी व्यवस्था निस्तेज हो गई है और अमेरिका ही एक विश्व बाजार, एक विश्व व्यवस्था, एक सांस्कृतिक उत्तेजना के जरिए दुनियाभर के बुद्धिजीवियों का सम्मोहन केन्द्र बना है।
भारतीय स्वाधीनता के पचास वर्षों में फिर से बुद्धिजीवियों की भूमिका पर विमर्श करना इस बात का संकेत है कि अंधेरा छटा नहीं है और उनके लिए यह अनिवार्य हो गया कि वे अपने देशवासियों की नियति और तेजी से बदलते यथार्थ की ओर नजर डालें तो पाएंगे कि उन्होंने सामान्य जन के साथ कभी अभिन्नता का अनुभव नहीं किया और इसलिए वे कभी सामान्य लोगों की विश्वसनीयता प्राप्त नहीं कर सके। यदि हम गहराई से उनकी मनोरचना का विश्लेषण करें तो हमारे देश के बुद्धिजीवी 'नक्कालोंÓ की श्रेणी में आते हैं। उनमें से अधिकांश की आकांक्षा उच्च श्रेणी के अफसर होने की है। किसी एक बड़े भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ने उसके बारे में टिप्पणी करते हुए कहा था, ''वह हिलता तो बहुत है मगर चलता नहीं है।ÓÓ एक क्षोभ-भरे बयान में ऑक्टेवियो पॉज ने कहा है... मगर मैं यह मानता हूं कि बुद्धिजीवी की राजनीतिक हैसियत में अक्सर छल होता है। वह अक्सर राजनेताओं का दास होता है। राजनीति को बदलने के लिए राजनीति से विद्रोह और समाज को बदलने के लिए समाज की आलोचना, गहरी शंका आवश्यक है। यहां मैंने पाया कि अधिकतर राजनीतिज्ञ अबौद्धिक हैं और अधिकतर बौद्धिक राजनेताओं के दास हैं।ÓÓ (बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में : श्रीकांत वर्मा, पृ. 32)।
बुद्धिजीवियों की बदलती अभिरुचियों और अभिजनों के वर्ग में पहुंचने की प्रबल आकांक्षा ने भारतीय समाज में बदलाव की 'इच्छाÓ को कमजोर कर दिया है। अब लोग सिद्धांत-निष्ठा को या किसी सिद्धान्त को संशय की दृष्टि से देखने लगे हैं और रिक्तता में जैसा होता है भाग्य और ईश्वर की तलाश करते नजर आते हैं। अच्छे दिनों और सभ्य समाज की घटती संभावनाओं के कारण भारतीय समाज में क्रांतिकारी सोच की जगह अतीत की ओर मुड़-मुड़ कर देखना, अदृश्य ग्रहों और ज्योतिषियों में अटूट विश्वास करने लगना, धर्म-गुरुओं की शरण तलाश करना और एक साम्प्रदायिक राजनीतिक पार्टी का 'वोट बैंकÓ बढऩा बुद्धिजीवियों के ढीले-ढाले प्रभाव के संकेत हैं।
बहरहाल स्वाधीनता के पांच दशकों के बाद इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में 'वर्तमान भारत में बुद्धिजीवी की भूमिकाÓ की तलाश करना समाज को आधुनिक बनाने के क्रम में आई उदासी और शैथिल्य के रू-ब-रू होना है। इन पचास वर्षों में हमने अनेक विश्वविद्यालय, कॉलेज, सरकारी स्कूल और बहुत बड़ी फीस वसूल करने वाले पब्लिक स्कूल खोले हैं और खुलने दिए हैं, डॉक्टर, इंजीनियर और पत्रकार बनाए हैं; प्रौद्योगिकी के विस्तार के प्रयास किए, परमाणु आयुध बनाकर अपनी वैज्ञानिक क्षमताओं का प्रमाण दिया है। सारांश यह कि बुद्धिजीवियों की संख्या बढ़ाई है। लेकिन तब भी गुन्नार मिर्डल का कहना है कि 'बुनियादी समस्याएं बरकरार हैं, गरीबी बढ़ी है, बौद्धिक दासता, अंग्रेजपरस्ती और अंधानुकरण की प्रवृत्तियों को पहले से अधिक प्रोत्साहन प्राप्त है और सामाजिक स्तरों पर यथार्थ से साक्षात्कार के बजाय अन्तर्मुखता को अधिक महत्व दिया जा रहा है।.. भारत को विदेशी विशेषणों, पराई यंत्र विधि और औपनिवेशिक शिक्षा को रद्द कर स्वयं अपनी परम्परा और जलवायु के अनुसार अपना विकास करना चाहिए। गांधीजी की सारी कोशिश यही थी इसलिए मेरा विश्वास है कि गांधीजी का चिंतन युक्तियुक्त था, वह महज उड़ान नहीं था बल्कि वह वास्तविकता पर आधारित था। औपनिवेशिक अर्थशास्त्र और दर्शन के पीछे भागने के बजाय भारत के शिक्षित वर्ग को गांधी की सार्थकता समझनी चाहिए।Ó (बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में- श्रीकांत वर्मा)।
