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Friday 30 Jan 2015

Current Issue

ललित सुरजन
\'\'बची उम्र को
बचाने की फिकर क्या
इस रात में भी
दोपहरी सा
दूना धधकता हूं।\'\'
कवि मलय के नए संकलन \'\'असंभव की आंच\'\' की एक कविता \'\'रात में दूना\'\' की ये अंतिम पंक्तियां हैं। कह सकते हैं कि यह मलय का आत्मपरिचय है और मैं उन्हें जितना जानता हूं, उनके संघर्षपूर्ण जीवन की शायद इससे बेहतर और कोई व्याख्या नहीं हो सकती थी।
मलय पच्यासी साल के हो गए हैं। इस संकलन का प्रकाशन इसलिए सुखकारक है कि कवि ने इस आयु में भी अपनी सक्रियता बरकरार रखी है, किन्तु मेरे लिए यह ज्यादा प्रसन्नता

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  • कवि मलय के नए संकलन ''असंभव की आंच'' की एक कविता ''रात में दूना'' की ये अंतिम पंक्तियां हैं।
  • By : ललित सुरजन     View in Text Format    |     PDF Format
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