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Tuesday 04 Aug 2015

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ललित सुरजन
स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा। जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, यह विशद विवेचन का विषय है, जिसे एक व्याख्यान या आलेख में साधना लगभग असंभव है। यदि विषय के साथ न्याय करना है तो इस हेतु एक सुचिंतित, सुदीर्घ ग्रंथ लिखने की आवश्यकता होगी। फिलहाल इसके कुछेक पहलुओं पर सरसरी तौर पर चर्चा हो सकती है। अपने आपमें विषय महत्वपूर्ण है, प्रासंगिक भी तथा आज की चर्चा को एक प्रस्थान बिंदु मानकर आगे बढ़ा जा सकता है। जब हम हिंदी साहित्य के इतिहास, कालखंड निर्धारण, परंपराओं एवं प्रवृत्तियों की चर्चा करते हैं तो तीन चार नाम प्रमुख रूप से सामने आते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 1920

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  • स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा। जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, यह विशद विवेचन का विषय है, जिसे एक व्याख्यान या आलेख में साधना लगभग असंभव है। यदि विषय के साथ न्याय करना है तो इस हेतु एक सुचिंतित, सुदीर्घ ग्रंथ लिखने की आवश्यकता होगी।
  • By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
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  • By : श्याम कश्यप     View in Text Format    |     PDF Format
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