यह रेखांकित किया जाना चाहिए कि अभी भी भारत को पूरी तरह आधुनिक बनाने वाला बुद्धिजीवी ही है। वह वांछित और सुचिंत्य बदलाव के लिए ज्ञान की विविध प्रणालियों का आविष्कार करता है, लेकिन उसकी शोध और उसके आविष्कार समाज के विकास और उन्नयन के लिए होते हैं और स्त्री-पुरुषों को अपनी दक्षता, कौशल, पांडित्य और सर्जनात्मक क्षमताओं के प्रति आश्वस्त करते हैं। इस तरह नए ज्ञान को आविष्कृत करने वालों का एक समूह बन जाता है और एक समूह उनका जो इन उपलब्धियों को शिक्षा से दूर या संचार माध्यमों के उपकरणों द्वारा या कि संवाद, आंदोलन, विचार-गोष्ठियों के माध्यम से फैलाता है। इस प्रकार ज्ञान के नए आयाम खुलते हैं और वैज्ञानिक ऊर्जा का विस्तार होता है। ज्यों-ज्यों विभिन्न संस्कृतियों, स्वभावों, अनुभवों के लोगों की मैत्री बढ़ती है बुद्धि और बुद्धिजीवियों की रोशनी फैलती जाती है।
यदि ध्यान से देखें तो भारतीय बुद्धिजीवियों की हलचल अपने समाज में बदलाव की आकांक्षा से ही शुरू होती है। यह एक वैचारिक हलचल है और भारतीय समाज की अनेक कट्टरताओं के विरुद्ध अपनी तीक्ष्ण प्रतिक्रिया दर्ज कराती है। यह प्रतिक्रिया उस अंग्रेजी राज के विरुद्ध भी है जो इस देश को आर्थिक-दृष्टि से खोखला करती है और उनके अनेक समृद्ध जीवनानुभवों की हंसी उड़ाती है। लेकिन बुद्धिजीवियों का यह हस्तक्षेप अनेक मिजाज वाला है और वे सब कई रास्तों से चलकर भी इस बात पर एक मत होते हैं कि भारतीय समाज और विदेशी राज को बदलना और नए समाज को जनाधार देना हमारी प्राथमिकताओं में शामिल है। सामाजिक बदलाव की दिशा में वर्ण-व्यवस्थाओं की कट्टरताओं के विरुद्ध संघर्ष और स्त्रियों में सामाजिक कर्तव्यों के प्रति चेतना जगाने का आंदोलन शुरू करना प्रमुख है। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन बुद्धिजीवियों के शक्ति केन्द्र पश्चिम के विश्वविद्यालय, बुद्धिजीवी और वैचारिक संगठन तथा संचार-संस्थान हैं लेकिन वह राष्ट्रवादी दृष्टि भी है जो अपने देश को समुन्नत प्रतिमानों के आधार पर मूल्यांकित होता देखना चाहती है। यह बुद्धिजीवी वर्ग, राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र भी है।
गौरतलब है कि पश्चिम के बुद्धिजीवी देश की राजनीतिक गतिविधियों और चिंताओं से जहां तक दूर रहते हैं। इन बुद्धिजीवियों को यह लाभ मिलता है कि वे लगातार जिन्दगी को सुन्दर, मजबूत और निर्भीक बनाने वाले तथ्यों को जानने, कहने की हिम्मत जुटाए रखते हैं और आवश्यक हुआ तो राजनीतिक प्रतिष्ठानों और आर्थिक संस्थानों के मालिकों, दलालों तथा सौदागरों की साठ-गांठ को भी तथ्यों के साथ प्रकट करते हैं। किन्तु भारत में जहां बुद्धिजीवियों के छोटे से समुदाय ने सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के दोनों मोर्चों पर काम किया है वहां कई जटिलताएं पैदा कर दी हैं। वे स्वयं घटनाओं के केन्द्र बन गए हैं और आजादी के बाद वे लोगों की इच्छाएं जांचने और पूरी करने में नाकामयाब हुए हैं। बात यह हुई कि भारतीय बुद्धिजीवियों के अपने लोग और अपने समाज हैं। चारों तरफ लुभावनी किन्तु बेरहम दुनिया बसी हुई है; कई तरह के मिजाज और स्तरों वाली- भूखी, बीमार, निरक्षर, उत्पीडि़तों से लेकर अमीरजादों, करोड़पतियों, पांच सितारों वालों की लालची, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों, दलालों की, मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर वालों की और संवेदनहीन, आत्म-मुग्ध, उपभोगप्रिय, मध्यवर्ग की। बुद्धिजीवी इस प्रतिज्ञा से बंधा हुआ है कि वह पूरे समाज को आधुनिक और मानवीय बनाएगा। आज का असंतुलित और अनेक तरह की क्रूरताओं, गैर-बराबरियों में विभाजित जीवन भारतीय बुद्धिजीवियों के लिए नहीं है और न उनका जीवन निरपेक्ष, निर्लिप्त, केवल मोहकामी, ब्रह्मलीन ऋषियों का है। दरअसल उनकी भूमिका सामान्यजन के मन में और पूरे समाज के लिए एक सुन्दर, सार्थक, सर्जनात्मक जीवन रचने की शक्ति पैदा करने में है। लेकिन यह इस पर निर्भर करता है कि भारतीय बुद्धिजीवी अपने लिए किन मूल्यों और किस वैचारिकी को चुनता है। नौम चॉम्सकी ने अपने एक वक्तव्य में 'पवित्र विचार और नेक इरादों की असहायताÓ पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि 'कोई विचार कहां तक सार्थक है इसकी पहचान केवल इससे हो सकती है कि उसे कार्य में परिणत करने पर क्या नतीजे निकलते हैं।Ó भारतीय बुद्धिजीवी की भूमिका का असली पता भी तभी लगेगा कि बाद में समाज कितना बदलता है और कैसा बदलता है- किनके लिए बदलता है?