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Sunday 21 Sep 2014

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ललित सुरजन
भारत में इन दिनों आत्मकथाओं की बहार आई हुई है। बहार की जगह बौछार लिखूं तो भी शायद गलत नहीं होगा। आप समझ रहे होंगे कि मैं हाल के चंद महीनों में प्रकाशित उन आत्मकथाओं की बात कर रहा हूं जो सत्ता के गलियारों में दखल रखने वाले प्राणियों द्वारा लिखी गई हैं। ये सारी किताबें अंग्रेजी में हैं और ऐसा मौका देखकर बाजार में लाई गई हैं, जब उनकी अधिक से अधिक बिक्री की जा सके। इसके लिए सबसे पहले तो देश के उन प्रकाशन गृहों की तारीफ की जानी चाहिए जो जानते हैं कि पुस्तकें बेचकर मुनाफा कैसे कमाया जाता है। अगर ये आत्मकथाएं सालभर पहले या सालभर बाद

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  • भारत में इन दिनों आत्मकथाओं की बहार आई हुई है। बहार की जगह बौछार लिखूं तो भी शायद गलत नहीं होगा।
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