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Thursday 05 May 2016

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ललित सुरजन
हमें अक्सर यह सुनने मिलता है कि हिन्दी में कविता, कहानी, उपन्यास के अलावा और कुछ लिखा ही नहीं जाता। इस शिकायत में दम तो है, लेकिन बात पूरी तरह सच नहीं है। दरअसल हुआ यह है कि जिस समय में साहित्यिक कृतियों से ही समाज अनभिज्ञ बना हुआ है, उसमें साहित्येतर लेखन लोगों तक पहुंचे भी तो कैसे? एक तो नई पीढ़ी में हिन्दी अथवा भारतीय भाषाओं के साहित्य के प्रति एक तरह से दुराव तथा अवज्ञा का भाव उत्पन्न हो गया है। इसमें दोष युवाओं का नहीं बल्कि उनके अभिभावकों का है, जिन्होंने अपने बच्चों को साहित्य तथा जीवन के अन्य बेहतरीन मूल्यों से विमुख कर उन्हें पैकेज

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  • हमें अक्सर यह सुनने मिलता है कि हिन्दी में कविता, कहानी, उपन्यास के अलावा और कुछ लिखा ही नहीं जाता। इस शिकायत में दम तो है, लेकिन बात पूरी तरह सच नहीं है।
  • By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
  • एक रास्ता यह भी है
  • By : प्रभा प्रसाद     View in Text Format    |     PDF Format
  • अपने गांव का आदमी
  • By : कुन्दन सिंह परिहार     View in Text Format    |     PDF Format
  • पुरानी डायरी
  • By : ममता शर्मा     View in Text Format    |     PDF Format
  • भड़ास
  • By : कमल चोपड़ा     View in Text Format    |     PDF Format
  • अब सात पैंतीस नहीं बजते
  • By : सुभाष रस्तोगी     View in Text Format    |     PDF Format
  • हुडुकचुल्लू
  • By : विजय रंजन ( संपादक- 'अवध रचनाÓ/अधिवक्ता)     View in Text Format    |     PDF Format
  • फिनिक्स
  • By : करिश्मा अय्युब पठाण     View in Text Format    |     PDF Format
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  • By : ज्योतिकृष्ण वर्मा     View in Text Format    |     PDF Format
  • कोंपलें इन में
  • By : जयप्रकाश श्रीवास्तव     View in Text Format    |     PDF Format
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